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फिर से चर्चा में पकड़ौआ विवाह

11/08/2019

फिर से चर्चा में पकड़ौआ विवाह

चंदा सिंह

बिहार का पकड़ौआ विवाह पूरे देश में चर्चा का विषय रहता है। किसी भी योग्य लड़के का अपहरण करके अपनी बेटी का विवाह कराने के मामले एक बार फिर से बढ़ रहे हैं। इसी बीच एक ऐसे ही मामले में अदालत के निर्णय से ऐसी शादियों पर रोक लगने की उम्मीद की जा रही है।

पिछले तीन-चार वर्षों में दहेज विरोधी अभियानों के कारण बिहार में दहेज मुक्त विवाह के आंकड़े कुछ हद तक बढ़े हैं। साथ ही इसने गहरी छाप आजादी के पूर्व से चली आ रही पकड़ौआ विवाह यानि जबर्दस्ती विवाह पर भी छोड़ी है। बिहार के कुछ हिस्सों में चल रही यह डराने वाली शादी फिर से चर्चा में है। दरअसल झारखंड के बोकारो में इंजीनियर के पद पर काम करने वाले पटना के विनोद कुमार के मामले में कोर्ट ने फैसला कर दिया है। इससे ऐसे अपराध में लिप्त लोगों को बड़ा सबक मिला है। हालांकि विनोद को पटना के फैमली कोर्ट से दो साल बाद न्याय मिला। अदालत ने उनकी पकड़ौआ शादी को अमान्य घोषित कर दिया। कोर्ट के इस फैसले से वैसे बेटों के पिता को राहत मिली है जिनकी शादी अभी तक नहीं हुई। इससे पकड़ौआ शादी पर कुछ हद तक विराम लगने की गुंजाइश दिख रही है। कोर्ट के फैसले से राहत मिलने के बाद विनोद उस मंजर को याद कर आज भी सिहर उठते है।
वे बताते हैं कि 2017 के दिसम्बर माह में मैं पटना अपने दोस्त की शादी में आया था। मेरा फोन बजा और सुरेन्द्र यादव ने मुझे अपने घर बुलाया। मेरे सामने अपनी बहन से शादी करवाने का प्रस्ताव रखा। जब मैं नहीं माना तो मेरी साथ मारपीट की और बंदूक की नोक पर शादी करा दी गयी। इस शादी के खिलाफ विनोद ने कोर्ट का रुख किया और कोर्ट ने इंसाफ किया। यह सब खेल सिर्फ दहेज के लिए होता है। कानून विशेषज्ञों का मानना है कि हिन्दू परम्परा के अनुसार शादी में सात फेरे के साथ सात वचन भी लिये और दिये जाते है। ऐसा विधान सहमति के आधार पर ही पूरा हो सकता है। अगर एक भी पक्ष असहमति जाहिर करता है तो वह शादी कानून और समाज की नजरों में अवैध हो जायेगी।

नहीं होता सुखद अंत
अपने अनुभव साझा करते हुए सोशल वर्कर राजीव कुमार बताते है कि ऐसे विवाह का ज्यादातर अंत सुखद नहीं होता। धनबल से पिछड़ जाने वाले बाहुबल का सहारा लेते है और अपहृृत लड़के से बेट की शादी करा देते है। कुछ क्षेत्रों में तो जबरन शादी कराने वाले गिरोह भी सक्रिय हैं, जो ठेके पर काम करते है। लड़के का अपहरण कर लड़की पक्ष के पास पहुंचा दिया जाता है। शादी के बाद दूल्हे को सिर्फ इस शर्त पर छोड़ा जाता है कि वह अपने घरवालों को इस विवाह को स्वीकारने के लिए मना लेगा। मगध सहित बिहार, झारखंड और पूर्वी उत्तर प्रदेश में ऐसी शादियां आजादी के पहले से ही धड़ल्ले से होती आ रही हैं। समान्य हैसियत वाले लोग अपनी बेटियों की शादी के लिए अच्छे और संपन्न वर-घर की चाहत में वैसे लड़कों को जबरन उठा लेते है जिनके पिता की मांग के मुताबिक दहेज देने में वह असमर्थ होते है।

रिश्तेदार निभाते हैं भूमिका
देखा गया है कि पकड़औ विवाह के 80 प्रतिशत मामलों में लड़के के रिश्तेदारों की ही अहम भूमिका होती है। हाजीपुर जिले के बिदुपुर में 2018 में सेना के एक जवान की शादी जबरन पकड़ कर करवा दी गयी। सेना का जवान हैदराबाद में कार्यरत था। वह अपने जीजा के साथ सोनपुर मेला घुमने आया था। जीजा ने उसे धोखे से एक गांव में पहुंचा दिया। जहां एक लड़की से उसकी जबरन शादी करा दी गयी। सरकारी आंकड़ों के अनुसार 2014 में 2,526 मामले पकड़ौआ विवाह के दर्ज किये गये। वर्ष 2015 में यह मामला बढ़कर 3,000 हो गये। वहीं 2016 में पकड़ौआ विवाह के लिए 3,070 लड़कों का अपहरण किया गया। 2017 में यह आंकड़ा सबसे ज्यादा दर्ज किया गया।
इस वर्ष 3,400 लड़कों का अपहरण कर बंदूक की नोंक पर विवाह कराया गया। पकड़ौआ विवाह में विवाह योग्य लड़के का अपहरण कर उनकी जबरन शादी करवायी जाती है। 80 के दशक में उत्तर बिहार में बेगूसराय जिला का पूरा इलाका इस विवाह की चपेट में था। आलम यह था कि बाकायदा हर 7 से 8 गांवों में इसके लिए गिरोह चला करता था। शादी के सीजन में इस गिरोह की डिमांड बढ़ जाती थी। इसके लिए इन्हें पैसे भी दिये जाते थे। गिरोह के डर से उस समय इंटर पास या नौकरी करने वाले लड़कों को घर से जल्दी बाहर निकलने की अनुमति नहीं थी।



 
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