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वायु प्रदूषण और बढ़ती हिंसा

16/03/2020

डॉ. राजेन्द्र प्रसाद शर्मा
बात थोड़ी अजीब लग रही है पर वैज्ञानिकों द्वारा किए गए हालिया शोध से जो परिणाम आए हैं, उनमें एक यह भी है कि वायु प्रदूषण के चलते समाज में हिंसा बढ़ रही है। अबतक माना जाता रहा है कि वायु प्रदूषण के चलते लोगों के स्वास्थ्य पर विपरीत प्रभाव पड़ रहा है और जलवायु परिवर्तन के साथ ही कई प्रजातियां तक विलुप्त होती जा रही हैं। पर अमेरिका की यूनिवर्सिटी ऑफ मिनसेंटा स्कूल ऑफ पब्लिक हेल्थ और कोलोरेडो स्टेट यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं की टीम इस नतीजे पर पंहुची है कि समाज में हिंसक अपराधों में बढ़ोतरी का एक प्रमुख कारण वायु प्रदूषण है। शोधकर्ताओं का मानना है कि ’’हमारे शोध में वायु प्रदूषण और हिंसक अपराधों के बीच संबंध की पहचान हुई है। हमें पता चला है कि प्रदूषक पीएम पार्टिकुलेट में 10 माइक्रोग्राम प्रति घनमीटर की बढ़ोतरी होने पर हिंसक अपराधों में 1.17 फीसदी की बढ़ोतरी होती है।’’
शोधकर्ताओं के अध्ययन को हल्के में नहीं लिया जा सकता। इसका बड़ा कारण यह है कि शोधकर्ताओं द्वारा बहुत बड़े नेटवर्क पर अध्ययन कर निष्कर्ष निकाला गया है। अमेरिका में लगातार 13 साल तक 8 करोड़ 60 लाख लोगों के डाटा पर यह अध्ययन किया गया है। मोटे तौर पर इस तरह से समझा जा सकता है कि हवा में उपलब्ध प्रदूषक कण व जहरीली गैसें मस्तिष्क के सामान्य कामकाज को प्रभावित करती हैं। दिमाग का असर सीधे मानव व्यवहार पर पड़ता है। यदि लंदन की ही बात करें तो वहां 20 लाख लोग ऐसे इलाकों में रहते हैं, जहां प्रदूषण का स्तर अधिक है। बीजिंग ही नहीं दिल्ली, बंगलुरु सहित हमारे देश के भी कई शहरों की स्थिति प्रदूषण के मामले में गंभीर है। वैसे भी अपराध खासतौर से हिंसा प्रभावित क्षेत्रों का अध्ययन करेंगे तो साफ हो जाएगा कि अधिक भीड़भाड़ वाले और प्रदूषित शहरों में हिंसा का स्तर अन्य स्थानों की तुलना में अधिक है।
हालांकि शोधकर्ताओं के अध्ययन का केन्द्र अमेरिका ही रहा है और शोधार्थियों ने अमेरिका के ही 301 शहरों में अपराध का अध्ययन किया है पर यह साफ हो जाना चाहिए कि प्रदूषण सीधे-सीधे दिमाग पर असर डालता है और इससे लोगों की मानसिकता प्रभावित होती है। अधिक प्रदूषण वाले इलाकों में या भीड़भाड़ वाले स्थानों पर व्यक्तियों की प्रतिक्रिया भिन्न तरह की होने लगती है। चिढ़चिढाहट, अवसाद, कुंठा, अनिद्रा और इसी तरह की प्रतिक्रियाएं होने लगती है। ऐसे में जो अधिक सेंसेटिव होते हैं वे प्रतिक्रिया भी जल्दी ही व्यक्त करते हैं और इसका परिणाम हिंसक प्रवृति हो जाती है।
इसमें दो राय नहीं कि आज सारी दुनिया बढ़ते प्रदूषण से चिंतित है। नित नए प्रस्ताव पारित किए जाते हैं। प्रदूषण स्तर कम करने के लिए दुनिया के देश लगातार कोशिश कर रहे हैं क्योंकि परिणाम सामने हैं। जलवायु परिवर्तन होने लगा है। समुद्री तूफानों का सिलसिला बढ़ गया है। मौसम चक्र में बदलाव आने लगा है। प्रजातियां नष्ट होने लगी हैं। दुनिया के तापमान में बढ़ोतरी हो रही है। सारी दुनिया बढ़ते तापमान से चिंतित है। सुनामी श्रृंखलाबद्ध होने लगी है। इससे प्राकृतिक प्रकोप बढ़ा है। समुद्री किनारों पर बसे शहरों के सामने अस्तित्व का संकट आने लगा है। ऐसे में प्रदूषण को लेकर और अधिक गंभीर होना पड़ेगा।
बिना दूरगामी सोच के नई-नई चीजों को अपनाना और जब उसके नकारात्मक परिणाम आने लगते हैं तबतक बहुत देरी हो जाने के कारण समस्याएं होती हैं। एक समय प्लास्टिक को दिल खोलकर बढ़ावा दिया गया। आज प्लास्टिक परेशानी का सबब बनती जा रही है। पेट्रोल और डीजल के प्रदूषण को कम करने के लिए अब इलेक्ट्रिक वाहनों की ओर जाने लगे हैं। घर को पंचसितारा बनाने वाले उत्पाद प्रदूषण बढ़ाने में सहायक हो रहे हैं। ऐसे में अब देश-दुनिया की सरकारों के साथ ही गैर सरकारी संगठनोें को भी पूरे दमखम के साथ आगे आना होगा नहीं तो वह दिन दूर नहीं जब प्रदूषण के चलते सामान्य जीवन बिताना मुश्किल हो जाएगा। ऐसे में हिंसक होते समाज को अहिंसा की ओर ले जाने के लिए प्रदूषण को निर्धारित स्तर पर रखने के समग्र प्रयास करने होंगे।
(लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)


 
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