यथावत

Blog single photo

उत्साहित और बेचैन था देश

19/09/2019

उत्साहित और बेचैन था देश

गुंजन कुमार

सात सितंबर भारत के लिए ऐतिहासिक दिन होने जा रहा था। क्योंकि देश का महत्वकांक्षी मून मिशन, चंद्रयान-2 चांद पर कदम रखने वाला था। इस ऐतिहासिक क्षण का गवाह बनने की उत्सूकता पूरे देश में थी। हर कोई रात का खाना खाकर टीवी के सामने बैठ गया था। बुजुर्गों, युवाओं और बच्चों में एक जैसा उत्साह था। कई शहरों और कॉलोनियों में बड़े-बड़े स्क्रीन लगाए गए थे। इसरो मुख्यालय में वैज्ञानिकों के अलावा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी खुद पहुंचे थे। इनके अलाव देश भर के 60 बच्चें क्विज प्रतियोगिता से चुनकर वहां इस पल का गवाह बनने गए थे। सब का उत्साह चरम पर था। दिवानगी हिलोरे ले रही थी।

रात करीब 1 बजकर 37 मिनट पर लैंडर विक्रम चांद से करीब 30 किलोमीटर दूर था। वह 1680 मीटर प्रति सैकेंड की रμतार से चांद की ओर बढ़ रहा था। जिस तेजी से लैंडर विक्रम चांद की ओर बढ़ रहा था, उसी रμतार से इसरो मुख्यालय में स्क्रीन से नजरें गड़ायें प्रधानमंत्री, वैज्ञानिकों और वहां मौजूद छात्रों की धड़कनें भी बढ़ रही थी।

समय के साथ-साथ बेचैनी बढ़ती जा रही थी। बेचैनी सिर्फ इसरो मुख्यालय में ही नहीं थी। बल्कि हर घर में थी। ऐसी दिवानगी और बेचैनी क्रिकेट मैचों में देखने को मिलती है। वह भी भारत-पाक मैचों में। लेकिन यह खेल नहीं था। विज्ञान था। जिसमें नए आविष्कार होते हैं और पत्थर पर लकीर खिंचना होता है। रात करीब 1:37 बजे लैंडर विक्रम चांद से करीब 30 किलोमीटर दूर था। वह 1680 मीटर प्रति सैकेंड की रμतार से चांद की ओर बढ़ रहा था। जिस तेजी से लैंडर विक्रम चांद की ओर बढ़ रहा था, उसी रμतार से इसरो मुख्यालय में स्क्रीन से नजरें गड़ायें प्रधानमंत्री, वैज्ञानिकों और वहां मौजूद छात्रों की धड़कनें भी बढ़ रही थी। इनके साथ देश भर में लोग टीवी सेट के सामने बैठे थे। लगभग पूरा देश जाग रहा था। महानगर से लेकर गांव तक। अपने वैज्ञानिकों की उपलब्धि पर पूरा देश गौरवांवित हो रहा था।

रात 1:48 बजे विक्रम चांद से महज 12 किलोमीटर दूर था। यह दूरी घटकर 5 किलोमीटर रह गयी। हर एक सैकेंड लोगों की जिज्ञासा बढ़ती जा रही थी। रात 1:52 बजे विक्रम चांद से मात्र 2़1 किलोमीटर ही ऊपर था। तभी लैंडर विक्रम ने अपना रास्ता बदल लिया। स्क्रीन पर यह देखते ही वैज्ञानिक चिंतित होने लगे। चेहरे की बेचैनी बढ़ने लगी। वैज्ञानिक कंप्यूटर और मशीनों में उलझते रहे। हर सेकेंड व्यस्तता और बेचैनी बढ़ रही थी। लेकिन कुछ सैकेंड बाद ही विक्रम स्क्रीन से गुम हो गया। इसरो मुख्यालय में बैठे वैज्ञानिकों के चेहरे पर निराशा झलकने लगी। फिर भी वैज्ञानिक अपने प्रयास में जुटे थे। आखिरकार लैंडर से वैज्ञानिकों का संपर्क टूट गया। चंद्रयान-2 की शुरूआती तैयारी से लेकर लॉन्चिंग तक इसरो के साथ पूरा देश खड़ा था। जैसे ही विक्रम से इसरो का संपर्क टूटा वैज्ञानिक निराश हो गए। उनके साथ आम लोग भी निराश थे।

मगर चंद्रयान-2 की लैंडिंग के समय मुख्यालय में मौजूद बच्चे किसी भी कीमत पर हार मानने को तैयार नहीं थे। सभी बच्चे आशन्वित थे। लेकिन हकीकत कुछ और थी। जब बच्चों ने हकीकत को महसूस किया तो कई बच्चों के आंखों में आंसू तक आ गए। इसरो प्रमुख के सिवन ने खुद प्रधानमंत्री को इसकी जानकारी दी। करीब सवा दो बजे इसरो प्रमुख ने बयान दिया कि लैंडर से संपर्क टूट गया है। उन्होंने बताया कि जब लैंडर चांद की सतह से महज 2.1 किलोमीटर की दूरी पर था तब उससे संपर्क टूट गया। प्रधानमंत्री मोदी ने निराश वैज्ञानिकों का हौसला बढ़ाया। उन्होंने वैज्ञानिकों से बातचीत करते हुए कहा, ‘पूरी दुनिया को आप पर गर्व है। आपने देश के लिए जो योगदान दिया वह सराहनीय है। ये छोटी उपलब्धि नहीं है। हम आपके साथ हैं। पूरा देश आपके साथ है। इसके बाद प्रधानमंत्री मोदी वहां मौजूद बच्चों से भी मिलें। इसरो मुख्यालय से निकलते समय प्रधानमंत्री मोदी ने इसरो प्रमुख के सिवन को गले से लगाया। वह पल बेहद भावनात्मक हो गया था।

आसां नहीं चांद को छूना

धरती से 3 लाख 84 हजार 400 किलोमीटर दूर चमकता चांद। जिसकी सुंदरता का बखान लोकगीतों से लेकर कविताओं और गानों में बहुत बार हुआ है। इसलिए इसे छूने का हर कोई सपना देखता है। साहित्य के अलावा विज्ञान के लिए भी चांद उतना ही महत्वपूर्ण है। वैज्ञानिक भी चांद को समझने और उसकी वास्तविक जानकारी इक्ट्ठा करने को लेकर उत्सुक रहते हैं। हर देश का अंतरिक्ष वैज्ञानिक इस पर पहुंचने को उतावला रहता है। पिछले 11 सालों से इसरो के वैज्ञानिक दिन-रात इसी उतावलेपन को हकीकत में बदलने की कोशिश में जुटे थे। साल 2008 में इसरो ने चंद्रयान-1 का सफल परीक्षण किया था। चंद्रयान-1 ने चांद की कक्षा तक पहुंचने में कामयाबी हासिल की। उसके बाद इसरो ने नई चुनौतियों और नए लक्ष्यों के साथ चंद्रयान-2 को चांद पर उतारने की रूपरेखा तैयार की थी। चंद्रयान-2 के लिए रोवर की सॉμट लैंडिंग कराने की तैयारी हुई थी। वैज्ञानिक परीक्षण के लिए कई उपकरणों के साथ रोवर 14 दिन तक चांद की जमीन पर सैर करने वाला था लेकिन लैंडर और रोवर के साथ चांद के दक्षिणी ध्रुव तक पहंचना आसान भी नहीं था। क्योंकि दक्षिणी ध्रुव पर अभी तक किसी देश ने चांद पर लैंडिंग नहीं कर सका है। चांद पर मानव के पहुंचने के 50 साल हो गए हैं। विकसित देशों के लिए भी चांद को छूना आसान नहीं रहा है। रूस ने 1958 से 1976 के बीच करीब 33 मिशन चांद पर भेजे। इनमें से 26 अपनी मंजिल पर नहीं पहुंच सके। अमेरिका 1958 से 1972 तक 31 बार मिशन मून पर काम किया। इनमें से वह 17 में नाकाम रहा। यही नहीं अमेरिका ने 1969 से 1972 के बीच 6 मानव मिशन भी भेजे। इनमें 24 अंतरिक्ष यात्री चांद के करीब पहुंचे। इनमें सिर्फ 12 ही चांद की जमीन पर उतर पाए। इजराइल का मिशन मून इसी साल अप्रैल में अधूरा रह गया। चार अप्रैल को उसका मिशन चंद्रमा की कक्षा में पहुंच गया लेकिन 10 किलोमीटर दूर रहते ही पृथ्वी से इसका संपर्क टूट गया।

प्रधानमंत्री और के सिवन के साथ वहां मौजूद वैज्ञानिक और देश भर से आए बच्चों में कइयों की आंखें नम हो गई थी। इसके बाद प्रधानमंत्री मोदी इसरो मुख्यालय से चले गए। लेकिन कुछ घंटे बाद ही तड़के सुबह प्रधानमंत्री फिर से इसरो मुख्यालय आएं। यहां वह कई वैज्ञानिकों से मिले और वहीं से उन्होंने देश को संबोधित किया। विक्रम की सॉμट लैंडिंग नहीं होने के कारण पूरा देश कुछ पल के लिए निराश जरूर हुआ मगर वह निराशा अस्थायी रही। क्योंकि इसरो प्रमुख के सिवन ने देश को बताया कि हम अपने अभियान में 99 फीसदी कामयाब हुए हैं। उम्मीद सौ फीसदी की थी। नए प्रयोग में एक फीसदी की असफलता नकामयाबी नहीं होती। चन्द्रयान-2 को चांद की खोज करनी है। वह कर रहा है। आॅर्बिटर निरंतर अपने काम में लगा है। वह तस्वीरें भेज रहा है। उसकी तस्वीर से ही लैंडर का भी पता चल सका है।

लैंडर चांद पर सॉμट नहीं बल्कि हार्ड लैंडिंग किया। वह वहां नहीं, जहां उसे होना चाहिए था। वह अपने नियम स्थल से कुछ दूर है। वैज्ञानिक उससे संपर्क करने की कोशिश कर रहे हैं। उनके पास अभी भी समय है। इसरो का मिशन चंद्रयान-2 भले ही शत प्रतिशत इतिहास नहीं रच सका लेकिन वैज्ञानिकों के जज्बे को देश सलाम कर रहा है। मिशन के पूरा होने और देश के इतिहास रचने के लम्हे का देश रात को जाग कर बेसब्री से इंतजार कर रहा था। दिल्ली के रोहिणी में रहने वाले प्रवीण सिंह बताते हैं, ‘पहले हमलोग चांद और सेटेलाइट के बारे में कुछ ज्यादा नहीं जानते थे। उस दिन हमारे घर के सारे सदस्य रातभर जागकर चांद और अपने सेटेलाइट को देखा और समझा। मेरा 14 और 9 साल के दोनों बेटे भी इसमें दिलचस्पी ले रहे थे। हमें गर्व महसूस हुआ।’ दिल्ली जैसे मैट्रो सिटी नहीं बल्कि छोटे शहर और कस्बों में भी लोग रात भर जगकर इसके गवाह बने।

पटना निवासी रंजेश भी अपने परिवार के साथ उस रात टीवी से चिपके बैठे थे। उन्होंने बताया कि मेरी बेटी खुशी दूसरी कक्षा में पढ़ती है। उसे अपने स्कूल से इसके बारे में पता चला। वह छह सितंबर को जब स्कूल से घर आई तो वह बोली, पापा! आज रात मैं आपको टीवी पर सही का चांद दिखाउंगी। उसके साथ हमलोग भी 2:30 बजे तक टीवी देखते रहे। जब विक्रम का संपर्क टूट गया तो हमलोग बहुत निराश हुए। लेकिन अब हम लोग खुश हैं कि विक्रम का पता चल गया है।



 
Top