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हलाला भी जायज नहीं

09/08/2019

हलाला भी जायज नहीं ...

मोहम्मद शहजाद

एक बार में तीन तलाक के साथ ही निकाहे हलाला का जो तरीका प्रचलित है उसका इस्लाम में कोई वर्णन नहीं है। बस यह रीति चल पड़ी।

नये कानून के अनुसार एक साथ तीन तलाक देना अब जुर्म करार दिया गया है। ऐसा करने वाले को तीन साल की सजा होगी। अलबत्ता इसको लेकर बहुत से लोगों में भ्रम की स्थिति है। उन्हें लगता है कि इस कानून के क्रियान्वयन से भारत में मुसलमानों के तीन तलाक देने पर पूरी तरह से प्रतिबंध लग गया है। जबकि हकीकत में ऐसा नहीं है। यह कानून केवल एक साथ तीन तलाक अर्थात तलाकेबिदअत पर लागू हुआ है। इसे तलाके-सालासा के नाम से भी जाना जाता है। इसका तलाके-अहसन से कोई लेना-देना नहीं है। अर्थात मुसलमानों को कुरान व हदीस में बताए तरीके के अनुसार निर्धारित समयावधि में तीन तलाक देने की अनुमति बदस्तूर जारी रहेगी। इस तरह से देखा जाए तो केंद्र सरकार ने इस्लामी शरीअत में कोई हस्तक्षेप नहीं किया है। उसने केवल देश में सदियों से चली आ रही उस सामाजिक कुरीति को समाप्त किया है जो हमारे पितृ-सत्तात्मक सोच की देन थी।
इसका कुरान में कहीं भी जिक्र नहीं है। अधिकतर उलेमा और इस्लामी विद्वान भी तलाक के इस तरीके को गलत मानते रहे हैं। शायद यही वजह है कि इसे तलाके-बिदअत का नाम दिया गया। गौरतलब है कि बिदअत का मतलब दीन में अपनी तरफ से उन नई बातों को जोड़ना है जिनका कुरान और पैगम्बर मोहम्मद ने कभी उल्लेख नहीं किया। विशेष परिस्थितियों के कारण चलन में आए तलाके-बिदअत को भारतीय मुसलमानों ने एकमात्र तरीका मान लिया और हमारे यहां एक साथ तीन तलाक का तरीका ही सबसे अधिक प्रचलित हो गया। हद तो यह है कि इसके लिए स्पीड पोस्ट, स्काइप, व्हाट्सएप और दूसरी आधुनिक तकनीक तक का इस्तेमाल किया जाने लगा है और महज तीन बार तलाक, तलाक, तलाक टाइप करके बीवी से छुटकारा हासिल करने के मामले सामने आने लगे। जबकि इसके लिए कुरान और हदीस में कई जगह बाकायदा एक प्रक्रिया बताई गई है।
इसके अनुसार तीन तलाक के बीच में एक निर्धारित मुद्दत तय की गई है। एक बार तलाक कहने के बाद दूसरे के बीच में महिला की इद्दत और तोहर के पूरा होने का समय दिया जाना चाहिए। दोनों का मतलब शादीशुदा महिला के अगले मासिक धर्म या उसके बाद की पवित्रता से है। चूंकि यह समय लगभग एक माह के अंतराल का होता है, इसलिए तलाक की प्रक्रिया पूरी होने में तीन महीने का जिक्र है। यही नहीं, तलाक देने वाले व्यक्ति को अगर अपने किए पर पछतावा हो और वह अपनी पत्नी के साथ फिर से जिंदगी गुजारने की इच्छा रखता हो तो उसे न चाहते हुए भी निकाहे-हलाला जैसा रास्ता अपनाना पड़ता है। इसके तहत उसकी बीवी का किसी और के साथ निकाह पढ़वाया जाता है और फिर तलाक के बाद ही वह अपने पूर्व शौहर की तरफ पलट सकती है। जबकि निकाहे-हलाला का जो त्वरित तरीका प्रचलित है उसका इस्लाम में कोई वर्णन नहीं है। बस यह रीति चल पड़ी।
इस्लाम में माना गया है कि परिवार का आरंभ निकाह से होता है जिसमें बंध जाने के बाद मर्द और औरत, जिंदगी भर के लिए एक दूसरे के साथी बन जाते हैं। ऐसे में भला इतने पवित्र बंधन को इस्लाम एक झटके में तोड़ने की इजाजत कैसे दे सकता है। अलबत्ता अगर ये रिश्ता एक दूसरे के लिए खुशनुमा एहसास की बजाए मुसीबत बन जाए तो ऐसी स्थिति में तलाक की इजाजत है। हालांकि तलाक के फैसले पर पुनर्विचार करने और समझौता करने की पूरी गुंजाइश रखी गई है। इस अवधि में मर्द और औरत को एक ही छत के नीचे रहने तक की छूट दी गई है। इस अवधि में अगर दोनों के बीच सम्बंध स्थापित हो जाते हैं तो तलाक की प्रक्रिया स्वयं निरस्त हो जाती है।
अलबत्ता तीन महीने की समायवधि पूरी होने पर भी अगर मियां-बीवी में कोई समझौता न हो सके तो तीसरी बार तलाक कहने पर भी तलाक की प्रक्रिया पूरी हो जाती है। दिलचस्प बात यह है कि तलाक होने के बाद भी मर्दों को अपनी बीवी के साथ अच्छा सलूक करने, मेहर की रकम अदा करने और अच्छे तरीके से घर से विदा करने की बात कही गई है। जिस धर्म में पति-पत्नी के रिश्तों का इतना मान रखा गया हो वह एक साथ तीन तलाक जैसी अमानवीय प्रथा को कैसे उचित ठहरा सकता है।


 
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