राजू विश्वकर्मा
भोपाल, 06 मार्च (हि.स.)। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सह सरकार्यवाह दत्तात्रेय होसबाले ने शिक्षा जगत से जुड़े सभी लोगों से आह्वान किया कि वे भारत को पुनः विश्व गुरु बनाने के लिए आगे आएं। उन्होंने कहा कि आज हमारे पास नीति है, परिवेश भी है। यदि हम संकल्प लेंगे तो आने वाले 15-20 वर्षों में यह संभव है। समाज को साथ लेने के लिए सकारात्मक आन्दोलन करें।

होसबाले शनिवार को भोपाल में ‘21वीं सदी में शिक्षक शिक्षा का कायाकल्प’ विषय पर आयोजित दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी के समापन समारोह को मुख्य अतिथि के रूप में सम्बोधित कर रहे थे। विद्या भारती उच्च शिक्षा संस्थान, मध्यप्रदेश शासन और राष्ट्रीय अध्यापक शिक्षा परिषद के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित इस संगोष्ठी के समापन सत्र में प्रदेश के स्कूल शिक्षा राज्य मंत्री इंदर सिंह परमार, एनसीटीई के अध्यक्ष विनीत जोशी, विद्या भारती उच्च शिक्षा संस्थान के अध्यक्ष कैलाश चंद्र शर्मा व चौधरी चरण सिंह विश्वविद्यालय मेरठ के कुलपति नरेन्द्र कुमार तनेजा, उपाध्यक्ष मंजूश्री सरदेशपांडे, प्रदेश संयोजक डॉ. शशिरंजन अकेला भी मंच पर उपस्थित रहे।

कार्यक्रम में होसबाले ने कहा कि राष्ट्रीय शिक्षा नीति एक महत्वपूर्ण दस्तावेज है और इसमें लाखों लोगों ने योगदान दिया है। विश्वभर के लोकतांत्रिक देशों में कहीं भी ऐसी नीति नहीं है जिसको बनाने में इतनी बड़ी संख्या में लोगों की भागीदारी हो। यह हमारे संविधान की तरह ही इसे जनता ने स्वयं के लिए बनाया है। पूर्व में भी शिक्षा जगत को लेकर अच्छी नीतियां बनाईं गईं लेकिन उनका क्रियान्वयन ठीक तरीके से नहीं हो पाया। 

उन्होंने कहा कि आज समाज में यह संकल्प दिखाई देता है कि हम भारत को विश्व के अन्य देशों के मुकाबले आगे रखें। उन्होंने कहा कि विद्या वैश्विक है, यह सार्वदेशिक है। शिक्षक अपने विद्यार्थी को मात्र एक चौथाई ही सिखाता है लेकिन वह बाकी तीन हिस्सों के लिए भी उसके मन में भावना तैयार करता है, वातावरण का निर्माण करता है। दूसरा चौथाई भाग अपनी बुद्धि से, तीसरा चौथाई भाग अपने सहपाठियों से सीखता है और अंतिम चौथा भाग वह कालक्रम में सीखता है। 

उन्होंने कहा कि समाज, सरकार और शिक्षण संस्थाओं की जिम्मेदारी है कि शिक्षक को पर्याप्त सम्मान मिले। आज कहा जाता है कि शिक्षकीय दायित्व प्रोफेशन है। शिक्षण व्यवसाय या नौकरी नहीं है। यह तपस्या, साधना और मिशन है। यदि शिक्षक को समाज में अलग से महत्व चाहिए तो उसे राष्ट्रधर्म के अनुसार जीना होगा। हमारे समाज में ऐसे हजारों उदाहरण हैं, जिसमें ऐसे शिक्षकों को विद्यार्थी अंतिम सांस तक याद रखते हैं। उन्होंने शिक्षकों से आह्वान किया कि वे शिक्षण संस्थाओं में गुणवत्ता बढ़ाने के लिए प्रयास करें। यह वर्तमान पीढ़ी का दायित्व है कि भारत की शिक्षण प्रणाली एक आदर्श मॉडल के रूप में स्थापित हो और विश्व के अन्य देश इसकी चर्चा करें।

दो दिवसीय संगोष्ठी की रिपोर्ट प्रस्तुत करते हुए चौधरी चरण सिंह विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. नरेन्द्र कुमार तनेजा ने कहा कि शिक्षा को लेकर पश्चिम की अवधारणा एकांगी है। भारत की अवधारणा विस्तृत एवं उच्च है। शिक्षा का उद्देश्य सांस्कृतिक राष्ट्रवाद को स्थापित करना है। आज शिक्षा को पैकेज के साथ जोड़कर हम देखते हैं। उन्होंने कहा कि राष्ट्रीय शिक्षा नीति बहुविषयक शिक्षक शिक्षा को व्यावहारिक रूप प्रदान करेगी। इसके लिए नवाचार को आवश्यक अंग बनाना चाहिए। 

इस अवसर पर विद्या भारती उच्च शिक्षा संस्थान के अध्यक्ष कैलाशचंद्र शर्मा ने राष्ट्रीय शिक्षा नीति को क्रियान्वित किये जाने को लेकर संस्थान की ओर से दस सदस्यीय स्थायी समिति बनाने की घोषणा की। उन्होंने कहा कि इस राष्ट्रीय संगोष्ठी के साथ 28 अन्य क्षेत्रीय संगोष्ठियों में प्राप्त सुझावों को सभी नियामक संस्थाओं को भेजा जाएगा।

हिन्दुस्थान समाचार
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