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समृद्ध भाषाओं बीच छलांग को बेताब हिन्दी

12/09/2019

(हिन्दी दिवस, 14 सितम्बर पर विशेष) 

ऋतुपर्ण दवे
'भाषा का आर्थिक स्थिति से सीधा संबंध होता है। जो समृद्ध देश हैं उनकी भाषा दुनिया के सारे लोग सीखना चाहते हैं। इसकी वजह कारोबार में आसानी भी है। भाषा की ताकत इसी से समझी जा सकती है कि अगर कोई विदेशी आपकी भाषा में केवल नमस्ते ही कर ले तो उससे तत्काल गहरा जुड़ाव हो जाता है। निश्चित रूप से यह ताकत सिर्फ भाषा में ही होती है।' प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने यह बात आज से 4 वर्ष पूर्व उज्बेकिस्तान की यात्रा के दौरान भारतीय मूल के विद्यार्थियों और निवासियों को संबोधित करते हुए कही थी। उनका इशारा साफ-साफ हिन्दी भाषा को लेकर था। लेकिन क्या आजादी के 73 बरसों के बाद भी हम भारत में हिन्दी को वह सम्मान दिला पाए हैं जिसकी वह हकदार है? क्या यह सच नहीं कि अंग्रेजी बोलने में हमें गर्व होता है और हिन्दी बोलने में हम हीनता महसूस करते हैं? यह भी नहीं पता कि कब हम इस मानसिकता को पूरी तरह से दूर कर पाने में सफल होंगे?  
दुनियाभर में तमाम दार्शनिक, लेखक और विचारक भी मानते हैं कि जहां भाषाएं अलग हैं वहां देश भी बंटा होता है। प्रसिद्ध जर्मन विचारक योहान गॉटलिप फिटे ने भी भाषा की साझा कड़ियों पर काफी जोर दिया और माना कि जहां भाषाएं अलग होती हैं, वहां राष्ट्र भी धड़ेबाजी का शिकार होता है। उनका मानना है कि एक ही भाषा बोलने वाले लोगों को प्रकृति भी कई अदृश्य कड़ियों के जरिये एक-दूसरे से बांध देती है। किसी मानवीय कला के आने से पहले ही वे एक-दूसरे को समझते भी हैं और अधिक से अधिक स्पष्ट तरीके से समझा भी देते हैं। जाने-माने भाषा विज्ञानी एडवर्ड सैपिर भी मानते हैं कि एक जैसी भाषा उन लोगों के बीच सामाजिक एकजुटता का खास संकेत बन जाती है, जो उस भाषा को बोलते हैं। इस तरह भाषा देश को जोड़ने के साथ ही सांस्कृतिक भाईचारा को विकसित करने में मदद करती है। यह विडंबना नहीं तो और क्या है कि दुनियाभर में तीसरे क्रम पर सबसे ज्यादा बोली और समझी जाने वाली भाषा हिन्दी को वो सम्मान या रुतबा आज तक नहीं मिल पाया है जिसकी वो काफी पहले से हकदार है। 
दुनिया में कितनी भाषाएं हैं? इसके भी बड़े रोचक आंकड़े हैं और इन्हीं में छुपा है हिन्दी का वजन। यूनाइटेड नेशन्स के अनुसार दुनिया में बोली जाने वाली भाषाओं की अनुमानित संख्या 6809 है। इसमें नब्बे फीसदी भाषाओं को बोलने वालों की संख्या 1 लाख से भी कम है। लगभग 150 से 200 भाषाएं ऐसी हैं जिन्हें 10 लाख से ज्यादा लोग बोलते हैं। अंग्रेजी को लेकर एक भ्रम रहता है कि दुनिया की सबसे अधिक बोले जानी वाली भाषा है। ऐसा नहीं है। वास्तव में चीन की मेंडरिन जिसे आम तौर पर मंदारिन भी कहते हैं अकेली ऐसी भाषा है जो दुनिया में सबसे ज्यादा 1.12 अरब लोगों द्वारा बोली जाती है। इसके बाद दूसरे क्रम पर स्पेनिश भाषा तथा तीसरे क्रम पर अंग्रेजी आती है। यदि इसे एक भाषाई विविधता के रुप में देखें और उर्दू मिली हिन्दी बोलने वालों को छोड़ दें तो मेंडरिन, स्पेनिश और अंग्रेजी के बाद हिन्दी दुनिया की चौथी सबसे बोली जाने वाली पहली भाषा है। लेकिन उर्दू जुबान के साथ बोली जानी वाली उर्दू मिली हिन्दी को भी जोड़ लें तो हिन्दी दुनिया की तीसरी सबसे ज्यादा बोली जाने वाली भाषा है।  
2011 की जनगणना के भाषा संबंधी आंकड़े बताते हैं कि हिन्दी भारत की सबसे तेजी से बढ़ने वाली भाषा है। 2001 से 2011 के बीच के दस सालों में हिन्दी बोलने वाले लोगों की संख्या में करीब 10 करोड़ की वृद्धि दर्ज की गई जो 25.19 प्रतिशत है। भारत में सबसे ज्यादा करीब 52 से 55 करोड़ लोग हिन्दी बोलते हैं। यानी हिन्दी को मातृभाषा के रूप बोलने वालों की संख्या तेजी से बढ़ रही है। अभी दुनिया में हिन्दी के तीसरे और चौथे क्रम को लेकर भी भ्रम बना रहता है जो 2021 की जनगणना के बाद निश्चित रूप से छंट जाएगा और हिन्दी दुनिया में तीसरे क्रम पर बोली जाने वाली भाषा के रूप में अपनी धमक दर्ज कराएगी। 
यह भी गर्व की बात है कि हमारे संविधान में 22 आधिकारिक भाषाएं शामिल हैं। इसमें हिन्दी भाषियों का प्रतिशत 41 है। अगली जनगणना आंकड़ों में यह 50 प्रतिशत या ऊपर भी जा सकता है। यही हिन्दी के वजूद को समझने के लिए काफी है। ऐसे में हिन्दी को देश की राष्ट्रभाषा बनाए जाने में हर्ज कैसा? इस बात पर गर्व भी है कि हिन्दी भारत में सबसे ज्यादा बोली और समझी जाने वाली भाषा होने के साथ-साथ नेपाल, मॉरीशस, फिजी, गुयाना, सूरीनाम, अमेरिका, जर्मनी, सिंगापुर में भी बोली जाती है। न्यूजीलैण्ड में हिन्दी वहां की सबसे ज्यादा बोली जाने वाली चौथी भाषा है। यह सब हिन्दी का दबदबा बताने को काफी है। रोमांचित करने वाला सच यह भी है कि दुनिया में भारत अकेला देश है जहां सबसे ज्यादा भाषाएं बोली जाती हैं। विविधताओं व विभिन्न संस्कृतियों और धर्मों के देश भारत में 461 भाषाएं बोली जाती हैं। उसमें भी हिन्दी का प्रतिशत लगभग 50 है। जिस पर गर्व की बजाय हम स्वतंत्रता हासिल करने के 73 वर्षों के बाद भी अंग्रेजी की दासता से मुक्त नहीं हो पाए हैं।  
हिन्दी को लेकर पूरे देश में एक आम राय बनानी होगी। विशेषकर दक्षिण में, क्योंकि वहां जब तब हिन्दी को लेकर उठती नफरत की आवाज से देश बंटा हुआ-सा दिखने लगता है। इसे बहुत ही तरीके से दुनियाभर के उदाहरणों के जरिए दूर करना होगा। ताकि, हिन्दी देश की राष्ट्रभाषा बन सके। इसको लेकर क्षेत्रीय भाषाओं की गुटबाजी से हटकर सोचना होगा। यह भी समझना और समझाना होगा कि कई दूसरे देशों के उदाहरण सामने हैं जिनकी अपनी क्षेत्रीय भाषाएं तो अलग-अलग हैं, लेकिन देश की एक ही भाषा है। दूर की बात क्या पड़ोसी देश चीन का ही उदाहरण काफी है। 
तेजी से विकसित हो रही दुनिया में राजभाषा और बोली को लेकर धड़ेबाजी के नफा-नुकसान को बारीकी से देखना होगा और अंग्रेजी को तरक्की का जरिया मानने की जरूरत का भ्रम भी तोड़ना होगा। इसी से हिन्दी के लिए ईमानदार पहल हो पाएगी। वरना हिन्दी दिवस कैलेण्डर में पड़ने वाली एक तारीख से ज्यादा कुछ नहीं रह जाएगा। 
(लेखक पत्रकार हैं।) 


 
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