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व्यापारिक युद्ध की दिशा

06/08/2019

व्यापारिक युद्ध की दिशा

गभग आधी शताब्दी तक चीन के आर्थिक कायाकल्प में सहयोगी की भूमिका निभाने के बाद अमेरिका ने उसके विरुद्ध व्यापार युद्ध छेड़ दिया है। अमेरिका और चीन विश्व की दो सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाएं हैं। परिमाण की दृष्टि से अमेरिका पहले स्थान पर है और चीन दूसरे स्थान पर। लेकिन अमेरिका की तुलना में चीन की जनसंख्या भी अधिक है और उसकी वार्षिक आर्थिक वृद्धि भी अधिक है। अब तक चीन अपने यहां कम्युनिस्ट शासन की एक शताब्दी पूरी होने पर 2049 में अमेरिका के समकक्ष होने का लक्ष्य लेकर चल रहा है। लेकिन बहुत से अमेरिकी विशेषज्ञों को लगता है कि चीन यह लक्ष्य उससे पहले ही पा सकता है। इन विशेषज्ञों का यह भी मानना है कि चीन अगर अपनी विशाल जनसंख्या को अमेरिकी जीवन स्तर उपलब्ध करने में सफल हो जाता है तो उसकी अर्थव्यवस्था अमेरिका को पीछे छोड़कर विश्व की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था हो जाएगी। विश्व की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था होने के लिए केवल अपने औद्योगिक उत्पादन को बढ़ाना ही काफी नहीं होता।

अपने आंतरिक संकल्प और साधनों से सामरिक और आर्थिक रूप से शक्तिशाली हुआ चीन अमेरिका और पश्चिमी शक्तियों के लिए कहीं अधिक घातक सिद्ध होगा। अभी डोनाल्ड ट्रम्प अपने आलोचकों की इन सब आशंकाओं को गंभीरता से लेने के लिए तैयार नहीं है। इसलिए अमेरिका और चीन के बीच व्यापारिक युद्ध का बिगुल बज गया है।

समृद्धि के साथ-साथ उसकी सुरक्षा की समस्या सामने आती है। इसलिए अगर चीन विश्व की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने का लक्ष्य लेकर चल रहा है तो उसे विश्व की सबसे बड़ी सामरिक शक्ति भी बनना पड़ेगा। वह उस दिशा में भी धीरे-धीरे आगे बढ़ रहा है। अभी वह सामरिक उपयोग की प्रौद्योगिकी में अमेरिका से काफी पीछे है। लेकिन पिछले दिनों प्रौद्योगिकी के नए क्षेत्र में उसने जिस तेजी से प्रगति की है उसने अमेरिका को चौंका दिया है। अमेरिका को लगता है कि चीन की सामरिक क्षेत्र में हो रही यह प्रगति उसकी और उसके सहयोगियों की सुरक्षा को गंभीर खतरा पैदा कर सकती है। इसलिए पिछले कुछ वर्षों से अमेरिका में यह धारणा पनप रही थी कि शक्तिशाली होने के चीन के इस अभियान को रोका जाना चाहिए। उसके लिए न केवल एक आक्रामक रणनीति आवश्यक थी बल्कि एक ऐसा नेता भी आवश्यक था जो अमेरिकी आक्रामकता का वाहक बन सके। डोनाल्ड ट्रम्प में अमेरिका को ऐसा ही नेता मिल गया है। डोनाल्ड ट्रम्प ने अपने चुनाव अभियान में चीन को एक खलनायक के रूप में चित्रित किया था। उन्होंने चीन के आर्थिक विकास में सहायक रहे होने की अब तक की अमेरिकी नीति को कठघरे में खड़ा करते हुए चीन पर आरोप लगाया था कि वह अमेरिका से धोखा कर रहा है।

डोनाल्ड ट्रम्प ने अपने चुनाव अभियान में चीन को एक खलनायक के रूप में चित्रित किया था। उन्होंने चीन के आर्थिक विकास में सहायक रहे होने की अब तक की अमेरिकी नीति को कठघरे में खड़ा करते हुए चीन पर आरोप लगाया था कि वह अमेरिका से धोखा कर रहा है।

वह अमेरिकी कंपनियों को चीनी कंपनियों के साथ संयुक्त उद्यम के लिए मजबूर करता है। उसने अपने यहां ऐसे कानून बना रखे हैं कि अमेरिकी कंपनियों को चीनी कंपनियों के साथ अपनी उन्नत प्रौद्योगिकी साझा करनी पड़ती है। चीन अमेरिकी बौद्धिक संपदा की नकल से लगाकर चोरी तक कर रहा है और मालामाल हो रहा है। उसका तंत्र केवल व्यापार के माध्यम से ही अमेरिकी बौद्धिक संपदा की चोरी नहीं करता। उसके यहां ऐसे जासूसों और हैकरों का पूरा प्रतिष्ठान पनप गया है जो अमेरिका की सामरिक उपयोग की अत्यंत उन्नत प्रौद्योगिकी चुरा रहा है। इस सबसे अमेरिका को प्रति वर्ष 225 से 600 अरब डॉलर तक नुकसान हो रहा है। डोनाल्ड ट्रम्प ने अमेरिका और चीन के बीच होने वाले व्यापार में अमेरिका को जो व्यापार घाटा उठाना पड़ रहा है, उसे भी बड़े पैमाने पर मुद्दा बनाया था। राष्ट्रपति बनने के बाद उन्होंने इन सब विषयों पर जांच शुरू करवाई। पिछले वर्ष उन्होंने चीन पर व्यापारिक घाटा कम करने के लिए दबाव डालना शुरू किया। जल्दी ही इस दबाव ने दोनों के बीच एक व्यापारिक युद्ध का स्वरूप ले लिया।

शुरू में यह आशा की जा रही थी कि दोनों देश व्यापारिक मतभेदों को पाटकर आगे बढ़ने का कोई रास्ता निकाल लेंगे। अनेक लोगों ने यह आशंका व्यक्त की कि अमेरिका और चीन के बीच व्यापारिक युद्ध बढ़ता है तो उससे अमेरिका और चीन दोनों का ही नुकसान होगा। अंतत: किसका ज्यादा नुकसान होगा, अभी कहना मुश्किल है। लेकिन व्यापार युद्ध के कारण दोनों देशों की अर्थव्यवस्था सिकुड़ेगी और उसका प्रभाव विश्वव्यापी होगा। इससे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मंदी की आशंका पैदा हो जाएगी। डोनाल्ड ट्रम्प इन सब आशंकाओं से प्रभावित होने वाले व्यक्ति नहीं हंै। उन्होंने शुरू से ही यह सोच रखा है कि चीन से व्यापारिक युद्ध में अमेरिका के सामने भी कुछ कठिनाइयां आएंगी। अपने दीर्घकालिक लक्ष्योंं को ध्यान में रखते हुए उन्हें अपनी अल्पकालिक कठिनाइयों की उपेक्षा करनी होगी। डोनाल्ड ट्रम्प ने शुरू से कहा है कि अमेरिकी कंपनियों और उनके द्वारा लाई गई प्रौद्योगिकी के सहारे चीन ने अपने यहां विनिर्माण क्षेत्र खड़ा कर लिया है। उसके यहां एक बड़ा उद्योग तंत्र खड़ा हो गया है। इस प्रक्रिया में अमेरिका में उद्योग तंत्र की बहुत क्षति हुई है। इसलिए अपनी आवश्यकता का बहुत सा सामान अमेरिका को चीन से खरीदना पड़ता है। चीन अमेरिका को निर्यात बहुत करता है, लेकिन अमेरिका से आयात बहुत कम करता है।

 समृद्धि संग बढ़ी प्रतिद्वंद्विता भी

डोनाल्ड ट्रम्प अर्थशास्त्रियों के इस मुनीमी हिसाब में अधिक पड़ने के लिए तैयार नहीं है। उनका घोषित लक्ष्य अमेरिकी उद्योगों को चीन आदि देशों से वापस अमेरिका लाना है। उनका तर्क समझने के लिए इस पूरी समस्या की पृष्ठभूमि जान लेनी चाहिए। यूरोपीय जाति की समृद्धि का आरंभ स्पेन के व्यापारिक जहाजों द्वारा अमेरिकी महाद्वीप की खोज से शुरू हुआ था। एक शताब्दी से भी कम समय में यूरोपीय अमेरिकी महाद्वीप की दस करोड़ के आबादी के अधिकांश को समाप्त करके संसार के इस एक चैथाई से अधिक, खनिज संपदा से संपन्न भूभाग पर कब्जा करने में सफल हो गए। उसके अनुकरण पर उन्होंने कनाडा आदि उत्तरी क्षेत्रों और आॅस्ट्रेलिया आदि दक्षिण-पूवी एशिया के क्षेत्रों पर कब्जा किया और उनका संसार के एक तिहाई से कहीं अधिक भूभाग पर अधिपत्य हो गया। उससे यूरोप की समृद्धि बढ़ी, वस्तुओं की मांग बढ़ी और उसने औद्योगिक क्रांति को जन्म दिया। औद्योगिक क्रांति ब्रिटेन में हुई थी। 1830 से 1870 के इस दौर में पश्चिमी विज्ञान की कोई भूमिका नहीं थी। इस भौगोलिक विस्तार ने यूरोपीय शक्तियों को अन्य क्षेत्रों में अपना औपनिवेशिक साम्राज्य खड़ा करने में सहायता दी। 19वीं शताब्दी तक यूरोपीय विश्व के अधिकांश भाग पर नियंत्रण करने में सफल हो गए थे। लेकिन यूरोप का अर्थतंत्र दासता पर टिका था। खेती और उद्योग में लगे तमाम लोग दास थे। यह दासता यूरोपीय आबादी के नव-उपनिवेशों की ओर पलायन से कुछ ढीली पड़ी। यूरोपीय दासों की जगह अफ्रीका से दास बनाकर लाए गए लोगों ने उनकी मुक्ति संभव बनाई। फ्रांसीसी क्रांति ने भी बड़े पैमाने पर प्रभुवर्ग के विशेषाधिकार समाप्त करने में भूमिका निभाई। इस सबसे जो ऊर्जा और समृद्धि आई, उसने राजनैतिक प्रतिद्वंद्विता भी पैदा की। बीसवीं सदी के पूर्वार्द्ध में दो बड़े महायुद्ध हुए। 1900 के बाद से महायुद्ध की तैयारियों ने पश्चिमी विज्ञान की उपयोगिता सिद्ध की। अमेरिका ने उस पर पहल हासिल कर ली। दोनों महायुद्ध में यूरोप का काफी विनाश हुआ। लेकिन उससे अमेरिका को संसार की प्रधान सामरिक और आर्थिक शक्ति बनने का मौका मिल गया। पश्चिमी विज्ञान के विकास में सबसे अधिक योगदान यहूदी वैज्ञानिकों का है। औपनिवेशिक साम्राज्य खड़ा करने में अन्य यूरोपीय देशों से पिछड़ गए जर्मनी को औरों के बराबर लाने के लिए बिस्मार्क ने उन आधुनिक प्रयोगशालाओं की नींव डाली थी, जहां पश्चिमी विज्ञान का विकास हुआ। लेकिन हिटलर के यहूदी विरोधी अभियान ने यहूदी वैज्ञानिकों को ब्रिटेन और अमेरिका पलायन करने के लिए विवश कर दिया। यूरोपीय जाति की नृशंसता दोहराते हुए हिटलर ने करीब 60 लाख यहूदियों का नरसंहार किया था। पलायन करके अमेरिका में बसे यहूदियों ने अमेरिका को पश्चिमी विज्ञान के माध्यम से एक विकसित सामरिक तंत्र खड़ा करने में मदद की। दूसरे महायुद्ध के बाद सामरिक उद्देश्य से खड़ा हुआ औद्योगिक तंत्र आम नागरिकों के उपयोग की वस्तुएं पैदा करने में लगा दिया गया। 1950 से 1970 तक इस तंत्र द्वारा यूरोप-अमेरिकी भौतिक जीवन का कायाकल्प कर दिया गया। लेकिन इस औद्योगिक तंत्र ने कुछ समस्याएं भी पैदा की। उनसे प्रदूषण काफी बढ़ा और मजदूर यूनियनों ने भी अमेरिका के शासक वर्ग को काफी परेशान किया। इन दोनों समस्याओं से मुक्ति पाने के लिए अमेरिकी उद्योग तंत्र को चीन आदि एशियाई देशों में स्थानांतरित करने का निर्णय हुआ। स्टालिन की मृत्यु के बाद चीन रूसी खेमे से अलग हो गया था। शीत युद्ध में पड़े अमेरिका को चीन से संबंध जोड़ने का यह सुनहरा मौका दिखाई दिया था। 1971 में साम्यवाद से घृणा के बावजूद अमेरिका ने चीन से संबंध बनाए। पिछले पांच दशक में इस अमेरिकी सहयोग की बदौलत चीन अपना औद्योगिक तंत्र खड़ा करने में सफल हो गया है और अब वह अमेरिकी सामरिक और आर्थिक प्रभुत्व को चुनौती देने की स्थिति में आ गया है। इस पृष्ठभूमि की दो बातें याद रखने योग्य हैं। पहली यह कि यूरोपीय जाति ने यह समृद्धि विश्वभर में व्यापक नरसंहार और उत्पीड़न के आधार खड़ी की है। बीसवीं सदी में उसकी समृद्धि पश्चिमी विज्ञान और प्रौद्योगिकी के विकास का प्रतिफलन थी। लेकिन यह प्रौद्योगिकी मूलत: सामारिक उद्योगों के लिए विकसित हुई थी। आज भी उसका मूल प्रयोजन पश्चिमी शक्तियों की सामरिक वरीयता बनाए रखना है।

अमेरिकी उद्योग तंत्र के सिकुड़ जाने से अमेरिका में रोजगार घटा है। रोजगार की कमी के कारण अमेरिकियों के सामने आर्थिक और सामाजिक समस्याएं पैदा हो गई हैं। उन कठिनाइयों को दूर करने के लिए अमेरिकी उद्योगों को वापस अमेरिका लाना आवश्यक है। इस व्यापार युद्ध के द्वारा वह यही लक्ष्य पाने का प्रयत्न कर रहे हैं। अब तक चीन डोनाल्ड ट्रम्प की व्यापार युद्ध की धमकी को केवल व्यापार घाटा पाटने के सीमित संदर्भ में देखने की कोशिश करता रहा। इसलिए उसने आशा की कि वह अमेरिका से निर्यात बढ़ाकर और अपने यहां के बौद्धिक संपदा कानूनों को कुछ अधिक सख्त बनाकर डोनाल्ड ट्रम्प को संतुष्ट कर सकता है। अब तक की बातचीत में चीन इसी रणनीति पर चल रहा था। लेकिन अमेरिकी वार्ताकार अपनी मांगें बढ़ाते गए और पिछली वार्ता के दौरान चीनी वार्ताकारों को लगा कि अमेरिकी मांगों को स्वीकार करने का मतलब होगा अमेरिका के सामने समर्पण कर देना। इसका चीन के भीतर यही संदेश जाएगा कि राष्ट्रपति शी ने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के सामने घुटने टेक दिए हैं। इसलिए चीनी वार्ताकार वार्ता से पीछे हट गए। इस व्यापारिक युद्ध में डोनाल्ड ट्रम्प के हाथ में तात्कालिक हथियार चीन से आयात होने वाली वस्तुओं पर सीमा शुल्क बढ़ा देना है।

अमेरिका और चीन के बीच व्यापार का परिमाण काफी बड़ा है। पिछले वर्ष अमेरिका और चीन के बीच 737.1 अरब डॉलर का व्यापार हुआ था। इसमें से अमेरिका ने 179.3 अरब डॉलर का सामान चीन को बेचा था और 557.9 अरब डॉलर का सामान उससे खरीदा था। इसका अर्थ हुआ कि 2018 में अमेरिका को चीन के हाथों 378.6 अरब डॉलर का व्यापारिक घाटा उठाना पड़ा था। चीन पर यह व्यापारिक घाटा पाटने का दबाव बनाने के लिए अब तक अमेरिका उसके 200 अरब डॉलर के सामान पर दस प्रतिशत सीमा शुल्क लगा चुका है। अब उसने धमकी दी है कि शेष 350 अरब डॉलर के सामान पर भी वह 25 प्रतिशत की दर से सीमा शुल्क लगा देगा। डोनाल्ड ट्रम्प ने कहा है कि इससे अमेरिकी बाजार में चीनी माल महंगा हो जाएगा। अमेरिकी नागरिकों को कुछ कठिनाइयां होंगी, लेकिन सीमा शुल्क के रूप में अमेरिका को जो सौ अरब डॉलर मिलेगा, उसे वे अपने कृषि उद्योग को सहारा देने पर खर्च करेंगे। वे कृषि क्षेत्र से सामान खरीदेंगे और भूख के शिकार बने देशों को मदद के तौर पर वह सामान भेज देंगे। उनका तर्क यह है कि सीमा शुल्क से आया पैसा कृषि क्षेत्र को सहारा देगा तो अमेरिकी अर्थव्यवस्था पर उसका सकारात्मक असर होगा।

चीन ने पलटकर अमेरिकी वस्तुओं पर उतना ही सीमा शुल्क लगाने की घोषणा की है। लेकिन इस व्यापारिक युद्ध में चीन कम से कम तात्कालिक रूप से घाटे में रहेगा। क्योंकि उसका अमेरिकी निर्यात आयात से तीन गुना है। यह हिसाब-किताब कागज पर जितना सीधा दिखाई देता है, उतना है नहीं। कई अमेरिकी अर्थशास्त्री ने याद दिलाया है कि चीन एक नियंत्रित अर्थव्यवस्था है। उसके पास साधनों की भी कमी नहीं है। वह अमेरिकी वस्तुओं के बढ़े दामों को बाजार पर बोझ बनने से रोक सकता है। लेकिन अमेरिका एक खुली अर्थव्यवस्था है, वह ऐसा नहीं कर सकता। चीन भारत की तरह ही एक प्राचीन सभ्यता है और उसका परंपरागत जीवन विधि निषेधों पर ही आधारित था। भारत की तरह चीन भी लंबे समय अपने उत्तरवर्ती कबीलाई योद्धा समूहों के अधीन रहा। 1800 के आसपास चीन के विदेशी मांचू शासकों को पराभूत कर यूरोपीय शक्तियों को उन पर अपमानजनक संधियां लादने का मौका मिल गया था। फिर जापान का चीन पर हमला हुआ और चीन दूसरे महायुद्ध में यूरोपीय शक्तियों के पाले में चला गया। वह मित्र राष्ट्रों का सहयोगी बना। इस सब प्रक्रिया में वहां कम्युनिस्ट विचारधारा फैली और 1949 में चीन पर कम्युनिस्ट शासन हो गया। सभी जगह कम्युनिस्ट क्रांतियां एक निरंकुश शासन के द्वारा औद्योगिक शक्ति बनने का लक्ष्य लेकर ही चली हैं।

चीन ने भी यूरोपीय जाति की समृद्धि का अमानुषिक इतिहास भूलकर उस जैसी समृद्धि पाने की लालसा रखी। आज वह उस दिशा में काफी आगे बढ़ने में सफल अवश्य हुआ है, लेकिन उसकी सफलता से वैसी ही सामरिक प्रतिद्वंद्विता जगती दिखाई दे रही है जैसी पहले महायुद्ध से पूर्व यूरोप में जगी थी। अभी इस प्रतिद्वंद्विता का स्वरूप व्यापारिक है लेकिन अमेरिका और चीन दोनों जानते हैं कि यह प्रतिद्वंद्विता अंतत: सामरिक प्रतिद्वंद्विता में बदलने वाली है। अभी अमेरिका न केवल संसार की सबसे बड़ी सामरिक शक्ति है बल्कि सामरिक प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में भी वह चीन से बहुत आगे है। इसलिए अमेरिकियों में यह आत्मविश्वास है कि वे समय रहते चीन के रास्ते में ऐसी बाधाएं खड़ी कर सकते हैं कि उसे अमेरिकी प्रभुत्व को चुनौती देने से रोका जा सके। उसके लिए वे दोहरी रणनीति अपना रहे हैं। वे चीन की आर्थिक प्रगति को बाधित करना चाहते हैं और उसे अमेरिकी बाजार से वंचित करना चाहते हैं। दूसरे वे अमेरिकी प्रौद्योगिकी के चीन को स्थानांतरण पर रोक लगा देना चाहते हैं।

कुछ अमेरिकी विशेषज्ञों ने डोनाल्ड ट्रम्प की इस रणनीति की सफलता पर प्रश्नचिह्न लगाए हैं। उन्हें लगता है कि चीन इतना आगे जा चुका है कि उसे अब आगे बढ़ने से रोकना मुश्किल है। डोनाल्ड ट्रम्प के आलोचकों के दो तर्क है। उनका पहला तर्क यह है कि अमेरिकी कंपनियां अब केवल अमेरिकी कंपनियां नहीं है। वे बहुराष्ट्रीय कंपनियां हैं और उनकी निष्ठा अमेरिका से अधिक अपने मुनाफों में है। इसलिए अगर चीन से आयात पर अंकुश लगाकर उन्हें चीन छोड़ने के लिए मजबूर किया गया तो वे सस्ते श्रम की खोज में अन्य एशियाई देशों में जाएंगी। चीन बहुत सारी कंपनियों को वियतनाम आदि देशों में स्थानांतरित करवाने में लगा है, जो चीनी आयात पर लगे प्रतिबंधों के दायरे में नहीं आते। अमेरिकी कंपनियां भारत समेत अन्य एशियाई देशों में भी जा सकती है। दूसरे, चीन से प्रौद्योगिकी के स्तर पर सहयोग समाप्त करके अमेरिका उसकी प्रौद्योगिकी उन्नति बाधित करने में सफल हो ही जाए, यह आवश्यक नहीं है। प्रौद्योगिकी किसी एक जाति की प्रतिभा से बंधी नहीं है।

चीन को विवश किया गया तो उसका आंतरिक संकल्प और प्रबल हो सकता है। चीनी शासक अपने लोगों में राष्ट्रीय आकांक्षा दृढ़ करके उन्हें प्रौद्योगिकी विकास में अपने आपको झोंकने के लिए प्रेरित कर सकते हैं। अपने आंतरिक संकल्प और साधनों से सामरिक और आर्थिक रूप से शक्तिशाली हुआ चीन अमेरिका और पश्चिमी शक्तियों के लिए कहीं अधिक घातक सिद्ध होगा। अभी डोनाल्ड ट्रम्प अपने आलोचकों की इन सब आशंकाओं को गंभीरता से लेने के लिए तैयार नहीं है। इसलिए अमेरिका और चीन के बीच व्यापारिक युद्ध का बिगुल बज गया है। यह बिगुल दोनों तरफ से ही बजता दिख रहा है। इसलिए जल्दी ही उसका कोई अंतिम समाधान निकल आएगा, इसकी आशा नहीं है। चीन इस उम्मीद में है कि राष्ट्रपति के अगले चुनाव में शायद डोनाल्ड ट्रम्प फिर न चुने जाएं। डोनाल्ड ट्रम्प को उम्मीद है कि चीन अपनी आर्थिक कठिनाइयों के कारण समझौता करने के लिए विवश होगा। अमेरिका धीरे-धीरे उस पर अपना नियंत्रण बढ़ाएगा और उसे अमेरिकी प्रभुत्व के लिए चुनौती बनने से रोक देगा।


 
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