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पूरा हुआ राष्ट्रीय संकल्प

18/09/2019

पूरा हुआ राष्ट्रीय संकल्प

बनवारी

धारा 370 समाप्त करने से कश्मीर समस्या की जड़ पर प्रहार हुआ है। लेकिन कश्मीर समस्या में अभी भी विषवेल की तरह बने रहने की क्षमता है। उसे पूरी तरह समाप्त करने के लिए यह आवश्यक है कि उसे किस तरह की परिस्थितियों में फलने-फूलने का अवसर मिला, किस तरह के नेतृत्व ने और किस तरह के विचारों ने उसे पैदा होने और विकट होते जाने में सहायता की, इसे ठीक से समझा जाए और उन शक्तियों और विचारों का पूरी तरह निराकरण कर दिया जाए।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जम्मू-कश्मीर को विशेष दर्जा देने वाली धारा 370 को समाप्त करके एक राष्ट्रीय संकल्प पूरा किया है। पिछले 30 वर्ष से यह धारा पूरे देश को कुंठित किए हुए थी। उसका सहारा लेकर पाकिस्तान कश्मीर को विवाद का मुद्दा बनाए हुए था। इस विवाद के कारण अब तक हम पाकिस्तान से कई युद्ध लड़ चुके हैं। युद्ध के द्वारा अपना लक्ष्य न पाते देख 1989 से पाकिस्तान आतंकवाद के जरिए भारत के मनोबल को तोड़ने की कोशिश करता रहा है। पाकिस्तान को लेकर हमारा नेतृत्व अब तक दुविधाग्रस्त बना हुआ था। अब तक हम कश्मीर की रक्षा अपनी सेना के शौर्य और अपने सैनिकों के बलिदान के कारण ही कर पाए हैं। इस समस्या को हल करने के जो भी तरीके हो सकते थे, उनका उपयोग करके इस समस्या का अंत करने का प्रयत्न किया गया। लेकिन न हम पाकिस्तान को इसके लिए तैयार कर पाए और न ही उन मुट्ठीभर कश्मीरी नेताओं को, जिन्होंने इस समस्या को बनाए रखने में अपने निहित स्वार्थ बना लिए थे।

शेख अब्दुल्ला की राजनीतिक धारा अब तक कई शाखाओं में बंट चुकी है। लेकिन इस धारा के और जमायत-एइस् लामी की धारा के सभी नेता कश्मीर में अलगाववाद को ही पोषित-पल्लवित करने में लगे रहे। इस सबके कारण पूरा देश इस समस्या को निर्मूल करने वाले किसी कदम की बाट जोह रहा था। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृहमंत्री अमित शाह ने देश के लोगों की उसी आकांक्षा को पूरा किया है। हमें यह याद रखना चाहिए कि कश्मीर समस्या मुस्लिम समस्या से जुड़ी हुई है। मुस्लिम समस्या मध्य एशिया में वहाबी इस्लाम के उभार और भारत में ब्रिटिश राज की नीतियों का मिलाजुला परिणाम थी। 18वीं शताब्दी में मराठा शक्ति के उभार से देश में मुस्लिम शासकों की शक्ति क्षीण हो गई थी। लेकिन उसी दौर में मुसलमानों में शाह वलीलुल्लाह और रायबरेली के सैयद अहमद जैसे नेता पैदा हुए।

उन्होंने मध्य एशिया में उभरते कट्टरपंथी वहाबी इस्लाम से प्रेरणा ली और मुसलमानों में अलगाव को गहरा किया। 1857 की क्रांति की विफलता के बाद इसी का फायदा ब्रिटिश शासकों ने उठाया। अपने शासन को दृढ़ता प्रदान करने के लिए उन्होंने मुसलमानों में असुरक्षा की भावना पैदा की। बंगाल आर्मी समाप्त करके जो नई सेना खड़ी की गई, उसमें अधिकांश भर्ती भारत के पश्चिमोत्तर से की गई थी। पंजाब के मुस्लिम और सीमा प्रांत के पठान उसमें बहुतायत में थे। उनमें यह भावना भरी गई कि वे मार्शल रेस हैं और कायर हिन्दुओं को आसानी से अपने वश में कर सकते हैं। इन दोनों विरोधी भावनाओं को आत्मसात करते हुए 1906 में मुस्लिम लीग का जन्म हुआ था। मुस्लिम लीग के गठन में ब्रिटिश शासकों की बड़ी भूमिका थी। लेकिन देश के मुसलमानों में काफी विविधता थी। गांधी जी के नेतृत्व ने जिस तरह देश को ओतप्रोत कर रखा था, उसमें मुस्लिम लीग के पनपने की अधिक गुंजाइश नहीं थी।

जम्मू-कश्मीर के 26 दिसम्बर 1947 को भारत में हुए विलय को जवाहर लाल नेहरू के दुविधाग्रस्त मन और अदूरदर्शी नीतियों ने दो देशों के बीच के एक विवाद में बदल दिया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृहमंत्री अमित शाह ने देश के लोगों की उसी आकांक्षा को पूरा किया है। हमें यह याद रखना चाहिए कि कश्मीर समस्या मुस्लिम समस्या से जुड़ी हुई है।

पर गोलमेज सम्मेलन के माध्यम से तथा सर सैयद अहमद और मोहम्मद अली जिन्ना जैसे नेताओं को आगे बढ़ाकर अंग्रेज अपनी कोशिश में लगे रहे। महात्मा गांधी की शक्ति को क्षीण करने के लिए उन्होंने मुस्लिम लीग को मुस्लिम बहुल इलाकों के लिए एक अलग राज्य मांगने की प्रेरणा दी। 1930 से पहले मुस्लिम लीग की इस मांग में कश्मीर शामिल नहीं था। अलग राज्य की मांग में कश्मीर को शामिल करवाने का काम मोहम्मद इकबाल ने किया। वे कश्मीरी थे और मुस्लिम लीग के 29 दिसम्बर 1930 के राष्ट्रीय अधिवेशन में द्वि-राष्ट्र सिद्धांत उन्हीं ने प्रतिपादित किया था। उन्हीं ने जिन्ना को पाकिस्तान की मांग के लिए तैयार किया था। उस समय जम्मू-कश्मीर में डोगरा शासक थे। महात्मा गांधी ने अपने राष्ट्रीय आंदोलन को रजवाड़ों से अलग रखा हुआ था। गांधी जी के पिता स्वयं गुजरात के एक रजवाड़े में दीवान रहे थे। उनको रजवाड़ों की ठीक जानकारी थी और उनमें रजवाड़ों के बारे में नकारात्मक धारणा नहीं थी।

अंग्रेजी शिक्षा में पारंगत होकर 1930 के आसपास कांग्रेस में एक नई पीढ़ी का उभार हुआ। अपने पिता मोतीलाल के सहारे जवाहर लाल नेहरू को उनमें अग्रणी भूमिका मिल गई। जवाहर लाल नेहरू राजा-महाराजाओं को सामंती युग का प्रतिगामी अवशेष समझते थे। उनका वश चलता तो वे सभी देसी रियासतों के खिलाफ मोर्चा खोल देते। उन्होंने कश्मीर की परिस्थितियों को जाने-देखे बिना ही डोगरा शासकों के बारे में नकारात्मक धारणा बना रखी थी। वही समय था जब शेख अब्दुल्ला अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय में दाखिल हुए। उन्होंने मौलवी अब्दुल्ला के नेतृत्व में मुस्लिम कांफ्रेंस बनाई। कहा गया है कि अलीगढ़ विश्वविद्यालय में वे प्रगतिशील धारा के संपर्क में आए और कश्मीर के राजतंत्र का विरोध करने का संकल्प लिया। लेकिन अलीगढ़ विश्वविद्यालय की प्रगतिशील धारा ने केवल कश्मीर के हिन्दू राजा के खिलाफ ही क्यों प्रेरित किया। किसी मुस्लिम शासक के खिलाफ तो वहां से प्रेरणा पाकर कोई आंदोलन नहीं हुआ।

अब तक पूरे होते रहे स्वार्थ

इस पूरे मामले को अब तक इतना उलझाकर दिखाया जाता रहा है कि सुप्रीम कोर्ट भी भारतीय संविधान के साथ किए गए इस सरासर धोखे पर कोई निर्णय नहीं कर सका। पूरा देश जिस धारा 370 को संदेह की दृष्टि से देखता हो, उसे सामान्य प्रक्रियाओं के जरिए हटाने का कोई रास्ता नहीं छोड़ा गया था। पाकिस्तान के दुस्साहस के कारण कश्मीर समस्या गंभीर होती जा रही थी। ऐसी स्थिति में ऐसे ही आपात आॅपरेशन की आवश्यकता थी, जैसा मोदी सरकार ने किया है। उसे पूरे देश का समर्थन मिला है। लोकसभा में कांग्रेस संसदीय दल के नेता अधीर रंजन चौधरी ने जो कहा, वह चाहे जितना अटपटा हो, पर उन्होंने वही कहा है जो वे नेहरू-कांग्रेस के अब तक के सभी प्रधानमंत्रियों को करते-कहते देखते आए हैं। जवाहर लाल नेहरू ने जम्मू-कश्मीर का भारत में संपूर्ण विलय नहीं होने दिया, उसे अंतरराष्ट्रीय मुद्दा बनाया और फिर बाद के सभी कांग्रेसी प्रधानमंत्री उसे भारत-पाकिस्तान के बीच का विवाद मानते रहे। वे यह अवश्य कहते रहे कि जम्मू-कश्मीर भारत का अभिन्न अंग है। लेकिन धारा 370 के बने रहने के कारण पाकिस्तान यह दोहराता रहा कि जम्मू-कश्मीर के भाग्य का निर्णय उसके निवासियों की इच्छा के अनुरूप अभी होना है और उसके इस कथन का अंतर्निहित भाव यह था कि कश्मीर मुस्लिम बहुल होने के कारण पाकिस्तान को मिलना चाहिए। कश्मीर में जमायते-इस्लामी भी यही मानती और प्रचारित करती थी और उससे निकले हुर्रियत के कुछ नेता खुले रूप में और कुछ दबे-ढंके रूप में राजनीति को इसी दिशा में ले जाने की कोशिश करते रहे हैं। मुμती परिवार अपने राजनीतिक फायदे के लिए इसी भावना को बढ़ाता रहा। अब्दुल्ला परिवार हमेशा कश्मीरियत की और कश्मीरी राष्ट्रवाद की बात करता था और जम्मू-कश्मीर को अपने अधीन एक स्वतंत्र राज्य बनाने के सपने देखता था। यह सपना 1971 के बाद टूट अवश्य गया। 1971 के युद्ध में भारत की निर्णायक विजय और पाकिस्तान के विभाजन से उसे यह समझ में आ गया कि भारत इन सब विग्रहकारी शक्तियों के लिए दुर्जेय है। फिर भी वे धारा 370 का दुरुपयोग करते हुए जम्मू-कश्मीर के राज्य तंत्र को सांप्रदायिक स्वरूप देने में लगे रहे। कांग्रेस ने हिन्दू और मुसलमानों की बात की, पर उसकी कमान हमेशा मुस्लिम नेताओं के हाथ में रही। इन सब शक्तियों के शासन में जम्मू और लद्दाख क्षेत्र से अन्याय होता रहा। कश्मीरी आत्मनिर्णय के नाम पर मुस्लिम आक्रामकता को फलने-फूलने दिया गया, जिसकी परिणति कश्मीरी पंडितों के कश्मीर घाटी से निष्कासन के रूप में हुई। कश्मीरी पंडितों पर हुए बर्बर अत्याचार के समय कश्मीरियत का नारा लगाने वाले नेता चुप्पी साधे रहे।

यह भी उल्लेखनीय है कि शेख अब्दुल्ला और उनकी मंडली ने मुस्लिम कांफ्रेंस बनाई, जबकि कश्मीर में केवल मुस्लिम आबादी नहीं थी। 1937 में शेख अब्दुल्ला का संपर्क जवाहर लाल नेहरू से हुआ। वे उनके डोगरा राज के खिलाफ प्रकट किए गए विचारों से इतने प्रभावित हुए कि नेहरू ने आंख मूंदकर शेख अब्दुल्ला को ताकतवर बनाने में मदद की। शेख अब्दुल्ला ने स्वीकार किया है कि केवल मुसलमानों के बल पर वे डोगरा राज्य के खिलाफ आंदोलन नहीं छेड़ सकते थे। पर दूसरे समुदाय उन पर विश्वास नहीं करते थे। जवाहर लाल नेहरू ने मुस्लिम कांफ्रेंस का नाम बदलकर नेशनल कांफ्रेंस करने की प्रेरणा दी। शेख अब्दुल्ला द्वारा 1946 में महाराजा के विरुद्ध छेड़े गए कश्मीर छोड़ो आंदोलन की असफलता से स्पष्ट है कि तब तक भी जम्मू-कश्मीर में उनकी अधिक लोकप्रियता नहीं थी। लेकिन जवाहर लाल नेहरू ने महाराजा हरि सिंह पर निरंतर दबाव डालकर शेख अब्दुल्ला को सत्ता की सीढ़ियां चढ़ने में मदद दी।

स्वयं शेख अब्दुल्ला ने बाद में यह स्वीकार किया कि कश्मीर के डोगरा राजा कुशल प्रशासक थे और महाराजा हरि सिंह के राज के बारे में उनकी धारणा गलत थी। महाराजा हरि सिंह यह देख रहे थे कि कांग्रेस नेतृत्व, विशेषकर जवाहर लाल नेहरू शेख अब्दुल्ला को आगे बढ़ाने में लगे थे। वैसे भी डोगरा शासन प्रथम एंग्लो-सिख युद्ध के बाद हुई 1846 की अमृतसर संधि का परिणाम था। अंग्रेजी राज द्वारा उन्हें विशेष दर्जा दिया गया था। इसलिए अन्य रजवाड़ों की तरह उन्होंने स्वत:भारतीय संघ में सम्मिलित हो जाने का फैसला नहीं किया। उनके राज्य की मुस्लिम बहुलता भी उनके मन में कुछ शंकाएं पैदा कर रही थीं। वे भारत और पाकिस्तान से अलग एक स्वतंत्र राज्य का सपना देख रहे थे। जब पाकिस्तान ने चतुराई से कश्मीर पर कबाइली हमला करवाया तो मजबूर होकर महाराजा हरि सिंह को भारत से सहायता मांगनी पड़ी। ब्रिटिश कूटनीति उस समय स्वतंत्र भारत को दबाव में बनाए रखने के रास्ते ढूंढ़ रही थी। माउंटबेटन बड़ी चतुराई से इस कोशिश में लगे थे। उधर पाकिस्तान के ब्रिटिश अफसर पाकिस्तानी शासकों की भारत के विरुद्ध हरसंभव सहायता में लगे थे। किसी भी कुशल राजनेता को यह सब समझ में आ जाना चाहिए था।

सरदार पटेल यह सब देख समझ रहे थे। लेकिन नेहरू एक तरफ माउंटबेटन के प्रभाव में थे, दूसरी तरफ शेख अब्दुल्ला के। नेहरू को कश्मीर पर पाकिस्तानी आक्रमण के समय भारतीय सेना को कश्मीर भेजने में भी दुविधा हो रही थी। पटेल ने चतुराई से यह निर्णय करवाया, तब तक पाकिस्तान अपने प्रछन्न आक्रमण के जरिये जम्मू- कश्मीर रियासत के 45 प्रतिशत भाग पर कब्जा कर चुका था। सेना ने श्रीनगर की सुरक्षा सुनिश्चित करके मुजμफराबाद की दिशा में बढ़ने की योजना बनाई, लेकिन जवाहर लाल नेहरू ने उन्हें रोक दिया। उन्होंने रेडियो पर एकतरफा सीजफायर की घोषणा की और सबके मना करने के बावजूद माउंटबेटन की सलाह पर कश्मीर को द्विपक्षीय विवाद का दर्जा देकर संयुक्त राष्ट्र में ले गए। इधर,शेख अब्दुल्ला कश्मीर के प्रतिनिधि के रूप में संविधान सभा में नामजद किए गए।

अपनी इस हैसियत से उन्होंने कश्मीर को विशेष दर्जा दिए जाने की मांग की। धारा 370 इसी का परिणाम थी। नेहरू ने पटेल को, गृहमंत्री होने के बावजूद, कश्मीर मामले से अलग रखने के लिए कश्मीर की जिम्मेदारी अपने विश्वास पात्र एन. गोपालस्वामी अयंगार को मंत्री पद देकर सौंप दी। पटेल ने इस्तीफा दे दिया पर नेहरू ने गांधी जी को बीच में डालकर उसे वापस करवा दिया। संविधान सभा में शेख अब्दुल्ला के प्रस्ताव की तीखी आलोचना हुई। उसका स्वीकार होना मुश्किल था। नेहरू उस समय विदेश में थे। उन्होंने पटेल की राय जानते हुए भी निर्लज्जतापूर्वक उनसे यह प्रस्ताव संविधान सभा द्वारा स्वीकार करवाने का आग्रह किया। नेहरू का मान रखने के लिए पटेल ने यह किया। लेकिन कहा कि एक दिन नेहरू अपने इस कर्म पर रोएगा। जम्मू-कश्मीर के 26 दिसम्बर 1947 को भारत में हुए विलय को जवाहर लाल नेहरू के दुविधाग्रस्त मन और अदूरदर्शी नीतियों ने दो देशों के बीच के एक विवाद में बदल दिया।

उन्हें न पाकिस्तान के इरादे समझ में आए न शेख अब्दुल्ला के। शेख अब्दुल्ला की महत्वाकांक्षा कश्मीर का स्वतंत्र शासक होने की थी। भारतीय सेना के श्रीनगर पहुंचने से पहले उसकी रक्षा के लिए शेख अब्दुल्ला ने जो सशस्त्र स्वयंसेवक तैयार किए थे,उन्हें उन्होंने कश्मीर सेना का स्वरूप दे दिया। उसके बाद संविधान में यह व्यवस्था करवा ली कि जम्मू-कश्मीर का अलग संविधान और झंडा होगा और उसमें कोई परिवर्तन उसकी संविधान सभा की सहमति के बिना नहीं किया जा सकेगा। हमारे संविधान निर्माताओं के सामने यह सब मानने की कोई मजबूरी नहीं थी। यह सब नेहरू की अदूरदर्शिता के कारण हुआ। जल्दी ही शेख अब्दुल्ला की महत्वाकांक्षा प्रकट होने लगी। 1953 में नेहरू को उन्हें सत्ता से बाहर करके जेल भिजवाना पड़ा। 11 वर्ष जेल में बिताने के बाद उन्होंने नेहरू को प्रभावित करके फिर अपने को रिहा करवा लिया। नेहरू से उन्होंने कहा कि भारत-पाकिस्तान का महासंघ बन जाए तो कश्मीर सुरक्षा सुलझ जाएगी।

नेहरू की स्वीकृति पाकर वे पाकिस्तान जाकर अयूब खान से मिले। अयूब खान ने उनके प्रस्ताव का मजाक ही उड़ाया। इस बीच नेहरू की मृत्यु हो गई। अयूब खान ने यह मान करके कि नेहरू की मृत्यु के बाद भारत का नेतृत्व कमजोर हो गया होगा, 1965 में भारत पर हमला कर दिया। इस युद्ध के द्वारा अयूब कश्मीर को भारत से छीनना चाहते थे, लेकिन वे सफल नहीं हुए। इस युद्ध में भारतीय सेना ने पाकिस्तान के कुछ इलाकों में अग्रता पा ली, पर जीते हुए क्षेत्रों को ताशकंद समझौते के अंतर्गत वापस कर दिया गया। संविधान में धारा 370 शामिल करवाने के लिए जवाहर लाल नेहरू ने कहा था कि वह केवल अस्थायी व्यवस्था है, समय के साथ समाप्त हो जाएगी। लेकिन समाप्त करवाने की कोई कोशिश नहीं की गई। जम्मू-कश्मीर की संविधान सभा को 1956 में भंग कर दिए जाने के बाद उसे हटाने का रास्ता बंद मान लिया गया। यह स्पष्ट था कि भारत की संविधान सभा को धोखे में रखकर यह धारा जोड़ी गई थी, इसलिए उसे हटाने का भारी दबाव था। 1964 में जब उसे हटाने के लिए प्रकाश वीर शास्त्री ने संसद में एक निजी विधेयक प्रस्तुत किया था तो लगभग सभी दलों ने उसे हटाए जाने का समर्थन किया था। लेकिन कांग्रेस नेतृत्व उसके लिए तैयार नहीं हुआ।

1965 में पाकिस्तान के इरादे साफ हो जाने के बाद कांग्रेस नेतृत्व कश्मीर की स्थिति में सीमित परिवर्तन के लिए तैयार हुआ। सदर-ए-रियासत के पद को बदलकर गर्वनर कर दिया गया और प्रधानमंत्री के पद को मुख्यमंत्री कर दिया गया। लेकिन इससे कश्मीर की स्थिति पर विशेष अंतर नहीं पड़ा। यह आश्चर्य की बात है कि कांग्रेस सरकारें विभिन्न संशोधनों के द्वारा धारा 370 को कमजोर करती रहीं, लेकिन उसे हटाने की हिम्मत नहीं जुटा पाई। शेख अब्दुल्ला उसके साथ-साथ 35ए को एक संवैधानिक धोखे की तरह संविधान में जुड़वाने में भी सफल हो गए थे, जिसके द्वारा कश्मीर के स्थायी निवासियों की व्याख्या की गई थी और कश्मीर को शेष देशवासियों के स्थायी निवास के लिए अगम्य बना दिया गया था। इन सब व्यवस्थाओं में कश्मीर के राजनेताओं के निहित स्वार्थ पनप गए। वे इन सभी व्यवस्थाओं को केंद्रीय नेताओं को ब्लैकमेल करने के लिए इस्तेमाल करते रहे। केंद्रीय नेताओं को दबाव में रखने के लिए उन्होंने राज्य में अलगाववाद को खूब बढ़ावा दिया।

जिस कश्मीर में 1947 के आक्रमण के समय पाकिस्तान को कोई अपना समर्थक नहीं मिला था, वहां आए दिए पाकिस्तानी झंडे और नारे लगते दिखाई देने लगे। जिन शेख अब्दुल्ला को कश्मीर षड्यंत्र केस में 1953 में जेल भेजा गया था और 1964 में रिहा किए जाने के बाद भी एकाधिक बार कश्मीर से निष्कासित किया गया था, उन्हीं से 1975 में इंदिरा गांधी ने समझौता करके फिर से कश्मीर की गद्दी उन्हें सौंप दी। शेख अब्दुल्ला शेष जीवन कश्मीर के मुख्यमंत्री बने रहे। उनकी मृत्यु के बाद उनके पुत्र फारूक अब्दुल्ला मुख्यमंत्री बने। फिर उनके पुत्र उमर अब्दुल्ला को भी मुख्यमंत्री चुने जाने का अवसर मिला। इस बीच मुμती मोहम्मद सईद मुख्यमंत्री बने, उनकी मृत्यु के बाद उनकी बेटी महबूबा मुμती मुख्यमंत्री बनी। कश्मीर में अलगाववाद भड़काने में मुख्य भूमिका अब्दुल्ला परिवार और जमायते-इस्लामी की रही है। मुμती की पार्टी पीडीपी जमायते- इस्लामी का राजनीतिक अवतार है।

कल तक यह दोनों परिवार धारा 370 और 35ए से कोई छेड़छाड़ हुई तो कश्मीर में तिरंगा थामने वाला भी कोई नहीं मिलेगा और कश्मीर का भारत से संबंध टूट जाएगा, जैसी आक्रामक भाषा बोल रहे थे। यह सब कश्मीर को विवादग्रस्त बनाए रखने में योगदान देते रहे हैं और दूसरी तरफ कश्मीर समस्या सुलझाने के लिए पाकिस्तान से बात किए जाने की मांग करते रहे हैं। दरअसल इन दोनों परिवारों की भूमिका देशद्रोह के दायरे में ही आती है। फिर भी उन्हें अब तक काफी छूट मिलती रही है। कांग्रेस के नेता भी लगातार यही दोहरा रहे हैं कि धारा 370 जम्मू-कश्मीर के विधायी तंत्र की सहमति से ही हटाई जानी चाहिए थी। वे इस तथ्य से अंधे बने हुए हैं कि जम्मू-कश्मीर का विधायी तंत्र योजनापूर्वक जम्मू और लद्दाख की अनदेखी करते हुए कश्मीर की मुस्लिम आबादी की प्रधानता बनाए रखने के लिए गढ़ा जाता रहा।

सीमाओं की दूरगामी सुरक्षा थी जरूरी

भारत के शिखर नेताओं को दूसरे महायुद्ध के अनुभव से यह सीख न मिले कि स्वतंत्र होते देश को सबसे पहले अपनी सीमाओं की दूरगामी सुरक्षा सुनिश्चित करनी चाहिए, यह बड़े आश्चर्य की बात है। लेकिन जवाहर लाल नेहरू के दिमाग में दूर-दूर तक कहीं यह चिंता नहीं थी। दूसरी तरफ चीन के कम्युनिस्ट नेताओं ने सत्ता में पहुंचते ही मंचूरिया, मंगोलिया के बड़े भाग पर और समूचे तिब्बत पर कब्जा जमा लिया। आज चीन का 55 प्रतिशत भाग यही जबरन अधिगृहीत क्षेत्र हैं। इसके द्वारा चीन ने अपने दूरगामी सामरिक लक्ष्य सुनिश्चित करने की कोशिश की थी। तिब्बत और शिनजियांग पर उसके नियंत्रण ने हमारी सुरक्षा को खतरे में डाल रखा है। नेहरू ने यह सब न समझते हुए बड़ी आसानी से तिब्बत पर चीन का कब्जा होने दिया। ब्रिटिश शासकों ने किस योजना से पाकिस्तान बनवाया था, इसकी भी वे निरंतर अनदेखी करते रहे। उन्होंने शेख अब्दुल्ला की महत्वाकांक्षा को भांपने में भी गलती की। महाराजा हरि सिंह द्वारा कश्मीर राज्य के भारत में विलय की स्वीकृति के बाद तेजी से हमें उसके समूचे भाग पर नियंत्रण कर लेना चाहिए था। ऐसा करने के लिए हम समर्थ थे, लेकिन नेहरू ने ऐसा नहीं होने दिया। चीन के काराकोरम मार्ग बना लेने और अक्साई-चिन पर नियंत्रण के बाद भी नेहरू को इन सभी क्षेत्रों का सामरिक महत्व समझ में नहीं आया। शेख अब्दुल्ला को उन्होंने कश्मीर सौंपकर देश की सुरक्षा से बड़ी खिलवाड़ की थी।

कश्मीर की मुस्लिम आबादी में सांप्रदायिक आवेश पैदा किया जाता रहा और असुरक्षा की कल्पित भावना पैदा करके उन्हें केंद्र के विरुद्ध किया गया। इसके साथ ही साथ पाकिस्तान के आतंकवादी तंत्र को भी पैर फैलाने का अवसर उपलब्ध किया जाता रहा। क्या इन सब सांप्रदायिक और निहित स्वार्थी शक्तियों से सहमति लेकर धारा 370 समाप्त की जा सकती थी? कांग्रेस का अपराध यह है कि यह सब जानते-बूझते भी वह इन्हीं सब शक्तियों की रक्षा और वकालत करती रही है। अपने वैचारिकों भ्रमों और दुराग्रहों के चलते वह कश्मीर को दो देशों के बीच का विवाद बनाए रही। पूरा देश कश्मीर को विवाद के रूप में नहीं, समस्या के रूप में देखता था और उस समस्या का निराकरण करने के पहले और सबसे आवश्यक कदम के रूप में धारा 370 को हटाना अनिवार्य समझता था।

यह केवल श्यामा प्रसाद मुखर्जी, भारतीय जनसंघ या भारतीय जनता पार्टी का एजेंडा नहीं था। यह भारतीय जनता का राष्ट्रीय संकल्प था, जिसे अपनी गहरी निष्ठा के कारण केवल भारतीय जनता पार्टी और नरेंद्र मोदी ही पूरा कर सकते थे। धारा 370 के विरोध में होने के बावजूद भी पहले वाजपेयी सरकार ने और फिर नरेंद्र मोदी ने अपने पहले पांच वर्ष के शासन में एक कदम आगे बढ़ाकर पाकिस्तान से समझौता करने की कोशिश की थी। पाकिस्तान ने क्या किया है, यह सर्वविदित है। फिर भी कांग्रेस के भीतर मणिशंकर अय्यर, पी. चिदंबरम और कपिल सिब्बल जैसे लोग ही मुखर रहे, जिनकी भाषा पाकिस्तान की पक्षधरता करते हुए ही दिखती रही है।

जवाहर लाल नेहरू एक दुविधाग्रस्त व्यक्ति थे, जो वैचारिक दुराग्रहों से कभी निकल नहीं पाए। उन्हें सामरिक विषयों की कोई समझ नहीं थी। यह दुर्भाग्य की बात है कि कांग्रेस आज तक उन्हीं की थाती ढो रही है। इस कांगे्रसी दृष्टि से सोचने वाला एक बड़ा बुद्धिजीवी वर्ग पैदा कर दिया गया है। यह तत्व इस मुद्दे को अदालत ले जाने की कोशिश करेंगे। इस समय विश्व की परिस्थितियां पाकिस्तान के प्रतिकूल हैं। आतंकवाद एक अंतरराष्ट्रीय मुद्दा बना हुआ है और जेहादी शक्तियों को पालने-पोसने वाली शक्तियां अब रक्षात्मक होने के लिए विवश हैं। भारत के आम मुसलमानों ने जेहादी शक्तियों को अधिक प्रश्रय नहीं दिया। लेकिन इस्लाम अपने अनुयायियों को अन्य मतावलंबियों से अलगाव बनाए रखने के लिए प्रेरित करता है।

पूरा देश कश्मीर को विवाद के रूप में नहीं, समस्या के रूप में देखता था और उस समस्या का निराकरण करने के पहले और सबसे आवश्यक कदम के रूप में धारा 370 को हटाना अनिवार्य समझता था। यह केवल श्यामा प्रसाद मुखर्जी, भारतीय जनसंघ या भारतीय जनता पार्टी का एजेंडा नहीं था। यह भारतीय जनता का राष्ट्रीय संकल्प था।

उसकी यही प्रवृत्ति अब तक हमारे यहां हिन्दू-मुस्लिम एकता में बाधक रही है। इस्लाम की जो शिक्षाएं इस अलगाव को बढ़ाती हैं, उन्हें भारतीय मुसलमानों से अस्वीकार करवाने की कोशिश होनी चाहिए। यह जिम्मेदारी भारत के मुस्लिम नेताओं पर डाली जानी चाहिए कि वे इसमें सहायक हों। जिस दिन ऐसा हो जाएगा, उस दिन भारतीय महाद्वीप का विभाजन भी समाप्त हो जाएगा। आज संसार में भारतवंशियों की संख्या सबसे अधिक है। भारत, पाकिस्तान और बांग्लादेश मिलाकर भारतवंशियों की आबादी पौने दो अरब के आसपास है। वे संसार के किसी भी अन्य जातीय समूह से अधिक हैं। यूरोपीय और चीनियों से भी। यह सब मिलाकर भारतवंशियों के अतुलनीय उत्कर्ष का माध्यम बन सकते हैं। यह उत्कर्ष भारतीय सभ्यता का ही उत्कर्ष होगा, जिसका सपना महात्मा गांधी समेत हमारे पिछली सदी के अनेक मनीषियों ने देखा था।


 
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