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यह राष्ट्र हिंदू और मुसलमान सबका है

25/11/2019

यह राष्ट्र हिंदू और मुसलमान सबका है


राम जन्मभूमि आंदोलन में वैसे तो अनगिनत लोगों का योगदान रहा, लेकिन जिन प्रमुख व्यक्तियों का नाम हमेशा चर्चा में रहा है, उनमें अशोक सिंघल, आचार्य गिरिराज किशोर, विष्णुहरि डालमिया, कल्याण सिंह, लालकृष्ण आडवाणी, डॉ. मुरली मनोहर जोशी, चंपत राय, साध्वी ऋतंभरा, उमा भारती और विनय कटियार प्रमुख हैं। श्रीराम जन्मभूमि का यह आंदोलन सामाजिक और कानूनी दो मोर्चों पर लड़ा गया। विश्व हिंदू परिषद के अंतरराष्ट्रीय उपाध्यक्ष चंपत राय ऐसे व्यक्तित्व हैं, जो वर्ष 1985 से सामाजिक मोर्चे पर तो सक्रिय थे ही, बाद में कानूनी लड़ाई के लिए भी दिन-रात पूरी तन्मयता के साथ जुटे रहे। जन्मभूमि के स्वामित्व को लेकर सुप्रीम कोर्ट का फैसला आने के बाद चंपत राय से हिन्दुस्थान समाचार के मुख्य उप-संपादक पवन कुमार अरविंद ने बातचीत की। प्रस्तुत है उसके प्रमुख अंश :

 श्रीराम जन्मभूमि पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले को आप किस रूप में देखते हैं?

मैं बहुत अच्छे रूप में देखता हूं। स्वतंत्र भारत के इतिहास में हिन्दू संस्कृति, हिन्दू मूल्य और हिन्दुओं की भावनाओं को न्यायालय ने स्वीकार किया है। यह शायद स्वतंत्र भारत की न्यायिक प्रक्रिया का पहला केस है। मैं निजी रूप में सोच रहा हूं कि 130 करोड़ की अधिकांश जनता का समाधान इसमें हुआ है। कोई हार गया, कोई जीत गया, ऐसा इस केस में नहीं हुआ है। निर्मोही अखाड़े का केस समय-सीमा के बाहर काल वाह्य घोषित हो गया, लेकिन उनको संतुष्ट भी किया कि सरकार मंदिर के प्रबंध तंत्र में उनको रखे। सुप्रीम कोर्ट ने मुसलमानों के मुकदमे को स्वीकार किया, लेकिन उस स्थान पर उनका अधिकार नहीं है। उनका मालिकाना हक नहीं है।

न्यायाधीशों ने जिस परिपक्वता का परिचय दिया है, मैं तो वकील नहीं हूं लेकिन एक फरियादी के रूप में मुझे बहुत संतोष हुआ। 40 दिन तक रोज चार घंटे एक ही बात सुनते रहना, कोई वकील एक ही बात को आठ से दस बार रिपीट कर रहा है, धैर्य से सुनते रहना, मैं तो समझता हूं कि बड़ी भारी तपस्या है।

उनका एडवर्स पजेशन यानी विपरीत कब्जा भी नहीं है। यह भी कह दिया। उनको संतुष्ट कर दिया कि मुस्लिम समुदाय को कहीं जमीन दो। वैज्ञानिक तथ्यों को स्वीकार किया। इतिहास के दस्तावेज, किताबें, गजेटियर, विदेशी यात्रियों के द्वारा लिखी गयी पुस्तकों में वर्णन, इन सबको उन्होंने स्वीकार किया। न्यायाधीशों ने जिस परिपक्वता का परिचय दिया है, मैं तो वकील नहीं हूं लेकिन एक फरियादी के रूप में मुझे बहुत संतोष हुआ। 40 दिन तक रोज चार घंटे एक ही बात सुनते रहना, कोई वकील एक ही बात को आठ से दस बार रिपीट कर रहा है, धैर्य से सुनते रहना, मैं तो समझता हूं कि यह बड़ी भारी तपस्या है।

 इस फैसले में चीफ जस्टिस की दृढ़ता की भी कोई भूमिका है?

वो अगर दृढ़ न होते तो शायद दूसरा कोई आदमी कर पाता कि नहीं कर पाता, यह कल्पना से परे है। बड़ी दृढ़ता से उन्होंने काम लिया। सभी न्यायाधीश एक जैसे होते हैं। केवल प्रशासनिक कार्यों के लिए किसी एक वरिष्ठतम की जिम्मेदारी होती है। उन्होंने अपनी वरिष्ठता का पूरा-पूरा उपयोग किया।

 मुस्लिम पक्ष को पांच एकड़ भूमि क्या 14 कोसी परिक्रमा मार्ग के बाहर दी जाएगी, आपका क्या कहना है?

कुछ मालूम नहीं। जमीन खोजी जाएगी, लंबी प्रक्रिया है। हम इतने तक ही संतुष्ट हैं कि आज वो सारा स्थान हिंदू समाज का हो गया, भगवान का हो गया। वहां केवल मंदिर बनेगा। जनता की भावनाएं तो केवल इतनी ही थीं। जमीन कहां देंगे, अभी तक कुछ तय नहीं, मुझे तो नहीं मालूम। इसलिए अभी कोई ज्यादा चिंता नहीं कर रहे हैं।

 हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के फैसले में कितनी साम्यता है?

हाईकोर्ट ने अपनी सीमाओं के बाहर जाकर विचाराधीन भूमि के तीन टुकड़े किए थे। सुप्रीम कोर्ट ने वह भूमि भगवान को सौंप दी। हाईकोर्ट ने भी निर्मोही अखाड़े का सूट रद्द किया था, इन्होंने भी कर दिया। सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के निर्णय को कहीं भी पलटा नहीं और एक-आध फाइंडिंग (निर्णय)तो पलटती ही है, तभी तो अपील है।

 सुप्रीम कोर्ट द्वारा नियुक्त मध्यस्थता पैनल विफल रहा, इस बारे में अब कुछ बताना चाहेंगे?

सफलता पर बोलना अच्छा लगता है, विफलता पर क्या बोलें। उनके सुझाव ही कुछ ऐसे थे, जो मान्य नहीं हो सकते थे। मुझे नहीं समझ में आ रहा है कि जो उन्होंने सुझाव प्रस्तुत किये थे, वो उनको दिये किसने। मैं चाहूंगा कि स्वयं उस मध्यस्थता पैनल के मुखिया इब्राहिम कलीफुल्ला जो सुप्रीम कोर्ट के रिटायर्ड जज हैं, वह अपने मुंह से बखान करें कि हमने ये समाधान दिया था। मेरा बोलना अच्छा नहीं। वार्तालाप गुप्त थी लेकिन उसके बाद भी उन्होंने लिखित में दिये थे। 130 करोड़ जनता अपने आप उसका फैसला कर लेगी कि वो स्वाकार्य थे कि नहीं थे।

 मंदिर निर्माण एवं उसके प्रबंधन के लिए बनने वाले ट्रस्ट में निर्मोही अखाड़े को शामिल करने की बात है। इस पर क्या कहना चाहेंगे?

यह बहुत अच्छा है। मैं इसीलिए कह रहा हूं कि चीफ जस्टिस आॅफ इंडिया और न्यायाधीशें की बेंच ने सबका समाधान कर दिया है। उनका मुकदमा रद्द कर दिया। उन्होंने अपने मुकदमे में मंदिर का प्रबंधन सौंपने की मांग की थी। अपने फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने कह दिया कि भारत सरकार जो प्रबंध तंत्र बनाए, उसमें निर्मोही अखाड़े को भी शामिल करे। सुप्रीम कोर्ट ने सभी पक्षों को संतुष्ट कर दिया।

 रामलला विराजमान पक्ष का दावा था कि जो जन्मस्थान है वो भी देवता है, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने यह दावा नहीं माना।

वह स्थान तो मान लिया कि यह जन्मभूमि है। न्यायालय सारी बातें मान लेगा, यह अपेक्षा करना भी गलत है। न्यायालय इसी का तो नाम है कि उसने सबकी बात मान ली। थोड़ी-थोड़ी मान ली और थोड़ी-थोड़ी छोड़ दी।

 फैसले से आप पूरी तरह से संतुष्ट हैं?

हां, पूरी तरह से। हम चाहते हैं कि देश के अंदर इसे हार और जीत के रूप में नहीं लेना चाहिए। ये राष्ट्र के गौरव और राष्ट्र के सम्मान की पुनर्प्रतिष्ठा का विषय है। इसे हिंदू और मुसलमान का विषय नहीं बनाना चाहिए। यह राष्ट्र हिंदू और मुसलमान सबका है। एक जिम्मेदार नागरिक के रूप में इसको स्वीकारना चाहिए कि आखिर पांच शताब्दी के बाद एक समस्या को कोई हल सामने आ गया।

 राममंदिर आंदोलन के विचार का प्रादुर्भाव कैसे हुआ?

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के स्वयंसेवकों ने पश्चिमी उत्तर प्रदेश में हिंदू जागरण मंच नाम की एक संस्था बना ली। यह मंच है, संगठन नहीं। उसके मुखिया वर्ष 1983 में थे दिनेश त्यागी। वह संघ के प्रचारक थे। बाद में वह संघ से मुक्त हुए और हिंदू महासभा के अध्यक्ष बने। अध्यक्ष पद से मुक्त होने के बाद विश्व हिंदू परिषद के कार्यालय में रहने लगे। इस समय अस्वस्थ हैं। वो मुजμफरनगर में 23 मार्च 1983 को हुए हिंदू जागरण मंच के सम्मेलन के संयोजक थे। उसमें उत्तर प्रदेश सरकार के पूर्व मंत्री दाऊ दयाल खन्ना और गुलजारी लाल नंदा आए थे। खन्ना ने अपने भाषण में हिंदुओं का आह्वान किया कि देश आजाद हुए इतने वर्ष हो गए हैं। अब अयोध्या, मथुरा और काशी को मुक्त कराना चाहिए। उनका आह्वान एक तरह से संघ के स्वयंसेवकों के लिए ज्यादा था। वह हिंदू सम्मेलन था, स्वयंसेवकों का सम्मेलन नहीं था। उनके इस बात को अशोक सिंहल जी ने समझने की चेष्टा की। अशोक जी तब विश्व हिंदू परिषद में संयुक्त महामंत्री बन चुके थे। फिर ये बात आयी कि यह तो संतों को समझना चाहिए। इसके बाद दिल्ली के विज्ञान भवन में सात-आठ अप्रैल 1984 को देशभर के संतों का दो दिवसीय अधिवेशन हुआ। इसको विश्व हिंदू परिषद ने धर्म संसद नाम दिया। यहां भी दाऊ दयाल खन्ना ने अयोध्या, मथुरा और काशी को मुक्त कराने का आह्वान किया। संतों को आनंद आ गया। यहीं से विश्व हिंदू परिषद का राममंदिर आंदोलन में प्रवेश हुआ। धर्म संसद में ही श्रीराम जन्मभूमि मुक्ति यज्ञ समिति का गठन किया गया था।

 क्या अब मथुरा की बारी है?

ये भविष्य की बात है। जिम्मेदार संगठन के लिए यह महत्वपूर्ण बात है कि जो प्रश्न हाथ में लिया, पहले उसका पूरा समाधान कर दो। पूरा समाधान तब होगा जब मंदिर बन जाएगा, भगवान की प्रतिष्ठा हो जाएगी। पताका चढ़ जाएगा। जब तक आंदोलन चल रहा था, तब तक मर्यादा में कुछ भी बोलते रहने के लिए हम स्वतंत्र थे। अब हमें करना है। बोलने और करने का अंतर हम समझते हैं। इसलिए हम ये कहेंगे कि पहले इसको पूरा देख लो। उसके बाद की पीढ़ी उसको सोचेगी। अभी हम तो इसी एक मिशन के लिए अपने को समर्पित किये हुए हैं।



 
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