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गोटबाया, भारत को कितना भाया

11/12/2019

गोटबाया, भारत को कितना भाया


श्रीलंका में हाल ही में हुए चुनाव में राष्ट्रपति पद के लिए गोटबाया राजपक्षे का चुना जाना तय माना जा रहा था। राजपक्षे श्रीलंका पोडुजाना पेरामा (एसएलपीपी) की ओर से चुनाव मैदान में उतरे थे। साल 2016 में पुनर्गठित यह पार्टी सिंहली बौद्ध बहुसंख्यकवाद में विश्वास करती है। राजपक्षे को करीब 52 फीसदी वोट मिले। उन्होंने अपने प्रतिद्वंद्वी और समावेशी राष्ट्रवाद की ओर झुकाव रखने वाली यूनाइटेड नेशनल पार्टी के उम्मीदवार सजीत प्रेमदास को 13 लाख से ज्यादा मतों से पराजित किया। श्रीलंका में राष्ट्रपति शासन प्रणाली है और राष्ट्रपति के पास सारी कार्यकारी शक्तियां होती हैं, जबकि दक्षिण एशिया के ज्यादातर देशों में संसदीय शासन प्रणाली की सरकार है। राजपक्षे के चुने जाने के तुरंत बाद प्रधानमंत्री शनिल विक्रमासिंघे ने त्यागपत्र दे दिया, ताकि राष्ट्रपति अपनी कैबिनेट का गठन कर सकें। हालांकि संसद में बहुमत उनके साथ था। गोटबाया राजपक्षे ने अपने बड़े भाई और दो बार श्रीलंका के राष्ट्रपति रहे महिंद्रा राजपक्षे को प्रधानमंत्री नियुक्त किया। महिंद्रा राजपक्षे जब राष्ट्रपति थे तो गोटबाया रक्षा सचिव के तौर पर अपनी सेवाएं दे चुके थे।गोटबाया राजपक्षे को सिंहली बौद्ध समुदाय के 80 फीसदी वोट मिले, जबकि तमिल (11.2 फीसदी) और मुस्लिम (9.7 फीसदी) समुदाय के बमुश्किल 20 फीसदी वोट मिले, जिनकी संख्या उत्तरी और पूर्वी हिस्से में ज्यादा है। ज्यादातर मुस्लिम तमिलभाषी हैं जबकि कई सिंहली मूल के हैं। वहीं दूसरी ओर 80 फीसदी तमिल और मुस्लिम ने सजीत प्रेमदास को वोट दिए।

इस बार ऐसा लगा कि लोकतंत्र के ऊपर सुरक्षा और राष्ट्रीय एकता की उम्मीद के साथ प्रभुत्ववादी सरकार मतदाताओं की पसंद थी। यद्यपि गोटबाया राजपक्षे ने स्वीकार किया कि सिंहली बौद्ध समुदाय से उन्हें वोट मिलता रहा है, बाद में उन्होंने यह भी कहा कि जिन्होंने उन्हें वोट नहीं दिया, वह उनके लिए भी काम करेंगे।

सत्तारूढ़ गठबंधन युनाइटेड पीपुल्स फ्रीडम एलाइंस (यूपीएफए) की हार के कई कारण रहे। यूपीएफ अंदरूनी तौर पर विभाजित था और अंतर्कलह से कमजोर हो चुका था। यूपीएफए में शामिल पार्टियां स्थानीय निकाय के चुनाव में अलग-अलग उतरीं और महिंद्रा राजपक्षे के गठबंधन से पराजित हो गयी थीं। तत्कालीन राष्ट्रपति मैत्रिपाल सिरीसेना ने उस वक्Þत के प्रधानमंत्री विक्रमसिंघे को पूर्ण बहुमत में होने के बावजूद बर्खास्त कर उनकी जगह महिंद्रा राजपक्षे को नियुक्त कर दिया। इससे देश में संवैधानिक संकट खड़ा हो गया और सुप्रीम कोर्ट के दखल के बाद विक्रमसिंघे अपने पद पर बहाल हुए थे। सजीत प्रेमदास की उम्मीदवारी में सितंबर आखिर तक इसलिए देरी हुई क्योंकि युनाइटेड नेशनल पार्टी के नेता विक्रमसिंघे और उपनेता प्रेमदास के बीच आंतरिक टकराव की स्थिति रही। नया डेमोक्रेटिक फ्रंट जिसने प्रेमदास को स्पांसर किया, चुनाव के महज कुछ हμते पहले बना। इन सभी का नतीजा रहा कि प्रेमदास को प्रभावी चुनाव प्रचार और अपने कार्यक्रम व नीतियां लोगों तक पहुंचाने के लिए कम वक्त मिल पाया।वोट के ध्रुवीकरण के साथ सांप्रदायिक लकीर खींचने के पीछे सबसे बड़ा फैक्टर बमबारी की घटना का रहा, जिसमें ईस्टर पर रविवार के दिन चर्चों में प्रार्थना के लिए जमा हुए क्रिश्चियन समुदाय को निशाना बनाया गया था।

गत 21 अप्रैल को तीन चर्चों और कोलंबो के तीन लग्जरी होटलों में फिदाइन हमलावरों ने सिलसिलेवार धमाके किए थे। इस्लामिक स्टेट ने इन धमाकों की जिम्मेदारी ली थी, जिसमें 250 से 300 लोग मारे गए थे। प्रधानमंत्री ने स्वीकार किया था कि रक्षा मंत्रालय को आतंकवादी हमलों की खुफिया जानकारी थी। रक्षा मंत्रालय तत्कालीन राष्ट्रपति सिरीसेना के पास था। खुफिया जानकारी होने के बावजूद आतंकी हमले को रोका नहीं जा सका। ऐसा प्रतीत होता है कि इसने सिंहली और बौद्ध समुदाय को क्रोधित कर दिया। साल 2014 के राष्ट्रपति चुनाव में तमिल और सिंहली, बौद्ध और मुस्लिम, क्रिश्चियन और हिंदू समुदाय ने ज्यादा लोकतांत्रिक और जवाबदेह सरकार के लिए महिंद्रा राजपक्षे के खिलाफ वोट दिए थे। गोटबाया रक्षा सचिव और बासिल राजपक्षे आर्थिक विकास मंत्री थे। गोटबाया अपने गृहनगर में संग्रहालय की इमारत के लिए 185000 यूएस डॉलर के गबन का सामना कर रहे थे। एलटीटीई के खिलाफ लड़ाई के दौरान उनपर युद्ध अपराध के कई आरोप लगे थे। इस लड़ाई में एक लाख से ज्यादा सैनिक और नागरिक घायल हुए थे, इनमें एलटीटीई के वे लीडर भी थे, जिन्होंने हथियार समेत समर्पण किया था। हालांकि ईस्टर पर आतंकी हमले के बाद सिरीसेना और विक्रमसिंघे की सरकार के खिलाफ कमजोर स्थिति नाटकीय रूप से बदली, जो कि कमजोर समझ ली गयी।

जबकि तमिल और मुस्लिमों का राजपक्षे बंधुओं पर भरोसा कम है, जिन सिंहली बौद्धों ने युद्धोपरांत सुलह और लोकतांत्रिक जवाबदेह सरकार के लिए वोट किया था, इसबार गोटबाया को राष्ट्रपति के लिए वोट दे दिया। इसबार ऐसा लगा कि लोकतंत्र के ऊपर सुरक्षा और राष्ट्रीय एकता की उम्मीद के साथ प्रभुत्ववादी सरकार मतदाताओं की पसंद थी। यद्यपि गोटबाया ने स्वीकार किया कि सिंहली बौद्ध समुदाय से उन्हें वोट मिलता रहा है, बाद में उन्होंने यह भी कहा कि जिन्होंने उन्हें वोट नहीं दियाए वह उनके लिए भी काम करेंगे और तमिल बाहुल्य उत्तरी राज्य का भी विकास करेंगे। हालांकि यह बयान राजनीतिक रूप से ज्यादा दुरुस्त हो सकता है। आतंकी हमले का नतीजा यह हुआ कि सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर इस्लामोफोबिया सवार हो गया।

भारत की उलझन

राजपक्षे बंधु चीन के साथ करीबी के पक्षधर माने जाते हैं। महिंद्रा के राष्ट्रपति पद के कार्यकाल 2004 से 2014 तक चीन ने इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट और पोर्ट पर भारी-भरकम निवेश किया, जिनमें सात बिलियन यूएस डॉलर की लागत से हम्बनटोटा बंदरगाह का निर्माण शामिल है। श्रीलंका के लिए चीन सैन्य उपकरणों का स्रोत रहा है और वह श्रीलंका के सैन्य बलों के विस्तार व आधुनिकीकरण में मददगार है। चीन ने एंटीटैंक गाइडेड मिसाइल,रॉकेट लॉन्चर समेत कई और हथियार निर्यात किए हैं। श्रीलंका और चीन के रिश्तों में सुधार भारत के लिए चिंता का कारण हो सकता है। हालांकि राजपक्षे ने आश्वस्त किया है कि भारत की कीमत पर ऐसा नहीं हो सकता है। उन्होंने कहा कि चीन अगर करीबी दोस्त है तो भारत रिश्तेदार है और रिश्तेदार हमेशा के लिए होते हैं। भारत, श्रीलंका का बहुत बड़ा कारोबारी पार्टनर है। भारत से काफी संख्या में पर्यटक वहां जाते हैं। राजपक्षे सरकार की तमिल पॉलिसी पर भारत की निगाह रहेगी और वह तमिल मसले का सम्मानजनक समाधान चाहेगा।

सोशल मीडिया ने सिंहली बौद्ध समुदाय के सदस्यों में डर और असुरक्षा को तीव्र कर दिया। इसने यह सुदृढ़ कर दिया कि मजबूत सिंहली बौद्ध बहुसंख्यकवादी राष्ट्रवाद के साथ मजबूत सरकार और ऐसा कद्दावर नेता चाहिए जो शीघ्र और निर्णायक फैसले ले सके। इस्लामोफोबिया की लहर ने बोधु बाला सेना को भी मजबूती दी, यह सिंहली बौद्ध चरमपंथी संगठन है जो तमिलों, मुस्लिमों और क्रिश्चियन के राष्ट्रीय मुख्यधारा में बलपूर्वक एकीकरण और दूसरी सभी पहचान को हाशिए पर डालने की वकालत करता है। बोधु बाला सेना ने मुस्लिम महिलाओं के बुर्का डालने और हलाल मांस की सभी दुकानें बंद करने की मुहिम छेड़ रखी है, जो कि मुस्लिम संस्कृति का प्रतिनिधित्व करते हैं।

नवनिर्वाचित राष्ट्रपति के सामने चुनौतियां

श्रीलंका को आर्थिक संकट से निकालकर विकास के रास्ते पर ले जाना पहली प्राथमिकता होगी। श्रीलंका चाय, कपड़े, मसाले और चावल के निर्यात पर निर्भर है। 90 फीसदी विदेशी मुद्रा प्रवासियों के जरिए आती है जो कि श्रीलंका के मजदूर पश्चिम एशिया में अपने रोजगार से इकट्ठा करते हैं। इन सभी क्षेत्रों में विकास करना होगा। शिक्षा का क्षेत्र, आरएंडटी (अनुसंधान और विकास) दूसरी प्राथमिकता होनी चाहिए, अगर देश को आगे बढ़ाना है। आर्थिक संपन्नता के लिए निरंतर राजनीतिक स्थिरता और न्यायसंगत सरकार देनी होगी जो कि कानून व्यवस्था दे और मानवाधिकार का सम्मान करे। शासन प्रणाली में सुधार जरूरी है जो तमिल मुद्दे का सम्मानजनक और न्यायसंगत समाधान सुनिश्चित कर सके और गृहयुद्ध के जख्मों पर मरहम लगा सके। तमिल और अन्य अल्पसंख्यकों के बलपूर्वक एकीकरण की प्रभुत्ववादी कार्यवाही राजनीतिक अस्थिरता पैदा करेगी।


 
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