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ऐतिहासिक जीत की अंतर्कथा

11/12/2019

ऐतिहासिक जीत की अंतर्कथा

मित शाह ने भाजपा को कैसे अजेय बनाया? यह कौतुहल का विषय बना रहा है। राजनीतिक दलों के लिए आश्चर्य का मसला है। उन्होंने तो कभी सोचा भी नहीं था कि भाजपा को हराना दिवास्वप्न हो जाएगा। मौजूदा समय में ऐसा हुआ है। लेकिन सवाल है कैसे? उसका जवाब ‘भारत कैसे हुआ मोदीमय?’ में है। लिखा वरिष्ठ पत्रकार संतोष कुमार ने है। प्रभात प्रकाशन ने छापा है। यह किताब अमित शाह के राजनीतिक प्रबंधन की कहानी है। उसे लेखक ने आठ खंड़ों और 31 अध्यायों में समेटा है। इसमें शाह के अध्यक्ष बनने से लेकर2019 तक की कहानी दर्ज है। मोटे तौर पर किताब में तीन बातों को समेटा गया है। पहला सरकार और संघ के बीच समंवय का मसला। अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार में दोनों के बीच समंवय नहीं था। दोनों में ठनी रहती थी। उस दौर में संघ प्रमुख ने कई बार सरकार को आड़े हाथ लिया था। इस वजह से सरकार की किरकिरी भी होती थी और चुनाव में नुकसान भी। अमित शाह ने उससे सीखा और अध्यक्ष बनने के बाद संघ के साथ समंवय के लिए चार स्तरीय समिति बनाई। संघ के शीर्ष नेताओं से बातचीत करने के लिए एक अलग समूह बनाया गया।

किताब अमित शाह के राजनीतिक प्रबंधन की कहानी है। उसे लेखक ने आठ खंड़ों और 31 अध्यायों में समेटा है। इसमें शाह के अध्यक्ष बनने से लेकर 2019 तक की कहानी दर्ज है। मोटे तौर पर किताब में तीन बातों को समेटा गया है।

किसान संघ से समंवय के लिए कृषि मंत्री, सामाजिक न्याय मंत्री और श्रम मंत्री को रखा गया। स्वदेशी जागरण मंच के लिए श्रम मंत्री और वित्त राज्यमंत्री को लगाया गया। मजदूर संघ से मेलजोल बनाए रखने के लिए पीयूष गोयल और धर्मेन्द्र प्रधान को तैनात किया गया। यही वजह रही है कि जीएम क्राप, बीमा और श्रम जैसे मसलों पर संघ के किसी बड़े नेता का सार्वजनिक बयान नहीं आया। इससे सरकार की छवि को धक्का नहीं पहुंचा। दूसरी बात जो किताब में प्रमुखता से है, वह संगठनात्मक बदलाव पर है। अमित शाह ने कमान संभालने के बाद पार्टी के संविधान में बदलाव कराया। इस बदलाव ने पार्टी की सवर्णवादी छवि को तोड़ने में काफी मदद की। हुआ यूं कि जिन राज्यों में40 से ज्यादा लोकसभा सीटें थी, वहां पर पदाधिकारियों की संख्या बढ़ा दी गई। उत्तर प्रदेश के जरिए किताब में इसे समझाया गया है। वहां पर सुनील बसंल को अमित शाह ने जिम्मा सौंपा था। इरादा सूबे के किले को भेदना था। लिहाजा सुनील बसंल ने अमित शाह की रणनीति के हिसाब से चाल चली। पदाधिकारियों की संख्या बढ़ाना शुरू कर दिया। लेकिन एक एतिहात बरता। उन्होंने पुराने पदाधिकारियों को नहीं हटाया। जो नए जोड़े उनमें पिछड़ा और दलित का ध्यान रखा। देखते-देखते बाह्मण-बनिया पार्टी सबकी हो गई। उसमें हर रंग के चेहरे नजर आने लगे।

संतोष कुमार ने लिखा है कि पार्टी और संघ इस बात को समझ चुका था कि विचाराधारा की घुट्टी पिलाने से काम ज्यादा दिन नहीं चलेगा। पिछड़े और दलित को सत्ता में भागेदारी देनी होगी। उसी रणनीति के तहत केशव प्रसाद मौर्य और नित्यानंद राय जैसे लोगों को सूबे की कमान सौंपी गई थी। यह स्वभाविक तौर से सोशल इंजीनियरिंग का मसला है। शायद इसे भाजपा केएन.गोविंदाचार्य के बाद भूल चुकी थी। अगर उसे याद होता तो उसका जनाधार रसातल में न चला गया होता। खैर उस परिपाटी को अमित शाह ने दोबारा शुरू किया। उसका अपना तेवर है। वे इसमें कितने सफल रहे, यह सभी जानते हैं। किसी से कुछ छुपा नहीं है। किताब में उसे विस्तार से बताया गया है। एक और बात जो खासा मायने रखती है, वह संगठन की सक्रियता है। सामान्य तौर पर जब कोई दल सरकार बना लेता है तो वह शिथिल पड़ जाता है। वाजपेयी सरकार के दौर में यही हुआ था। कार्यकर्ता काम लेकर दिल्ली आते थे। उसे सरकार से कराने के लिए मंत्रालयों का चक्कर काटते थे। काम न होने पर घर होकर लौट जाते थे और निराश होकर बैठ जाते थे। इससे पार्टी का काम प्रभावित होता था। अमित शाह ने उस परंपरा को खत्म करने का नायाब नुक्सा निकाला। उन्होंने तरह-तरह के कार्यक्रमों की झड़ी लगा दी। इसका दो फायदा हुआ।

यह स्वभाविक तौर से सोशल इंजीनियरिंग का मसला है। शायद इसे भाजपा केएन.गोविंदाचार्य के बाद भूल चुकी थी। अगर उसे याद होता तो उसका जनाधार रसातल में न चला गया होता। खैर उस परिपाठी को अमित शाह ने दोबारा शुरू किया। उसका अपना तेवर है। वे इसमें कितने सफल रहे, यह सभी जानते हैं। किसी से कुछ छुपा नहीं है।

पहला तो यह कि कार्यकर्ता व्यस्त हो गए। उनकी सक्रियता भी बढ़ गई। दूसरा दिल्ली का चक्कर लगना बंद हो गया। दूसरे शब्दों में कहा जाए तो आमित शाह ने ऐसी व्यवस्था बनाई जिससे कार्यकर्ता सालों भर रचनात्मक काम में लगे रहे। वे खुद भी एक कार्यकर्ता की तरह सक्रिय रहे। यही वजह रही कि सरकार के काम को पार्टी जनता तक पहुंचा पाई। उन्हें बता पाई कि जो फायदा मिल रहा है, उसकी वजह बस मोदी सरकार है। इसे संतोष कुमार ने बखूबी उभारा है। किताब के मुताबिक अमित शाह का सदस्यता अभियान सोचस मझी रणनीति का हिस्सा था। उन्होंने आकलन किया कि 2009 में भाजपा को 7.84 करोड़ मत मिले थे जो 2014 में बढ़कर 18 करोड़ के आसपास हो गए। इस हिसाब से भाजपा के मत में तकरीबन 10 करोड़ बढ़ोत्तरी हुई। इस दरमियान अगर पार्टी की सदस्य संख्या पर गौर किया जाए तो ढाई करोड़ के आसपास थी। इतनी सदस्य संख्या पर भाजपा को लगभग 18 करोड़ मत मिले। इसी तरह अगर राज्यवार देखे तो तस्वीर और स्पष्ट होती है। प. बंगाल को मिसाल के तौर पर लेते हैं। 2014 में वहां भाजपा को 87 लाख वोट मिले। लेकिन यहां भाजपा की सदस्य संख्या बस 6.25 लाख थी। इसी तरह असम में 55 लाख से ज्यादा वोट मिले जबकि सदस्य संख्या महज ढाई लाख थी। यही हाल भाजपा का हर उन राज्यों में रहा, जहां वह कमजोर थी या है। इन आंकड़ो से अमित शाह को एक पैटर्न मिला।

वे यह आकलन लगा पाए कि लोकसभा में बहुत लाने के लिए कितने वोट की जरूरत है। उसके लिए पार्टी की सदस्य संख्या कितनी होनी चाहिए। उसी हिसाब से अमित शाह ने लक्ष्य तय किया। सदस्यता अभियान चलाया। इसी तरह बूथ प्रबंधन का भी अभियान चला। माइक्रो से आगे बढ़कर नैनो की रणनीति बनी। पार्टी को हर स्तर पर प्रभावी बनाने के लिए बैठकों एवं प्रवास के लिए निरंतर समीक्षा का अद्भुत ढांचा बनाया गया। मौजूदा चुनाव परिणाम उसी नीति और रणनीति का हिस्सा है। लेकिन दिलचस्प बात यह कि अमित शाह अभी रूके नहीं। किताब के मुताबिक वे 2024 के आम चुनाव की तैयार में लग गए हैं। पार्टी को उसी हिसाब से तैयार कर रहे हैं।


 
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