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चंद्रयान-2 के महानायक

19/09/2019

चंद्रयान-2 के महानायक


ब भी देश कोई नई खोज होती है या कुछ नए परिणाम आते हैं तो उसके पीछे कई हांथ लगे होते हैं। कईयों की मेहनत का परिणाम होता है। कुछ ऐसा ही है मिशन चंद्रयान -2 पूरा घटाक्रम। जिसमें इसरो प्रमुख के सिवन की प्रमुख भूमिका रही। वह इस मिशन के प्रमुख व्यक्तियों में से एक हैं। आज उनके उनके चेहरे से तो देश का बच्चा- बच्चा परिचित हो चुका है। लेकिन कम ही लोगों को मालूम है कि के सिवन के जीवन का सफर इतना आसान नहीं रहा । शायद चंद्रयान-2 के चंद्रमा की सतह पर पहुंचने जैसा मुश्किल। उनके जीवन के संघर्षो की कहानी बेहद मुश्किल रही। उनके साथ इस मिशन में जुड़ी दो महिलाएं भी प्रमुख हैं जिनके विषय में जानने की हम सभी को जरूरत है। इनमें से पहला नाम है मुथय्या वनीथा का, जो कि मिशन की प्रोजेक्ट निदेशक हैं।

वहीं दूसरी रितु करिधल हैं जो चंद्रयान-2 की मिशन निदेशक हैं। रितू करिधल को चंद्रयान-2 मिशन का निदेशक बनाया गया । उनके साथ एम वनीता को प्रोजेक्टर डायरेक्टर की भूमिका सौंपी गई। ये कोई पहला मौका नहीं है, जब इसरो में महिला वैज्ञानिकों को इतनी बड़ी जिम्मेदारी सौंपी गई। इससे पहले मंगल मिशन में भी आठ महिला वैज्ञानिकों को प्रमुख भूमिका में रखा गया था। जानते हैं चंद्रयान 2 में प्रमुख भूमिका निभाने वाली महिला वैज्ञानिकों के बारे में। इस पूरे अभियान में 30 फीसद महिला वैज्ञानिक शामिल रहीं।

के सिवन

के सिवन का पूरा नाम है कैलाशावादिवो सिवन है। उनका जन्म कन्याकुमारी के सरक्कालविलाई गांव में हुआ था। परिवारिक हालत ठीक नहीं थे। स्खिति ऐसी थी की पढ़ाई के लिए भी पैसे नहीं थे। इसी वजह से उन्होने शुरूआती पढ़ाई गांव के ही सरकारी स्कूल में की। आगे की पढ़ाई के लिए गांव से बाहर निकलना था। लेकिन घर में पैसे नहीं थे। सिवन को पढ़ने के लिए फीस जुटानी थी। इसके लिए उन्होंने पास के बाजार में आम बेचना शुरू किया। जो पैसे मिलते, उससे अपनी फीस चुकाई। आम बेचकर पढ़ाई करते-करते के सिवन ने इंटरमीडिएट तो कर लिया, लेकिन स्नातक के लिए और पैसे चाहिए थे। पैसे न होने की वजह से उनके पिता ने कन्याकुमारी के नागरकोइल के हिंदू कॉलेज में उनका दाखिला करवा दिया।

जब वो हिंदू कॉलेज में गणित में बीएससी करने पहुंचे, तो उनके पैरों में चप्पलें आईं। धोती-कुर्ता और चप्पल। इससे पहले के सिवन के पास कभी इतने पैसे नहीं हुए थे कि वो अपने लिए चप्पल तक खरीद सकें। वह अपने परिवार के पहले स्नातक करने वाले व्यक्ति बने। हांलाकि बावजूद इसके उन्हेंने आगे की पढ़ाई के लिए गणित नहीं बल्कि विज्ञान विषय को चुना। इसके लिए उन्होंने मद्रास इंस्टीट्यूट आॅफ टेक्नॉलजी (एमआईटी) में दाखिला लिया। यहां से उन्हें छात्रवृत्ती मिलने लगी। जिससे उन्होंने एरोऩॉटिकल इंजीनियरिंग में बीटेक किया। बीटेक करने के बाद सिवन ने बैंगलोर के इंडियन इंस्टीट्यूट आॅफ साइंस(आईआईएस) से एयरोस्पेस इंजीनियरिंग में परास्नातक किया । जब सिवन आईआईएस बैंगलोर से बाहर निकले तो वो वो एयरोनॉटिक्स के बड़े साइंटिस्ट बन चुके थे।

धोती-कुर्ता छूट गया था और वो अब पैंट-शर्ट पहनने लगे थे। इसरो यानी इंडियन स्पेस रिसर्च आॅर्गनाइजेश के साथ उन्होंने अपनी नौकरी शुरू की। पहला काम मिला पीएसएलवी बनाने की टीम में। पीएसएलवी यानी कि पोलर सेटेलाइट लॉन्च वीकल। ऐसा रॉकेट जो भारत के सेटेलाइट्स को अंतरिक्ष में भेज सके। सिवन और उनकी टीम इस काम में कामयाब रही। के सिवन ने रॉकेट को कक्षा में स्थापित करने के लिए एक सॉμटवेयर बनाया, जिसे नाम दिया गया सितारा। उनका बनाया सॉμटवेयर बेहद कामयाब रहा और भारत के वैज्ञानिक जगत में इसकी चर्चा होने लगी। इस दौरान भारत के वैज्ञानिक पीएसएलवी से एक कदम आगे बढ़कर जीएसएलवी की तैयारी कर रहे थे। जीएसएलवी यानी कि जियोसेटेलाइट लॉन्च वीकल।

18 अप्रैल, 2001 को जीएसएलवी की टेस्टिंग की गई। लेकिन टेस्टिंग फेल हो गई, क्योंकि जिस जगह पर वैज्ञानिक इसे पहुंचाना चाहते थे, नहीं पहुंचा पाए। के सिवन को इसी काम में महारत हासिल थी। जीएसएलवी को लॉन्च करने का जिम्मा दिया गया के सिवन को और उन्होंने कर दिखाया। इसके बाद से ही के सिवन को इसरो का रॉकेट मैन कहा जाने लगा।

रितू करिधल

इसरो की महिला वैज्ञानिक रितू करिधल को रॉकेट वुमन आॅफ इंडिया भी कहा जाता है। इससे पहले वह मार्स आॅर्बिटर मिशन में डिप्टी आॅपरेशंस डायरेक्टर रह चुकी हैं। रितू करिधल ने एरोस्पेस में इंजीनियरिंग की पढाई की है। साथ ही वह लखनऊ विश्वविद्यालय से स्नातक हैं। पूर्व राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम ने वर्ष 2007 में उन्हें इसरो युवा वैज्ञानित सम्मान से सम्मानित किया था। पूर्व में दिए अपने साक्षात्कारों में रितू करिधल ने बताया था कि भौतिक विज्ञान और गणित में उनकी खास रुचि रही है। वो बचपन में नासा और इसरो के बारे में अखबार में छपी खबरों या अन्य जानकारियों की कटिंग काटकर अपने पास रखती थीं। पोस्ट ग्रेजुएशन के बाद उन्होंने इसरो में नौकरी के लिए आवेदन किया और स्पेस साइटिस्ट बन गईं। करीब 21 वर्ष से इसरो में बतौर वैज्ञानिक काम कर रहीं रितू करिधल पहले भी मार्स आॅर्बिटर मिशन समेत कई महत्वपूर्ण प्रोजेक्ट पर काम कर चुकी हैं।

मुथय्या वनीथा

चंद्रयान-2 की प्रोजेक्ट डायरेक्टर की जिम्मेदारी इसरो की दूसरी महिला वैज्ञानिक मुथय्या वनीथा को सौंपी गई थी । एम वनीथा के पास डिजाइन इंजीनियरिंग का लंबा अनुभव है। वह काफी समय से सेटेलाइट्स पर काम कर रही हैं। वर्ष 2006 में एस्ट्रोनॉमिकल सोसायटी आॅफ इंडिया ने उन्हें बेस्ट वुमन साइंटिस्ट के पुरस्कार से सम्मानित किया था। जानकारों के अनुसार किसी भी मिशन में प्रोजेक्ट डायरेक्टर की भूमिका काफी अहम होती है। अभियान की सफलता की पूरी जिम्मेदारी प्रोजेक्ट डायरेक्टर पर ही होती है। वह पूरे अभियान का मुखिया होता है। किसी भी अंतरिक्ष अभियान में एक से ज्यादा मिशन डायरेक्टर हो सकते हैं, लेकिन प्रोजेक्ट डायरेक्टर केवल एक ही होता है। प्रोजेक्ट डायरेक्टर के ऊपर एक प्रोग्राम डायरेक्टर भी होता है।


 
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