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राजनीति की बदलती रवायत

04/03/2020

राजनीति की बदलती रवायत

बद्रीनाथ वर्मा


टोपी की जगह ललाट पर कुंकुम का तिलक और कलाई पर कलावा राजनीति की बदलती रवायत की दस्तक है। कल तक तिलक व कलावा जैसे हिंदू धार्मिक प्रतीकों से लगभग परहेज करने वाले सियासतदानों ने अपनी चाल ढाल में गजब का बदलाव कर लिया है। यकीन नहीं होता तो गुजरात चुनाव से शुरू कर राजस्थान चुनाव और लोकसभा चुनाव के बाद अब हालिया संपन्न दिल्ली चुनाव पर एक नजर दौड़ा लें आपके सारे सवालों के जवाब खुद ब खुद मिल जायेंगे। तत्कालीन कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी का मंदिर-मंदिर जाना और यज्ञोपवीत दिखाने से लेकर गोत्र बताने तक की कवायद उसी बदलती राजनीति की रवायत का नमूना थी। दरअसल, मुस्लिम तुष्टीकरण के आरोपों से घिरी पार्टियां अब खुद को हिंदूवादी दिखाने की कसरत कर रही हैं। हालिया संपन्न दिल्ली विधानसभा चुनाव में इस कसरत को अरविंद केजरीवाल की आम आदमी पार्टी ने बखूबी अंजाम दिया है। हनुमान चालीसा पढ़कर केजरीवाल ने न केवल हिंदू मतदाताओं को अपने पाले में बनाये रखने में कामयाबी हासिल की बल्कि दक्षिणपंथ पर भाजपा की दावेदारी का तोड़ भी निकाल लिया। कह सकते हैं कि दक्षिणपंथ का उत्तर दक्षिणपंथ ही है।

 इसका संकेत रामलीला मैदान में शपथ समारोह में भी दिखा जब 2015 में आम आदमी की टोपी पहन कर शपथ लेने वाले केजरीवाल इस बार तिलक लगाकर सामने आए। दिल्ली चुनाव में हिंदू समुदाय के वोट शेयर पर नजर दौड़ाएं तो केजरीवाल को भाजपा से अधिक वोट मिले। बहरहाल, मुस्लिमों के तुष्टीकरण के नाम पर मुस्लिम वोटबैंक बनाने वाली पार्टियों को जब लगा कि अब हिंदू वोटबैंक ज्यादा प्रभावी है तो उन्होंने अपना रंग बदलना शुरू कर दिया। इसी का नतीजा है हनुमान चालीसा-सुंदरकांड का पाठ, तिलक, कलावा, यज्ञोपवीत व गोत्र आदि का प्रदर्शन। हालांकि मुस्लिमों की खैरख्वाह बने दलों से तुष्टीकरण के नाम पर इस समुदाय को क्या हासिल हुआ इस पर एक बड़ा प्रश्नचिन्ह है।

आम आदमी पार्टी हर महीने के पहले मंगलवार को सुंदर कांड का पाठ अलग-अलग इलाकों में करायेगी। इसकी शुरुआत 18 फरवरी से हो भी चुकी है।

इससे हो सकता है कि दस-बीस या सौ दो सौ मौलानाओं की दुकान भले ही चल निकली हो लेकिन आम मुसलमान के हिस्से में जहालत व जलालत ही आई है। न उनके शैक्षिक स्तर में सुधार हुआ और न ही आर्थिक बदहाली दूर हुई। बहरहाल, भाजपा को घेरने के क्रम में जब शाहीन बाग का प्रयोग खुद के गले की आफत साबित होने लगी तो राजनीति के शातिर खिलाड़ी बन चुके आप संयोजक व दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने चुनावी रणनीतिकार प्रशांत किशोर की सलाह पर तुरंत यू टर्न लेते हुए लोहे को लोहे से काटने की तरकीब खोज निकाली। यह तरकीब थी हनुमानजी के कंधे की सवारी। चुनाव के बीच हनुमान चालीसा का पाठ और हनुमान मंदिर की दौड़ ने हिंदुओं को आम आदमी पार्टी से विमुख होने से रोक लिया। राम जन्मभूमि आंदोलन के जरिए 2 से बढ़कर 303 सीटों तक पहुंचकर अकेले अपने दम पर दूसरी बार केंद्र की सत्ता संभाल रही भाजपा को उसी के हथियार से शिकस्त देने के लिए आप की ओर से रामभक्त हनुमान चुनाव के केंद्र मे लाये गये। उल्लेखनीय है कि जब हरेक दल मुस्लिम वोट बैंक को लक्षित कर अपना मेनिफेस्टो जारी करता था उस वक्त हिंदुओं के आराध्य भगवान राम की जन्मभूमि की मुक्ति के लिए चले आंदोलन में भाजपा ने खुलकर भाग लिया। इस वजह से भाजपा अधिसंख्य हिंदू मतदाताओं की पहली पसंद बनती गई।

जाहिर है राजनीति की बदलती इस रवायत का श्रेय भाजपा को ही जाता है कि अब हर कोई खुद को ज्यादा बड़ा हिंदू होने का दिखावा करने पर मजबूर है। दरअसल, शाहीन बाग की छींटे आम आदमी पार्टी को बदरंग करने लगी थी। इससे बचने के लिए पार्टी ने दोहरी रणनीति अपनाई। शाहीन बाग को अमानतुल्लाह खान को सौंपकर केजरीवाल खुद को भाजपाइयों से भी बड़ा हिंदू साबित करने में लग गये। उनकी इस हनुमान भक्ति को लेकर कतिपय भाजपा नेताओं की टीका टिप्पणी ने उनकी राह और आसान बना दी और देखते ही देखते बजरंग बली सियासत के नए प्रतीक बन गए। इस बीच एक दिलचस्प वाकया और घटित हुआ कि दिल्ली चुनाव के बीच केंद्र सरकार की ओर से राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र की घोषणा करने की जहां अन्य विपक्षी दलों ने आलोचना की वहीं पीएम मोदी को हर बात पर पानी पी- पीकर कोसने वाले केजरीवाल ने अपनी आदत के विपरीत आश्चर्यजनक रूप से मोदी सरकार की इस घोषणा का यह कहते हुए स्वागत किया कि अच्छे फैसलों के लिए कोई नियत समय नहीं होता। अच्छे फैसले कभी भी लिये जा सकते हैं।

जाहिर है बजरंग बली के प्रतीक की जरूरत क्यों पड़ी का बड़ा ही सीधा और सरल जवाब है कि इसके पीछे तीन दशक की राजनीतिक धारा को देखना होगा। इन दशकों में भाजपा ने भगवान राम के प्रतीक के साथ खुद को हिंदू हितैषी पार्टी के रूप में स्थापित करने के साथ ही लगातार सियासत में दबदबा बनाने में भी सफलता हासिल की। पार्टी ने पहले खुद को हिंदुत्व की हिमायती के रूप में स्थापित किया और बाद में अपने राजनीतिक प्रतिद्वंद्वियों को हिंदुओं की उपेक्षा करने वाली पार्टी बताकर लीड ले ली। दूसरे दलों को ये समझने में देर लगी और डैमेज कंट्रोल के लिए उन्हें सॉट हिंदुत्व की ओर जाना पड़ा है। ऐसे में एक बड़ा सवाल यह भी है कि क्या जिस तरह भगवान राम के इर्द-गिर्द राजनीतिक ताना-बाना बुना गया उसी तरह अब बजरंग बली भी मुख्यधारा की राजनीति में बने रहेंगे? लगता तो ऐसा ही है, क्योंकि दिल्ली विधानसभा चुनाव में तमाम आशंकाओं को दरकिनार कर जबरदस्त जीत हासिल करने के बाद भी आम आदमी पार्टी ने इस प्रतीक को आगे ले जाने की कोशिश की है।

जीत के बाद केजरीवाल का हनुमान मंदिर जाकर दर्शन पूजन करना और उसके बाद दिल्ली के पॉश इलाके ग्रेटर कैलाश से आप विधायक सौरभ भारद्वाज की यह घोषणा कि हर महीने के पहले मंगलवार को सुंदर कांड का पाठ अलग-अलग इलाकों में किया जाएगा। इसकी शुरुआत 18 फरवरी से हो भी गई। इसके पीछे आप नेता तर्क दे रहे हैं कि बजरंग बली दिल्लीवासियों का संकट दूर करेंगे। आम आदमी पार्टी में आये इस बदलाव को उत्सुकता के साथ देखा जा रहा है। बजरंग बली की राजनीति में एंट्री को विश्लेषक संयोग नहीं मानते। उनका कहना है कि देश की राजनीति जिस दिशा में चल रही है उसमें दक्षिणपंथ के प्रतीकों का खासा महत्व है। बावजूद इसके एक सवाल तो बनता ही है कि काम की राजनीति करने का ढिंढोरा पीटने वाले केजरीवाल की इस हनुमान भक्ति के पीछे कहीं उनकी अपनी राष्ट्रीय हसरत पूरी करने की कोई नई तरकीब तो नहीं?


 
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