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एक मदरसा ऐसा भी!

18/08/2019

एक मदरसा ऐसा भी!


मंदिर और मस्जिद एक साथ! वह भी एक ही छत के नीचे! क्या यह संभव है? शायद नहीं! कम से कम धार्मिक उन्माद भरे इस दौर में तो इसकी कल्पना नहीं की जा सकती है। लेकिन तालानगरी अलीगढ़ में इसे आपसी भाईचारा की कुंजी मानकर ऐसा करने की कोशिश की गई है। फिलहाल यह मंदिर-मस्जिद अस्थाई जरूर है लेकिन सब कुछ ठीक रहा तो यह सपना मूर्त रूप भी ले सकता है। एक साथ यह मंदिर-मस्जिद मदरसे में हो तो और अचरज होता है। इस तरह देखा जाए तो यह मदरसा अपने आप में अनूठा है। वैसे यह मदरसा दीगर कई मायनों में भी अनोखा है। मसलन इसके नाम पर लोगों को हैरानी होती है। अमूमन मदरसों के नाम अरबी में होते हैं। उनके साथ कोई न कोई इस्लामी शब्द भी जुड़ा होता है। लेकिन इस मदरसे का नाम ‘मदरसा चाचा नेहरू’ है। इसे अल-नूर चैरिटेबल ट्रस्ट अलीगढ़ द्वारा संचालित किया जा रहा है। इसकी स्थापना 19 वर्ष पूर्व सलमा अंसारी के जरिए की गई थी। तब उनके पति और पूर्व उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी के वाइस चांसलर थे।

एक साथ मंदिर-मस्जिद एक ही मदरसे में हो तो और अचरज होता है। इस तरह देखा जाए तो यह मदरसा अपने आप में अनूठा है। वैसे यह मदरसा दीगर कई मायनों में भी अनोखा है। मसलन इसके नाम पर लोगों को हैरानी होती है। अमूमन मदरसों के नाम अरबी में होते हैं। उनके साथ कोई न कोई इस्लामी शब्द भी जुड़ा होता है। लेकिन इस मदरसे का नाम ‘मदरसा चाचा नेहरू’ है।एक मदरसा ऐसा भी!

अलीगढ़ व आसपास के गरीब बच्चों को शिक्षा के आभूषण से मालामाल करने के नेक मकसद को हासिल करने में यह मदरसा काफी कामयाब भी रहा। दिनोंदिन छात्रों की संख्या बढ़ती गई और फिलहाल इसमें लगभग चार हजार छात्र शिक्षारत हैं। यही वजह है कि एएमयू अलीगढ़ की जमीन पर स्थित किले में आरंभ हुए इस मदरसे को जल्द ही शमशाद मार्केट की बड़ी जगह पर स्थानांतरित करना पड़ा। शमशाद मार्केट के अलावा एएमयू के राइडिंग क्लब और यूनिवर्सिटी कैम्पस से बाहर पान वाली कोठी में भी इसकी शाखाएं चल रही हैं। इस तरह शहर में अलनूर सोसायटी के अंतर्गत मदरसा चाचा नेहरू के नाम से तीन मदरसे चल रहे हैं। दरअसल यह मदरसा केवल नाम का है। इसमें धार्मिक शिक्षा से ज्यादा आधुनिक शिक्षा पर जोर दिया गया है। लोगों का तो यहां तक कहना है कि स्कूल के तौर पर मान्यता लेने में आड़े आ रही आर्थिक तंगी की वजह से इसे मदरसे के तौर पर रजिस्टर्ड कराया गया।

मदरसे में कक्षा आठ तक दी जा रही आधुनिक शिक्षा के नाते आर्थिक तौर पर कमजोर अभिभावक अपने बच्चों को यहां दाखिला दिला रहे हैं। आश्चर्यजनक बात यह है कि मदरसे में शिक्षारत चार हजार बच्चों में लगभग एक हजार हिंदू छात्र हैं। इनमें से कुछ छात्र अपने मुस्लिम साथियों के साथ मदरसा छात्रावास में भी रहते हैं। इन्हीं छात्रों के लिए मदरसा की संस्थापक सलमा अंसारी ने मंदिर बनवाने की घोषणा की है। उनका कहना है कि बच्चों को मदरसे से बाहर निकल कर मंदिर जाना पड़ता है। इससे उन्हें परेशानी होती है। उनकी सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए मदरसा कैम्पस में ही मंदिर का निर्माण करवाया जाएगा। उन्होंने कहा कि इसके पूर्व हमारे दुश्मन मदरसे के पानी में जहर मिलाने और परिसर में बम रखने का षडयंत्र कर चुके हैं।

जब एक छत के नीचे मंदिर-मस्जिद का निर्माण होगा तो उसमें ऐसा भाईचारा स्थापित होगा जो पूरे देश के लिए एक मिसाल कायम करेगा।

                                                                           सलमा अंसारी, संस्थापक, मदरसा चाचा नेहरू

ऐसे में पूजा-पाठ के लिए मंदिर जैसी भीड़भाड़ वाली जगह पर अगर बच्चों के साथ कुछ गलत होता है तो इसकी जिम्मेदारी हम पर आएगी। इसीलिए उन्हें मदरसा परिसर में ही मंदिर की सुविधा दी जाएगी। गौरतलब है कि शमशाद मार्केट स्थित मदरसे की मुख्य शाखा के एक कक्ष में छात्रों के नमाज अदा करने और पूजा-पाठ करने का अगल-बगल प्रबंध किया गया है। यहीं उन्होंने मंदिर का निर्माण कराने की बात कही है। इसमें कोई शक नहीं कि दुनिया का हर धर्म मानवता और भाईचारे की सीख देता है। एक दूसरे के मजहब से अनजान होना ही आपसी गलतफहमियों की असल वजह है। जब लोग एक दूसरे के साथ मिलकर इबादत करेंगे और एक दूसरे के धर्म को जानेंगे तो उनके बीच व्याप्त दूरियां मिटेंगी। ऊपर वाले के सामने एक साथ सिर झुकाएंगे तो आपसी हमदर्दी, मोहब्बत और इंसानियत का रिश्ता कायम होगा। इसीलिए अल्लामा इकबाल ने कहा था।

शक्ति भी शांति भी भक्तों के गीत में है धरती के बासियों की मुक्ति प्रीत में है। अलबत्ता इन बातों को चरितार्थ करना कठिन काम है। शायद तभी हरिवंश राय बच्चन को ‘‘बैर बढ़ाते मस्जिद-मंदिर’’ की पंक्तियां लिखने को मजबूर होना पड़ा। मदरसा चाचा नेहरू में मंदिर निर्माण की घोषणा के साथ ही विवाद शुरू हो गया है। सलमा अंसारी की इस घोषणा पर एएमयू प्रशासन ने मदरसा चाचा नेहरू के जिम्मेदारों को नोटिस थमा दिया है। इसमें कहा गया है कि मदरसा यूनिवर्सिटी की जमीन पर स्थापित है जो उन्हें 10 साल की लीज पर दी गई है। एएमयू के जनसंपर्क अधिकारी उमर पीरजादा सलीम का कहना है कि भारत सरकार की गाइडलान के अनुसार शैक्षिक संस्थानों में अब कोई धार्मिक पूजा स्थल या इबादतगाह स्थापित नहीं किए जा सकते हैं। फिर सलमा अंसारी ने यह घोषणा ऐसे समय में की है जब उनके शौहर हामिद अंसारी पर रिसर्च एण्ड एनालिसिस विंग (रॉ) के पूर्व अधिकारी एनके सूद ने गंभीर आरोप लगाए हैं। उनपर ईरान समेत कई मुस्लिम देशों के राजदूत रहते हुए भारतीय खुफिया एजेंसी रॉ को नुकसान पहुंचाने के आरोप लगे हैं।

उन्होंने प्रधानमंत्री मोदी को चिट्ठी लिखकर हामिद अंसारी की भूमिका की जांच करवाने की मांग की है। रॉ के एक और पूर्व अफसर आरके यादव ने भी अपनी पुस्तक ‘मिशन रॉ’ में भी उनपर इसी तरह के आरोप लगाए थे। हामिद अंसारी अपनी विशेष विचारधारा के लिए पहले भी काफी चर्चा में रहे हैं। उपराष्ट्रपति के गरिमामयी पद पर रहते हुए उन्होंने देश में असहिष्णुता बढ़ने जैसे विवादास्पद बयान दिए। लगातार दो बार उपराष्ट्रपति रहने के बाद कार्यकाल समाप्ति पर मुसलमानों में असुरक्षा की भावना बढ़ने वाला बयान देने की वजह से भी वह सुर्खियों में रहे। प्रतिक्रयावश प्रधानमंत्री मोदी को कहना पड़ा कि अब आप अपनी ‘कोर आइडियालोजी’ को मानने के लिए स्वतंत्र हैं। ऐसे में हामिद अंसारी पर लग रहे आरोपों और उनकी बेगम सलमा अंसारी द्वारा मदरसे में मंदिर बनवाने की घोषणा में संयोग तलाश करना बेवजह नहीं होगा। खुदा करे कि सलमा अंसारी की ताजा पहल उनके पति के विवादस्पद बयानों से इतर आपसी मेलजोल बढ़ाने की नीयत से ही की गई हो।


 
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