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चिकित्सा शिक्षा की चुनौतियां

07/09/2019

डॉ. अजय खेमरिया
यह सही है मोदी सरकार ने पिछले पांच वर्षो में चिकित्सा शिक्षा के विस्तार को नई दिशा और नया आयाम दिया है। हाल ही में अगले दो वर्षों में 75 नए मेडिकल कॉलेज खोलने का निर्णय भी लिया गया है। इसका स्वागत होना चाहिये लेकिन इससे पहले कुछ तथ्यों और उन पहलुओं पर भी ईमानदारी से विचार किये जाने की आवश्यकता है जो इस क्षेत्र के साथ व्यावहारिक धरातल पर जुड़े हैं। मसलन, एक नया मेडिकल कॉलेज जब खोला जाता है तब उसकी जमीनी कठिनाइयों की ओर सरकार के स्तर पर भूमिका क्या वैसी ही मजबूत है, जैसी इन्हें खोलने के निर्णय लेते समय होती है। पिछले दो वर्षो में मप्र में सात नए मेडिकल कॉलेज मप्र सरकार द्वारा खोले गए हैं, इनमे से कुछ कॉलेजों को कक्षाओं के संचालन की अनुमति एमसीआई द्वारा जारी कर दी गई है। मप्र में खोले गए सभी नए मेडिकल कॉलेज इस समय विवादों में हैं। इससे पहले खोले गए कॉलेजों की मान्यता और आधारभूत शैक्षणिक एवं आधारिक सरंचनाओं की उपलब्धता को लेकर विवाद होते रहे हैं। कमोबेश नए मेडिकल कॉलेजों में भी कक्षाओं को आरम्भ करने की जल्दबाजी में बड़े पैमाने पर अनियमितताओं और फर्जीवाड़े को आधार बनाया जा रहा है।
राज्यों में चिकित्सा शिक्षा का पूरा तंत्र अफसरशाही के हवाले है, जो चिकित्सा शिक्षा को वैसे ही चलाना चाहते हैं जैसे अन्य सरकारी योजनाएं। जबकि यह क्षेत्र बहुत ही संवेदनशील और समाज के भविष्य के साथ जुड़ा है। समाज में अयोग्य और अक्षम चिकित्सक का पैदा होना बहुत ही खतरनाक पक्ष है क्योंकि भारत जैसे देश में चिकित्सा सुविधाओं की पहुंच आज भी 50 फीसदी तबके तक है ही नहीं। यह सभी राज्य सरकारों का नैतिक दायित्व भी है कि मेडिकल कॉलेजों को परम्परागत सरकारी तौर तरीकों से परिचालित न किया जाए। मसलन देशभर में आज जब डॉक्टरों की बेहद कमी है तब हमें यह समझना होगा कि नए खुल रहे कॉलेजों के लिये फैकल्टी आएगी कहां से? मेडिकल एजुकेशन के लिये जो पैरामीटर एमसीआई द्वारा निर्धारित है उन्हें देश के 90 फीसदी नए कॉलेज पूरा नहीं कर रहे हैं। जब शिक्षक ही मानक योग्यताओं को पूरा नहीं करते तो काबिल डॉक्टर्स कहां से आएंगे?
वर्तमान में एमसीआई के पास लगभग 10 लाख 41 हजार डॉक्टरों का पंजीयन है, जिनमें से सिर्फ 1 लाख 2 हजार डॉक्टर ही विभिन्न सरकारी संस्थानों में कार्यरत हैं। जाहिर है कोई भी विशेषज्ञ चिकित्सक देश की सरकारी सेवाओं में नहीं आना चाहता। ऐसे में यह जरूरी हो गया है कि जो विशेषज्ञ पीजी डॉक्टर मेडिकल कॉलेजों से बाहर सरकारी सेवाओं में हैं, उन्हें फैकल्टी के रूप में भी जोड़ा जाए। सरकार के स्तर पर ऐसे अध्ययनशील विशेषज्ञ डॉक्टरों को चिन्हित किया जा सकता है जो ओपीडी, ओटी के अलावा थ्योरी को भी बता सकें। इसके लिये इन डॉक्टर्स को विशेष प्रोत्साहन भत्ते दिए जा सकते हैं। इस प्रयोग से देशभर में सरकारी फैकल्टी की कमी दूर की जा सकती है।
2014 के बाद करीब 80 नए मेडिकल कॉलेज मोदी सरकार खोल चुकी है और 75 अतिरिक्त खोलने की मंजूरी अभी पखवाड़े भर पहले दी गई है। सभी कॉलेजों में मानक फैकल्टीज का अभाव है। मप्र के सात नए कॉलेजों के अनुभव बता रहे हैं कि मेडिकल कॉलेज राज्यों में जबरदस्त अनियमितता और भ्रष्टाचार का केंद्र बन रहे हैं। सरकार में बैठे मंत्री, मुख्यमंत्री अफसरों के इस तर्क से खुश हैं कि उनके राज्य में नए मेडिकल कॉलेज खुल रहे हैं, जिन्हें वह अपनी उपलब्धियों के रूप में प्रचारित कर सकते हैं लेकिन इस प्रक्रिया में जो खतरनाक खेल अफसरशाही खेल रही है, उसकी तरफ न सरकार का ध्यान है न समाज का। इस खेल को आप मप्र के उदाहरण से समझिए। सात नए मेडिकल कॉलेजों के लिये सरकार ने प्रति कॉलेज 250 करोड़ बिल्डिंग के लिये फंड दिया, 300 करोड़ उस कॉलेज के चिकिसकीय उपकरण, 100 करोड़ अन्य परिचालन व्यय और करीब एक हजार विभिन्न नियमित सरकारी पदों की स्वीकृति आरंभिक चरण के लिये दी हैं। सभी कॉलेज जिला मुख्यालयों पर खोले गए हैं जहां पहले से ही परिवार कल्याण विभाग के 300 बिस्तर का अस्पताल मौजूद है। इसी अस्पताल को नए कॉलेजों से अटैच कर दिया गया है।एमसीआई के निरीक्षण के समय इन्हीं अस्पतालों के विशेषज्ञ औऱ अन्य डॉक्टरों को डिजिग्नेट करके नए कॉलेज स्टाफ में दिखाया गया है। दूसरी तरफ फैकल्टी से लेकर सभी छोटे पदों की भर्तियां मनमाने तरीके से हो रही है। मप्र के शिवपुरी, दतिया कॉलेजों की भर्तियों को लेकर तो सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों के विधायक विधानसभा में तीन सत्रों से हंगामा मचा रहे हैं क्योंकि इन भर्तियों में बड़े पैमाने पर भ्रष्टाचार हुए। अयोग्य और अपात्र लोगों को मोटी रकम लेकर भर्ती कर लिया गया है। भर्ती का यह खेल करोड़ों तक पहुँचा है क्योंकि सभी पद रेगुलर हैं।
मप्र में उपकरणों की खरीदी भी अफसरों के लिये कुबेर का खजाना साबित हुई है। खास बात यह है कि मप्र का चिकित्सा शिक्षा विभाग पूरी तरह से अफसरशाही के शिकंजे में है। मंत्री के नीचे प्रमुख सचिव, आयुक्त, उपसचिव, आईएएस संवर्ग के हैं। वहीं हर मेडिकल कॉलेज का स्थानीय सुपर बॉस उस संभाग का कमिश्नर है। यानी ऊपर से नीचे तक आईएएस अफसरों का शिकंजा है।यही अफसर सभी नीतिगत निर्णय लेते हैं। भर्ती से लेकर सभी खरीदी भी इन्हीं के हवाले है। मप्र में नए मेडिकल कॉलेजों का बजट प्रावधान हजारों करोड़ में पहुँच रहा है। 7 हजार से ज्यादा सरकारी भर्तियों का मौका यहां व्यापमं का पितामह साबित हो रहा है क्योंकि यहां बगैर किसी लिखित या मौखिक परीक्षाओं के सीधे स्वशासी कॉलेज व्यवस्था के नाम से नियुक्तियां की गयी हैं। अब सवाल यह उठता है कि जब नए मेडिकल कॉलेजों में इस स्तर पर भ्रष्टाचार हो रहा है तो इनसे निकलने वाले डॉक्टरों की चिकिसकीय गुणवत्ता कैसी होगी?
मप्र के अनुभवों के आधार पर सरकारों को चाहिये कि सबसे पहले नए मेडिकल कॉलेजों के लिये बजट प्रावधानों पर पुनर्विचार करे। सैंकड़ों करोड़ की बिल्डिंग के स्थान पर बेहतर होगा कि देश के सभी जिला अस्पतालों को मेडिकल कॉलेजों की अधिमान्यता प्रदान कर दी जाए क्योंकि जो काम मेडिकल कॉलेजों के अस्पतालों में हो रहा है, वही इन सरकारी जिला अस्पतालों में होता है। जो नए कॉलेज खोले गए हैं वे सभी इन्हीं अस्पतालों से अटैच किये गए हैं। चूंकि मान्यता के लिये इन्हीं अस्पतालों का निरीक्षण होता है, यहां कार्यरत चिकिसकीय एवं पैरा मेडिकल स्टाफ को ही आवश्यक मानव संसाधन के कोटे में गिना जाता है इसलिये अच्छा होगा कि देश के सभी 600 से ज्यादा जिला अस्पताल मेडिकल कॉलेजों में तब्दील कर दिए जाएं। यहाँ पूरक सुविधाएं उपलब्ध कराकर मेडिकल कॉलेजों के मानकों को पूरा किया जाए। सभी राज्य मेडिकल एजुकेशन और पब्लिक हेल्थ से जुड़े विभागों का आपस मे मर्जर कर दें ताकि लोक स्वास्थ्य में समरूपता दिखाई दे। सरकारी स्तर पर यह नीतिगत निर्णय भी होना चाहिये कि मेडिकल एजुकेशन में सिर्फ प्रमुख सचिव स्तर पर एक ही आईएएस अफसर का पद होगा जो सरकार और विभाग के बीच समन्वय का काम करेगा। इसमें भी मेडिकल एकेडमिक बैकग्राउंड वाले अफसर को तरजीह दी जाए। शेष सभी पदों पर डॉक्टरों की नियुक्ति प्रशासन के लिहाज से हो।
मोदी सरकार ने निःसंदेह चिकित्सा शिक्षा के लिये क्रांतिकारी कदम उठाए हैं लेकिन हमें पिछले दिनों लोकसभा में प्रस्तुत किये गए तथ्यों पर भी गौर करना होगा। भारत में फिलहाल 479 मेडिकल कॉलेज हैं जिनमें फिलहाल 85218 एमबीबीएस और 29870 पीजी की सीट्स है। वर्ष 2016 से 2018 के बीच मोदी सरकार ने करीब 80 नए मेडिकल कॉलेजों को मंजूरी दी। 2014 में मोदी सरकार के आने से पहले देश में एमबीबीएस की 52 हजार और पीजी की 13 हजार सीट्स थी। भारत में औसत 11082 व्यक्तियों पर एक डॉक्टर है जबकि वैश्विक मानक कहते हैं कि 1100 की आबादी पर एक डॉक्टर होना चाहिये। भारत में पिछले दो बर्षो में ब्लड प्रेशर और शुगर के मरीजों की संख्या दोगुनी हो चुकी है, वहीं कैंसर के 36 फीसदी मरीज बढ़े हैं। इन तथ्यों के बीच नए मेडिकल कॉलेजों की गुणवत्तापूर्ण बनाया जाना कितना अनिवार्य है, इसे आसानी से समझा जा सकता है।
(लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)


 
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