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सर्वोच्च अदालत पर निर्भर येदि का भविष्य

09/08/2019

सर्वोच्च अदालत पर निर्भर येदि का भविष्य

उमेश चतुर्वेदी

कांग्रेस और जनता दल सेक्युलर के जिन 17 विधायकों को पूर्व विधानसभा अध्यक्ष के आर रमेश कुमार ने अयोग्य घोषित कर दिया है, अब उनका भविष्य सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर टिका है।

कर्नाटक में सरकार भले ही बदल गई हो, लेकिन तकरीबन वही नाटक दोहराया जा रहा है, जो कुमार स्वामी सरकार के वक्त दोहराया जा रहा था। चौथी बार मुख्यमंत्री बने भारतीय जनता पार्टी के नेता येदियुरप्पा ने भले ही 29 जुलाई को अपनी सरकार का विश्वासमत साबित कर दिया हो, लेकिन एक बार फिर उनकी सरकार की किस्मत देश की सबसे बड़ी अदालत पर निर्भर होती दिख रही है। इसकी वजह यह है कि कांग्रेस और जेडीएस के जिन 17 विधायकों को पूर्व विधानसभा अध्यक्ष के आर रमेश कुमार ने अयोग्य घोषित कर दिया है, उन सभी ने सुप्रीम कोर्ट में विधानसभा अध्यक्ष के फैसले के खिलाफ याचिका दायर कर दी है। एक अगस्त को दायर अपनी याचिका में इन विधायकों ने कहा है कि विधानसभा अध्यक्ष ने मनमाने तरीके से उन्हें अयोग्य ठहराया है।


इसके पहले 26 जुलाई को तीन विधायकों रमेश जारकिहोली, महेश कुमातहल्ली और आर शंकर सर्वोच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटा चुके हैं। विधायकों के अपील करने के बाद बाद साफ है कि देश की सर्वोच्च अदालत के फैसले पर येदियुरप्पा सरकार का भविष्य निर्भर करेगा। अगर सबसे बड़ी अदालत यह मानती है कि विधायकों के साथ तत्कालीन विधानसभा अध्यक्ष के आर रमेशकुमार ने मनमाने तरीके से कार्रवाई की तो उन विधायकों की सदस्यता बहाल हो सकती है। इसके बाद जाहिर है कि इन विधायकों की मोलभाव करने की ताकत बढ़ जाएगी। बेशक ये विधायक फिलहाल भारतीय जनता पार्टी और उसके नेता येदियुरप्पा के साथ नजर आ रहे हों, लेकिन आज के दौर में जिस तरह की राजनीति हो रही है, उससे इस बात की गारंटी नहीं दी जा सकती कि वे आंख मूंदकर येदियुरप्पा सरकार का समर्थन करते रहेंगे।


अगर उनकी विधानसभा की सदस्यता बहाल होती है तो वे अपने समर्थन की कीमत मांगेंगे। जाहिर है कि वह कीमत मंत्री पद से लेकर बहुत कुछ हो सकती है। शायद यही वजह है कि 26 जुलाई को शपथ लेने के बाद काफी वक्त गुजर गया है, लेकिन येदियुरप्पा ने अभी तक अपनी कैबिनेट का विस्तार नहीं किया है। उन्हें लगता है कि अगर कांग्रेस और जनता दल सेक्युलर के बागी हो चुके विधायकों की विधान सभा की सदस्यता बहाल होती है तो उनके समर्थन की एवज में उन्हें मंत्री पद देना पड़ सकता है। नियमों के मुताबिक विधायकों को अपनी सदस्यता से इस्तीफा देते वक्त खुद विधानसभा अध्यक्ष के सामने मौजूद होना होता है। ताकि वे यह फैसला ले सकें कि विधायक खुद अपनी मर्जी से इस्तीफा दे रहे हैं या फिर किसी के दबाव में। हालांकि ज्यादातर बागी विधायकों ने जब इस्तीफा दिया, उस वक्त विधानसभा अध्यक्ष अपने कार्यालय में नहीं थे।


कर्नाटक के राजनीतिक हलके में माना जा रहा है कि तत्कालीन विधानसभा अध्यक्ष के आर रमेश कुमार ने जानबूझकर ऐसा किया, ताकि पार्टी ह्विप के उल्लंघन के आरोप में उनकी सदस्यता रद्द की जा सके। वैसे सुप्रीम कोर्ट पहले ही इन विधायकों को विधानसभा में मौजूद रहने के लिए बाध्य ठहराये जाने पर रोक लगा चुका था। चूंकि कांग्रेस और जनता दल सेक्युलर मानते हैं कि उनके विधायकों ने पार्टी ह्विप का उल्लंघन किया, लिहाजा दल-बदल कानून के तहत उनकी सदस्यता रद्द की जानी चाहिए। लेकिन विधायकों का तर्क है कि उन्होंने ह्विप जारी होने से पहले ही अपनी सदस्यता से इस्तीफा दे दिया था। लिहाजा उन पर दल-बदल विरोधी कानून लागू नहीं हो सकता। इस बीच 31 जुलाई को कांग्रेस ने अपने सभी चौदह विधायकों को पार्टी विरोधी गतिविधियों के आरोप में निष्काषित कर दिया है। पार्टी के संगठन महासचिव केसी वेणुगोपाल ने इसकी घोषणा खुद की।


केसी वेणुगोपाल की ओर से जारी बयान के मुताबिक कर्नाटक कांग्रेस की ओर से बागी विधायकों को पार्टी से निकाले जाने को लेकर दिए गए प्रस्ताव को अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी ने स्वीकृति प्रदान कर दी है। चूंकि ये विधायक अपनी पार्टी से निकाले जा चुके हैं, लिहाजा माना जा सकता है कि अगर उनकी विधानसभा की सदस्यता बहाल भी होती है तो वे कांग्रेस का साथ नहीं जाएंगे। वैसे उनका कांग्रेस की ओर लौटने की गुंजाइश ना के बराबर रहेगी। लेकिन राजनीति में हमेशा दो जमा दो चार नहीं होता, वह बाइस और शून्य भी हो जाता है। लिहाजा येदियुरप्पा अपनी कैबिनेट के विस्तार को लेकर सर्वोच्च अदालत के अगले आदेश की प्रतीक्षा करते नजर आ रहे हैं। बेशक येदियुरप्पा अकेले सरकार चला रहे हों, लेकिन उन्होंने अपने एजेंडे पर काम करना शुरू कर दिया है।


येदियुरप्पा सरकार ने 29 जुलाई को राज्य के कन्नड़ और संस्कृति विभाग को टीपू सुल्तान की जयंती न मनाने का आदेश दे दिया। इसे लेकर कर्नाटक में सियासी पारा तेज हो गया। कांग्रेस ने 31 जुलाई को इस फैसले के खिलाफ राज्यभर में प्रदर्शन किया। यहां यह बता देना जरूरी है कि राज्य में टीपू जयंती पहले से ही राजनीतिक मुद्दा रहा है। कांग्रेस और जनता दल सेक्युलर जहां इसे मनाने को लेकर उत्साहित रहती थीं, वहीं भारतीय जनता पार्टी इसका विरोध करती रही है। 18वीं सदी के मैसूर के शासक टीपू सुल्तान की जयंती राज्य में कांग्रेस सरकार के फैसले के बाद हर साल 10 नवंबर को मनाई जाती रही। लेकिन अब ऐसा नहीं हो पाएगा।

मुख्यमंत्री येदियुरप्पा ने अपने पहले ही फैसले में 29 जुलाई को राज्य के कन्नड़ और संस्कृति विभाग को टीपू सुल्तान की जयंती न मनाने का आदेश दे दिया। इसे लेकर कर्नाटक में सियासी पारा तेज हो गया है।

येदियुरप्पा सरकार ने अपने विधायक के बोपैया की चिट्ठी पर संज्ञान लेते हुए इस जयंती को मनाए जाने पर रोक लगा दी। इसके साथ ही राज्य सरकार ने निगमों और दूसरी संस्थाओं में हुई राजनीतिक नियुक्तियों को तत्काल प्रभाव से खारिज कर दिया है। इस बीच भारतीय जनता पार्टी के केंद्रीय नेतृत्व ने उम्मीद जताई है कि कर्नाटक की उसकी मौजूदा सरकार अपना कार्यकाल पूरा करेगी। भारतीय जनता पार्टी को ऐसी उम्मीद रखना भी चाहिए, लेकिन यह भी सच है कि उसकी सरकार का कार्यकाल सर्वोच्च न्यायालय के फैसले के बाद उभरे राजनीतिक हालात पर कहीं ज्यादा निर्भर करेगा।


 
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