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बदलाव का वाहक बने निर्भया के दोषियों की फांसी

20/03/2020

डाॅ. रमेश ठाकुर
जिस फांसी का देशवासियों को बेसब्री से इंतजार था, वह फांसी मुकम्मल हुई। निर्भया को सात वर्ष बीत जाने के बाद आखिरकार इंसाफ मिल गया। निर्भया केस को उसके अंजाम तक पहुंचाने में किसी एक ने नहीं, बल्कि कई वर्गों ने अहम भूमिका निभाई। लेकिन, सबसे बड़ी भूमिका ‘मीडिया‘ ने निभाई, जिसने घटना की तारीख 16 दिसंबर 2012 से लेकर फांसी की मुकर्रर तारीख 20 मार्च 2020 को साढ़े पांच बजे तक केस को टाइम लाइन में रखा। केस को कभी फीका नहीं पड़ने दिया। घटना के एक-एक पहलुओं को हमेशा सुर्खियों में रखा। लोगों का गुस्सा कम नहीं होने दिया। वरना, निर्भयाकांड से लेकर अभीतक 17 हजार हजार से भी ज्यादा बलात्कार के केस रजिस्टर हुए। जो सभी अदालतों के बंद कमरों में न्यायतंत्र से न्याय की भीख मांग रहे हैं। सैकड़ों केस तो ऐसे भी हैं जिनकी पैरवी के लिए और साथ में खड़ा होने वाला भी कोई नहीं?
निर्भया को मिले इंसाफ के बाद एक सवाल सभी के जेहन में कौंधने लगा है। सवाल है कि इन फांसियों के बाद समाज में कुछ बदलाव आएगा या नहीं? बलात्कार जैसे जघन्य मामलों में कमी आएगी? बलात्कारी फांसी से डरेंगे? क्या अपराधी इस तरह के अपराध को अंजाम देने से पहले डरेगा? इस तरह के तमाम सवाल उठ खड़े हुए हैं। निर्भया के दरिंदों और न्यायतंत्र के मध्य लंबी कानूनी जोर आजमाइश हुई। तीन बार फांसी की मुकर्रर तारीख को भी बदलवाने में सफल हुए। पर, चौथे डेथ वारंट पर लिखी मौत से दरिंदे हार गए। सात साल पुराने केस का पटाक्षेप 20 तारीख को सूरज निकलने से पहले हो गया। दोषियों को उनके किए की सजा मिलने की खबर ने देशवासियों को सुखद एहसास कराया। देश ही नहीं, बल्कि दुनिया को झकझोर देने वाले जघन्य केस के चारों दोषियों को सूली पर लटकाया गया। सूली पर चढ़ाना जेल अधिकारियों के लिए तो आसान था, पर चढ़ना दोषियों के लिए बड़ा मुस्किल हुआ? फांसी के तख्त को देखकर ही चारों पछाड़ मारकर रोने-बिलखने लगे। अधिकारियों के पैरों में लिपट गए। दोषियों के मुंह से सिर्फ दो ही शब्द निकल रहे थे। ‘बचा लो-बचा लो, छोड़ दो-छोड़ दो‘! फांसी के तख्त पर चढ़ते वक्त दोषियों के मन में एकबार जरूर आया होगा, काश वो गलती नहीं की होती?
खैर, जैसी करनी, वैसी भरनी। हमें न्यायतंत्र पर भरोसा करना ही होगा। देर ही सही, इंसाफ मिलने की संभावनाएं तो रहती ही हैं। निर्भया के परिजनों ने भी लंबा इंतजार किया। वह अलग बात है उनका केस स्पेशल कैटागिरी में रखा गया। फांसी का यह दिन निर्भया के गुनाहगारों के अलावा उन दरिंदों के लिए भी सबब था जो ऐसा कर चुके हैं या करने की सोचेंगे। फांसी के दिन जेलर ने तय वक्त पर फांसी पर लटकाने का आदेश जल्लाद को दिया। देखते ही देखते चारों फांसी पर झूल गए और क्षण भर बाद ही दोषियों की सांसों ने शरीर का साथ छोड़ दिया। दस मिनट में शरीर मृत अवस्था में निढाल होकर रस्सी पर लटक गए। इन दृश्यों को देख या उनके विषय में सुनकर शायद ऐसे कृत्य करने वालों के मन में कुछ भय पैदा हो। जीवन को जीना आसान होता है। पर, उसे खत्म करना बड़ा मुस्किल होता है। निर्भया के गुनाहगारों की तरह शायद ही कोई अपने लिए वैसी मौत मांगे। निर्भया के दोषियों की फांसी समाज को किस तरह से संदेश देगी? ये देखने वाली बात होगी।
एनसीआरबी डाटा के मुताबिक हिंदुस्तान में रोजाना करीब नब्बे से ज्यादा बलात्कार के मामले दर्ज किए जाते हैं, जबकि इससे कहीं ज्यादा ऐसे मामले होते हैं जो सरकारी रजिस्टर में दर्ज नहीं हो पाते। बलात्कार के दर्ज मामलों में अदालतों की सुनवाई की प्रक्रिया बहुत धीमी रहती है। निर्भया केस में गनीमत यही रही कि वह केस जनाक्रोश का हिस्सा रहा और मीडिया में शुरू से सुर्खियों में रहा, नहीं तो वह भी न्याय के लिए लंबे समय तक लंबित रहता। निर्भया गैंगरेप के बाद पूरे देश में आंदोलन हुए और मौजूदा सरकार को महिला सुरक्षा को लेकर गंभीर होना पड़ा। वर्तमान और निवर्तमान सरकारों का ध्यान केस पर ही रहा। सभी के सामूहिक सहयोग से केस अपने अंतिम पड़ाव तक पहुंचा।
निर्भया घटना के बाद बलात्कार पीड़िताओं को जल्द न्याज दिलाने के लिए फास्ट ट्रैक कोर्ट गठित हुए। लेकिन जजों की कमी के चलते काम उस गति से आगे नहीं बढ़ा जिसकी उम्मीद थी। पिछले वर्ष भी है केंद्र सरकार ने पूरे देश में एक हजार अतिरिक्त फास्ट ट्रैक अदालतों का गठन करने का निर्णय लिया था, जिससे लंबित पड़े बलात्कार के मामलों को जल्द निपटाने का भरोसा दिया गया था। लेकिन सभी घोषणाएं और वादे ठंडे बस्ते में पडे़ हैं। कोर्ट में बैठने के लिए जजों की भारी कमी है। जज ही नहीं होंगे तो कोर्ट की दीवारें खड़ी करने से क्या फायदा। महिला सुरक्षा के मामले में हवा-हवाई बातें बहुत होती हैं पर जब एनसीआरबी के सालाना आंकड़े पेश होते हैं जिनमें महिलाओं के विरुद्ध होने वाले मामलों में वृद्वि दर्शायी जाती है तो सभी सरकारी दावे धरे रह जाते हैं।
(लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)


 
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