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खर्च को तड़पता निर्भया फंड

02/01/2020

खर्च को तड़पता निर्भया फंड


हैदराबाद कांड के बाद एक बार फिर इतिहास के पन्नों को झाड़ा-पोछा जा रहा है। कुछ दिनों बाद फिर उस पर धूल जमना शुरू हो जाएगा। धूल जमना फिर से शुरू हो उसके पहले उसके एक पन्ने को यहां पलटना जरूरी है। हैदराबाद कांड जैसे ही दिसंबर 2012 में एक विभत्स एवं दर्दनाक घटना (निर्भया कांड) के बाद पूरा देश आंदोलित हो गया था। उस घटना ने देश की सामाजिक-राजनीतिक जड़ों को हिला दिया था। लोगों का आक्रोश चरम पर पहुंच गया था। जिसके बाद बालात्कार पीड़ितों के लिए निर्भया फंड बनाया गया। जिससे यौन अपराध और दुष्कर्म पीड़ितों को तात्कालिक मदद पहुंचाया जा सके। पर सरकारी मशीनरी का निकम्मापन देखिए। उस फंड में केंद्र सरकार ने अब तक 3600 करोड़ रुपए जारी किए। मगर उस फंड का इस्तेमाल ही नहीं किया गया।महिला एवं बाल विकास मंत्री स्मृति ईरानी ने 29 नवंबर को लोकसभा में इस फंड की जानकारी दी। इसे सुनकर हर कोई हैरान हो गया। उन्होंने संसद में बताया, ह्यनिर्भया फंड से केंद्र सरकार द्वारा दिए गए पैसों में से महाराष्ट्र, मणिपुर, मेघालय, सिक्किम, त्रिपुरा, दमन और दीव की सरकारों ने एक भी पैसा खर्च नहीं किया।

उत्तर प्रदेश को 119 करोड़ रुपए मिले। उसमें सिर्फ छह करोड़ रुपए खर्च हुए है। तेलंगाना ने 103 करोड़ और आंध्र प्रदेश ने 22 करोड़ रुपए में क्रमश: केवल चार और 10 करोड़ खर्च किए हैं। वहीं बिहार ने 22 करोड़ में 6 करोड़ ही खर्च किया।निर्भया कांड के बाद दिल्ली के इंडिया गेट पर हुए बड़े आंदोलन की अगुवाई अरविंद केजरीवाल और उनकी टीम ने की। वर्ष 2013 से दिल्ली में उनकी सरकार है। केजरीवाल स्वयं मुख्यमंत्री हैं। महिला हेल्पलाइन के लिए दिल्ली सरकार को 50 लाख रुपए दिए गए। मगर उन्होंने एक भी रुपया खर्च नहीं किया। 36 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में से सिर्फ 20 में महिला हेल्पलाइन बनाने में पैसे खर्च किए गए। महिला हेल्पलाइन नहीं बनाने में हिमाचल प्रदेश, महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, कर्नाटक, झारखंड, राजस्थान, पश्चिम बंगाल और गोवा मुख्य राज्य हैं। पिछले साल अगस्त में महिला एवं बाल विकास राज्य मंत्री वीरेंद्र कुमार ने लोेकसभा में जवाब दिया कि निर्भया फंड से करीब एक हजार करोड़ रुपए जारी हुए हैं। इसमें 825 करोड़ पांच प्रमुख कामों के लिए आवंटित किए गए। जिन पांच कामों के लिए केंद्र सरकार ने राज्यों को निर्भया फंड से पैसा दिया, उसमें से अधिकांश पैसा भी राज्यों के पास रखा हुआ है।

इमरजेंसी रिस्पॉन्स सपोर्ट सिस्टम (ईआरएसएस)

2016-17 में इसके लिए अनुमानित राशि 321.69 करोड़ रुपए में से 273.36 करोड़ रुपए जारी हुए। ये पैसे राज्यों में बांटे गए। पिछले साल तक केवल दो राज्यों ने ईआरएसएस के तहत सिंगल इमरजेंसी नंबर 112 लॉन्च किया है। 28 नवंबर 2018 को हिमाचल प्रदेश और एक दिसंबर 2018 को नगालैंड ने यह सेवा शुरू की है। इसके अलावा अन्य राज्यों में इस सिस्टम के लिए काम ही नहीं हुआ।

सेंट्रल विक्टिम कम्पन्सेशन फंड (सीवीसीएफ)

केंद्र ने 2016 में सभी 36 राज्यों एवं केंद्र शासित प्रदेशों के बीच पीड़िताओं को एक बार मुआवजा देने के लिए 200 करोड़ रुपये भेजे। जानकारी के मुताबिक सबसे अधिक उत्तर प्रदेश को 28.10, मध्य प्रदेश को 21.80 और महाराष्ट्र को 17.65 करोड़ दिए गए थे। हालांकि इसमें बलात्कार के अलावा महिलाओं के दस अन्य जघन्य अपराध के लिए भी पीड़िता को पैसा दिया जाना है। मसलन, एसिड अटैक आदि। सिर्फ बलात्कार के ही मामले को देखा जाए तो इतने कम रकम से सभी पीड़िता को मुआवजा नहीं दिया जा सकता। 2016 में ही बलात्कार के 38,947 मामले दर्ज हुए थे।हाल में सुप्रीम कोर्ट ने भी इस पर सरकार को फटकार लगाई है। सुप्रीम कोर्ट में इस सुनवाई के दौरान राष्ट्रीय विधिक सेवा प्राधिकरण (नालसा) ने बताया कि विभिन्न राज्यों में दुष्कर्म की शिकार सिर्फ 5 से 10 फीसदी पीड़िताओं को ही निर्भया फंड के तहत मुआवजा मिल रहा है। नालसा ने बताया कि आंध्र प्रदेश में उपलब्ध आंकड़ों की मानें तो पिछले साल वहां यौन हिंसा के 901 मामलें दर्ज हुए। इसमें सिर्फ एक पीड़िता को मुआवजा मिला। नालसा के मुताबिक राजस्थान में 2017 में 3305 मामले दर्ज हुए। जिसमें 140 पीड़िताओं को मुआवजा मिला। बिहार में 1199 महिलाएं यौन शोषण की शिकार हुई। इसमें सिर्फ 82 पीड़िताओं को मुआवजा मिला।

एकीकृत इमरजेंसी रिस्पॉन्स सिस्टम (आईईआरएमएस)

पिछले साल महिला एवं बाल विकास राज्य मंत्री ने लोकसभा में कहा था कि आईईआरएमएस कार्यान्वयन के लिए रेल मंत्रालय को 2016-17 में 50 करोड़ और 2017-18 में 100 करोड़ रुपये किए गए। जबकि रेल मंत्रालय का कहना है कि उन्हें 2018 तक तक केवल 50 करोड़ रुपए ही मिले हैं। एक आरटीआई के जवाब से पता चला है कि इस प्रोजेक्ट के लिए रेलटेल कॉरपोरेशन को राशि दी गइ। इसके लिए एक ह्यरेफरेंस फॉर प्रपोजलह्ण मंगाया गया। यह प्रपोजल 28 सितंबर 2018 को आया। यह प्रपोजल भारतीय रेलवे के 67 डिवीजनों में सीसीटीवी लगाने के लिए मंगाया गया था। यह काम भी अभी बहुत बाकी है।

वन स्टॉप सेंटर

यह योजना 1 अप्रैल 2015 से लागू की गई। इसका उद्देश्य हिंसा से प्रभावित महिलाओं को चिकित्सा सहायता, पुलिस सहायता, कानूनी सहायता, केस मैनेजमेंट सहित विभिन्न सहायताएं देना है। इस योजना के तहत देशभर में वन स्टॉप सेंटर स्थापित किया जाना है। अगस्त 2018 तक 109 करोड़ रुपए इस योजना के लिए दिया गया। जबकि इस योजना का अनुमानित बजट 867.74 करोड़ रुपए है। भोपाल में ऐसा पहला ऐसा केंद्र 2017 में खोला गया। पिछले साल तक 718 जिलों में 232 सेंटर काम कर रहे थे। एक मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक 536 सेंटरों की अभी मंजूरी ही दी गई है।

महिलाओं एवं बच्चों के खिलाफ साइबर अपराध की रोक

इसके लिए 2017-18 के दौरान 94.5 करोड़ की राशि गृह मंत्रालय को दी गई। मंत्रालय के एक उच्च सूत्रों के मुताबिक इसमें से छह करोड़ रुपये मार्च 2020 तक 45,000 पुलिस, अभियोजक और न्यायिक अधिकारियों के प्रशिक्षण के लिए अलग रखा गया है। बाकी पैसा राज्यों में साइबर फॉरेंसिक लैब स्थापित करने और उन लैबों को चलाने के लिए साइबर फॉरेंसिक कंसल्टेंट्स की नियुक्ति के लिए राज्यों को दिया गया है। पिछले साल तक एक भी लैब स्थापित नहीं हुआ था। मेघालय के 23 पुलिस अधिकारियों के लिए केवल एक बार प्रशिक्षण दो से छह अप्रैल 2018 के बीच हुआ था। इस तरह निर्भया फंड को भी राज्य खर्च नहीं कर पा रही है। यह तब हो रहा है, जब महिला सुरक्षा को लेकर पूरा देश चिंतित है। इन सबके के बीच देशवासियों को सांत्वना देने वाली खबर बस यही है कि निर्भया कांड के दोषियों को फांसी होना है। राष्ट्रपति ने दोषियों की दया याचिका को खारिज कर दिया है। 16 दिसंबर या उसके बाद कभी भी दोषियों को फांसी दिया जा सकता है। तिहाड़ जेल में इसकी तैयारी शुरू हो गई है।


 
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