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राहुल गांधी का तमिल प्रेम

18/03/2020

राहुल गांधी का तमिल प्रेम 
-सियाराम पांडेय'शांत' 
कांग्रेस नेता राहुल गांधी अपने हक की तो बात करते हैं लेकिन अपने कर्तव्यों को अक्सर भूल जाते हैं। उन्हें तमिलों और तमिल भाषा की तो चिंता है लेकिन अन्य भारतीय भाषाओं की चिंता नहीं है।  इन भाषाओं को बचाने के लिए कहां क्या हो रहा है, हो भी रहा है या नहीं हो रहा है, यह सब जानने की उन्हें फुर्सत नहीं। उन्हें मलाल इस बात का है कि वे संसद में जो सवाल पूछें, उसका प्रतिपूरक सवाल पूछने का भी उन्हें मौका दिया जाए। उनका आरोप है कि तमिल भाषा को बचाने के लिए सरकार कुछ नहीं कर रही। उनका तर्क है कि लोकसभा सबके लिए है और यहां चर्चा होनी चाहिए। इसमें नई बात क्या है? राहुल गांधी को लगता है कि भारतीय संसद वन ट्रैफिक है। वह लाउड स्पीकर है। संसद के लिए इस तरह की टिप्पणी शोभनीय नहीं है। उन्होंने तमिल भाषा का सवाल उठाकर देश में विवाद की जमीन तैयार करने की कोशिश की है। 
जब वे संसद में यह कहते हैं कि तमिलों को अपनी भाषा बचाने का हक है तो इसका स्वागत किया जाना चाहिए लेकिन अन्य भाषा भाषियों को अपनी भाषा बचाने का हक है या नहीं, लगे हाथ वे यह भी बता देते तो ज्यादा अच्छा होता। अचानक राहुल गांधी का तमिल प्रेम समझ से परे हैं। लगता है संसद को वह अपनी राजनीति का मोहरा बनाना चाहते हैं। उत्तर भारत में कांग्रेस जनाधार खो चुकी है और अब दक्षिण भारत में भी भाजपा का रथ आगे बढ़ रहा है। सच यह है कि इस बात को राहुल गांधी पचा नहीं पा रहे हैं। द्रमुक नेताओं का हिंदी विरोध जगजाहिर है। एम.करुणानिधि की राजनीतिक उत्पत्ति ही हिंदू विरोध की बुनियाद पर हुई है। कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी ने लोकसभा में तमिलनाडु का अधिकार छीनने की बात की है। हिंदी भाषा के संदर्भ में द्रमुक सदस्यों को पूरक प्रश्न नहीं पूछने दिया गया। उन्हें लोकसभा अध्यक्ष ने इस बावत अनुमति नहीं दी। यह अनुमति ओम बिड़ला ने क्यों नहीं दी, इसे तो वे ही बेहतर बता सकते हैं लेकिन इससे तमिलों और तमिल भाषा पर आक्रमण कैसे हो गया? लोकसभा अध्यक्ष ने तमिल भाषा के विरोध में कोई बात तो कही नहीं। उस पर कोई आपत्तिजनक टिप्पणी नहीं की। फिर तमिलनाडु का अधिकार कैसे छिन गया? द्रमुक सांसदों के लिए तमिल उनका इतिहास है, दिल है, डीएनए है तो अन्य भाषा भाषी सांसदों का दिल क्या होगा, लगे हाथ राहुल गांधी को यह भी बता देना चाहिए। भाषा किसी के दिल में रह सकती है, उस पर राज कर सकती है लेकिन वह दिल और डीएनए नहीं हो सकती। इस बारीक सी बात को राहुल जितनी जल्दी समझ जाएं, उतना ही अच्छा होगा। 
देश में वैसे भी 22 भाषाओं को संवैधानिक ढंग से आधिकारिक भाषा का दर्जा मिला हुआ है। भारतीय नोट पर भी 17 भाषाएं छपी होती हैं। इनमें तमिल भी शामिल है। न तो नोट से तमिल भाषा को हटाया गया है और न ही आधिकारिक भाषाओं का उसका दर्जा खत्म हुआ है तो फिर अचानक तमिल का अस्तित्व खतरे में कैसे पड़ गया? राहुल गांधी ही नहीं, पूरी कांग्रेस को इस बात का जवाब देना चाहिए कि तमिलनाडु में कौन सी भाषा आगे बढ़ रही है। नई शिक्षा नीति में तीसरी भाषा के तौर पर हिंदी पढ़ाने का द्रमुक पहले ही विरोध कर चुकी है।  आम तौर पर भारत में 206 भाषाएं बोली जाती हैं जबकि दुनिया में कुल भाषाओं की संख्या 6809 है। इनमें से 90 फीसदी भाषाओं को बोलने वालों की संख्या एक लाख से भी कम है। लगभग 200 से 150 भाषाएं बोलने वालों की संख्या 10 लाख से अधिक है जबकि लगभग 357 भाषाएं बोलने वालों की संख्या महज 50 है जबकि 46 भाषाएं ऐसी हैं जिन्हें बोलने वालों की संख्या केवल एक है। 
प्रख्यात भाषाविद् ग्रियर्सन ने भी माना था कि भारत में 179 भाषाएं और 544 बोलियां हैं। भारत ऐसा देश है जहां कोस-कोस पर पानी और चार कोस पर बानी बदलने की बात कही गई है। हर भाषा को सम्मान देने वाले देश में किसी भाषा का अधिकार छीनने की बात करना कितना दुस्साहसपूर्ण है, इस पर भी सोचा जाना चाहिए। भारत वसुधैव कुटुंबकम की भावना में यकीन रखता है और यहां की भाषाएं भी परिवार भावना से काम करती हैं। भारोपीय परिवार को सबसे बड़ा भाषा परिवार कहा गया है। दुनिया में इस बोलने वालों की संख्या भी सबसे ज्यादा है। संस्कृत, पालि, प्राकृत, अपभ्रंश, हिंदी, बंगाली, फारसी, ग्रीक, लैटिन, अंग्रेजी, रूसी, जर्मन, पुर्तगाली और इतालवी आदि भारोपीय भाषा परिवार की प्रमुख भाषाएं हैं। द्रविड़ भाषा परिवार में तमिल, कन्नड़, तेलुगू आदि शामिल हैं। वर्ष 2011 की जनगणना के अनुसार भारत की 43.63 प्रतिशत जनता ने हिंदी को अपनी मातृभाषा घोषित किया था। यह भाषा डेटा 26 जून 2018 को जारी किया गया था। भिली अथवा भिलोदी 1.04 करोड़ वक्ताओं के साथ सबसे ज्यादा बोली जाने वाली गैर अनुसूचित भाषा थी। वर्ष 2011 की जनगणना के मुताबिक देश के 43.63 प्रतिशत लोग हिंदी, 0.02 प्रतिशत लोग अंग्रेजी, 8.3 प्रतिशत लोग बंगाली, 7.09 प्रतिशत लोग मराठी, 6.93 प्रतिशत लोग तेलुगु और 5.89 प्रतिशत लोग तमिल बोला करते थे। कोई भाषा तब संरक्षित होती है जब उसे बोलने और जानने वाले बचें। जब तमिलों पर ही संकट नहीं है तो तमिल भाषा पर संकट का तो सवाल ही पैदा नहीं होता। 
(लेखक हिन्दुस्थान समाचार से संबद्ध हैं।)


 
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