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अफगानिस्तान में शांति बहाली के निहितार्थ

12/08/2019

ललित बंसल      
फगानिस्तान में शांति बहाली के लिए अमेरिकी प्रयास अंतिम पड़ाव पर हैं। अमेरिका जल्दी से जल्दी अफगानिस्तान से बाहर निकलने को आतुर है। उधर अफगानिस्तान में राष्ट्रपति पद के चुनाव 28 सितंबर को होने तय हैं। इन चुनाव में मौजूदा राष्ट्रपति अशरफ गनी सहित 17 उम्मीदवार मैदान में हैं, जबकि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प अपने देश की जनता को यह बार-बार भरोसा दिला चुके हैं कि अगले साल नवंबर में होने वाले चुनाव से पूर्व वह क्रमबद्ध तौर-तरीकों से अपनी सेनाओं को घर बुला लेंगे। अमेरिका में राष्ट्रपति चुनाव की सरगर्मियां बढ़ गई हैं। ट्रम्प किसी भी स्थिति में कोई मौका खोना नहीं चाहते। इस सिलसिले में पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान को ह्वाइट हाउस से निमंत्रण दिया जाना, अफगानिस्तान के मामले में पाकिस्तानी सेना और आईएसआई के तालिबानी नेताओं से कथित संबंधों का लाभ उठाने के लिए पाकिस्तानी प्रधानमंत्री से सहयोग मांगना तथा बदले में इमरान की ओर से कश्मीर मुद्दा उठाया जाना इस सिलसिलेवार कड़ी के हिस्से हैं। पाकिस्तान इस दिशा में कदम आगे बढ़ाता, तभी भारत ने गुगली फेंककर इमरान को चारों खाने चित्त कर दिया है।  
मीडिया रिपोर्ट की मानें तो अमेरिकी कूटनीतिज्ञ जलमय खलीलजाद और तालिबान प्रतिनिधियों के बीच करीब-करीब एक राय बन गई है। 18 वर्षों से युद्धरत तालिबान ने दोहा में आठवें दौर की बातचीत में अमेरिका को भरोसा दिलाया है कि वह अल कायदा अथवा ऐसे ही किसी आतंकवादी संगठन को अमेरिकी हितों पर चोट करने से रोकेगा और अफगानिस्तान की जमीन पर किसी आतंकवादी संगठन को पनपने नहीं देगा। तालिबान ने यह शर्त भी मान ली है। एक बार अमेरिकी सेनाओं की घर वापसी के टाइम टेबल पर सहमति हो जाए, तो फिर वह अफगानिस्तान सरकार के अधिकारियों से भी वार्ता करने के लिए तैयार होगा। जनरल राबर्ट डनफोर्ड अफगानिस्तान पहुंच चुके हैं। अमेरिका ने सीधे अपने सभी सैनिकों को एक साथ घर बुलाने की बजाय 'परिस्थितिमूलक' स्थितियों के अंतर्गत अपने सैनिकों और साज सामान हटाए जाने पर सहमति जताई है। हालांकि अभी सेनाओं की घर वापसी का कोई टाइम टेबल घोषित नहीं किया गया है। जैसे-जैसे अफगानिस्तान के राष्ट्रपति पद के चुनाव की तिथि समीप आ रही है, तालिबानी नेताओं में बेचैनी बढ़ती जा रही है। शनिवार को उसने काबुल पुलिस ट्रेनिंग स्टेशन के सामने विस्फोट कर 14 लोगों की जान ले ली और 145 को घायल कर दबाव बढ़ा दिया है। यही नहीं, तालिबान प्रवक्ता मुजाहिद हबीबुल्लाह ने चेतावनी दे डाली है कि उनके लड़ाके चुनाव रैलियों में बाधा पहुंचाएंगे। इससे एक बार फिर ऊहापोह की स्थिति बन गई है। इस पर संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंटोनियो गुतेरस ने तालिबान से शांति बनाए रखने और चुनावी प्रक्रिया में किसी तरह की खलल नहीं डालने का आग्रह किया है।   
इस सबके बावजूद जलमय खलीलजाद का कूटनीतिक अभियान जारी है। वह पिछले सप्ताह काबुल में एक सप्ताह के प्रवास के बाद भारत होते हुए नाटो सदस्य देशों के प्रतिनिधियों से भेंट करने के लिए यूरोप पहुंच चुके हैं। अफगानिस्तान में शांति बहाली को लेकर भारत की स्थिति स्पष्ट है। भारत ने एक बार फिर स्पष्ट कर दिया है कि अफगानिस्तान में शांति बहाली के लिए किसी भी समझौते पर पहुंचने से पूर्व अफगानिस्तान सरकार को भरोसे में लेना बनता है। खलीलजाद राष्ट्रपति अशरफ गनी को दोहा में तालिबान से आठ दौर की बातचीत के बारे में सिलसिलेवार रिपोर्ट दे चुके हैं। हालांकि अशरफ गनी इन वार्ताओं से संतुष्ट नहीं प्रतीत होते हैं। उन्होंने 15 सदस्यीय प्रतिनिधिमंडल की घोषणा भी कर दी थी, जिसे तालिबान से बात करने के लिए नामित किया गया था। लेकिन हबीबुल्ला ने एक बार फिर टका-सा जवाब देकर उन्हें निराश किया है। अशरफ के पूर्व सलाहकार मसाओंद ने त्वरित प्रतिक्रिया में कहा है कि अफगानिस्तान में शांति बहाली के लिए विदेशी शक्तियों के भरोसे किसी डील को अफगानी जनता कभी स्वीकार नहीं करेगी। इसके लिए अफगानिस्तान सरकार की ओर से चुनिन्दा अधिकारियों की टीम के साथ तालिबानी नेताओं की सीधी बातचीत नितांत अनिवार्य है। 
विदित हो, अमेरिकी विदेश मंत्री माइक पोम्पियों ने पिछले वर्ष अफगानिस्तान दौरे में राष्ट्रपति अशरफ गनी से मुलाकात के बाद यह बयान दिया था कि तालिबान को सीधे शांति वार्ता के लिए अफगानिस्तान सरकार से सम्पर्क करना चाहिए। इसके साथ पोम्पियो ने इस बात पर भी जोर दिया था कि शांति वार्ता में किसी भी निदान पर पहुंचने से पहले इस क्षेत्र की 'शक्तियों' से सलाह-मशविरा कर लेना जरूरी होगा। हालांकि उन्होंने क्षेत्रीय शक्तियों के नामों का उल्लेख तो नहीं किया। लेकिन उनका इशारा नि:संदेह भारत की ओर था। 
इस शांति वार्ता को लेकर पाकिस्तान में राजनीति शुरू हो गई है। तहरीक ए इंसाफ़ पार्टी (पीटीआई) के चेयरमैन और प्रधानमंत्री इमरान खान पर तो आरोप-प्रत्यारोप शुरू हो गई है। वह अकेले पड़ते जा रहे हैं। इधर, भारत ने जम्मू कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटाकर तथा जम्मू कश्मीर और लद्दाख का पुनर्गठन कर मियां इमरान की मुश्किल और बढ़ा दी है। उन्होंने संयुक्त राष्ट्र में गुहार के लिए चीन से मदद मांगी है तो अमेरिका ने द्विपक्षीय मामला बताकर पाकिस्तान की मदद को रफा-दफा करने की कोशिश की है। इसके बावजूद ढोल पीटा जा रहा है कि अफगानिस्तान में पाकिस्तान के सहयोग के बिना शांति वार्ता कभी सफल नहीं हो सकती। इसके विपरीत भारत सामरिक दृष्टि से अफगानिस्तान का मित्र देश है। आतंकवाद के बारे में भारत और अफगानिस्तान की एक ही सोच है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने हमेशा जोर दिया है कि शांति वार्ता अफगानिस्तान के नेतृत्व में और उसके नियंत्रण में हो। यही नहीं, भारत ने अफगानिस्तान के आर्थिक विकास और पारस्परिक सहयोग में दो अरब डालर व्यय किए हैं।   
उधर तालिबान का अफगानिस्तान के 43 प्रतिशत भू-भाग पर कब्ज़ा है। उसने इस्लामिक एजेंडे के तहत हिंसक आंदोलन में पिछले छह महीनों में 1692 निरीह नागरिकों की हत्या की है। साथ ही क्या यह कहना उचित होगा कि अमेरिका ने अठारह साल, दो खरब डालर और 6251 अमेरिकी सैनिक गंवा देने के बाद इसके राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प अब प्रतिवर्ष जनता की आयकर की कमाई में से बीस अरब डालर और नहीं गंवाना चाहते?  

(लेखक हिन्दुस्थान समाचार से सम्बद्ध हैं।)


 
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