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भारत की कूटनीतिक सफलता

06/08/2019

भारत की कूटनीतिक सफलता


विश्व राजनीति की दिशा को तय करने के लिहाज से कई अंतर्राष्ट्रीय संस्थाएं बनीं और बिखर गयीं। कई बार संस्थाएं जिस उद्देश्य से बनायीं गयीं, उसके नक्शे कदम पर काम हुआ ही नहीं। जी-20 का सम्मेलन भी बहुत हद तक उसी श्रेणी का हिस्सा है, जहां अपने मूल मकसद से हटकर अन्य हर मुद्दे पर बहस होती है। जी-20 की शुरुआत 1999 में हुई। इसका मूलभूत उद्देश्य अनियंत्रित आर्थिक व्यवस्था को अनुशासित करना था। साल 1997 में एशिया में आर्थिक संकट का दौर था। इस बात की आशंका बढ़ती जा रही थी कि यह चक्रवात दुनिया को अपने घेरे में ले लेगा। वर्ष 2008 में यूरोप में आर्थिक मुसीबत खड़ी हुई, तब जी-20 को एक सुनयोजित मंच देने की मांग जोर पकड़ने लगी। 2011 के बाद से वार्षिक सम्मेलन होने लगा और यह मंच केवल आर्थिक व्यवस्था तक सीमित नहीं रहा। द्विपक्षीय और बहुपक्षीय संगठन भी इस मंच का फायदा उठाकर आपसी गुत्थी को सुलझाने का प्रयास करते हैं, जैसा ब्रिक्स और अन्य संगठनों ने अपनी बुनियादी मसलों पर विचार विमर्श किया। जी-20 का ओसका सम्मेलन इसलिए भी अहम था कि दुनिया के दो महत्वपूर्ण शक्तियों के बीच तनातनी का माहौल था।

जिस विश्व आर्थिक व्यवस्था में आमूलचूल परिवर्तन की बात भारत करता है, बहुत हद तक चीन भी उसी की बात करता है। दूसरी तरफ 5जी और ओ.बी.आर. को लेकर अमरीका की सोच भारत से मिलती जुलती है। इसलिए ओसका का जी सम्मलेन भारत के राष्ट्रीय हित को मजबूत बनाने का एक महत्वपूर्ण आयाम होगा।

रूस और अमेरिका के बीच भी द्वन्द बढ़ते जा रहे थे। रूस ने इस मंच के जरिये अपने आर्थिक शर्तो को रखने की कोशिश की। इसलिए यह मौका भारत के लिए काफी हितकर रहा। प्रधानमंत्री के तौर पर मोदी छठवीं बार जी-20 में शिरकत कर रहे थे। दूसरी बार पहले से अधिक ताकत के साथ चुनाव जीत कर आने के बाद उनकी अंतरराष्ट्रीय साख बढ़ी है। प्रधानमंत्री ने भारत के हितों को ध्यान में रखते हुए अमेरिका और चीन के बीच संतुलन बनाने की बात भी रखी। जहां भारत ने रूस और चीन के साथ मिलकर बहध्रुवीय व्यवस्था की नींव रखने की बात कही, तो अमेरिका के साथ मिलकर इंडो-पैसिफिक में नए सामरिक समीकरण को तरजीह दिया। भारत की नीति किसी भी देश के साथ संघर्ष की नहीं है, विशेषकर चीन और अमेरिका के साथ लेकिन भारत की वैचारिक समानता और हित भी दोनों देशोंके साथ अलग- अलग है। एक चतुर और मजबूत नेता की तरह प्रधानमंत्री मोदी ने राष्ट्रीय हित को एक शक्ल और सूरत दी, जिसका लाभ आने वाले दिनों में दिखेगा।

भारत अपनी शर्तों पर कायम
जी-20 सम्मलेन केवल अपने एजेंडे तक सिमित नहीं था। बातें एक नयी दुनिया बनाने की है, जिसमें चीन और अमरीका के बीच द्वन्द्व है। सबकी निगाहें भीं इसी मुद्दे पर थीं। अमेरिका ने चीन की बात को मानते हुए टेर्रिμस में कटौती की बात मन ली है लेकिन यह उपाय महज मरहम पट्टी से ज्यादा कुछ नहीं है। द्वन्द्व तो दादागिरी का है। विश्व व्यवस्था की कुंजी किसके हाथो में होगी? क्या वैश्विक आर्थिक संगठन अमेरिकी दलीलों से हटकर चीन के इशारे पर चलेंगे या अमेरिकी हठधर्मिता बनी रहेगी? विश्व राजीनीति के पंडित यह जानते हैं कि जिसके चंगुल में आर्थिक ढांचा होगा, वही दुनिया का पुरोहित भी कहलाएगा। भारत के नजरिये से चीन- अमरीका का संघर्ष हर तरीके से फायदे का सौदा है।
भारत की विदेश नीति अपने नए शर्तों के साथ है। वह न तो अमरीका के दबाव में है और न ही चीन की धमकी से डरने वाला है लेकिन जरुरत है अपने आर्थिक व्यवस्था को मजबूत करने की जो तल्ख संघर्ष के बिना ही हो सकता है। प्रधानमंत्री ने ओसका में ऐसा ही कुछ किया है।

भारत के नजरिये से यह सम्मलेन बहुत ही कारगर और सार्थक रहा, क्योंकि इस सम्मलेन में दुनिया के वो तमाम देश शामिल थे जिनके सहारे नयी विश्व व्यवस्था की रणनीति बनायीं जा रही है। भारत के प्रधानमंत्री ने न केवल जापान के साथ वार्ता को एक नयी दिशा दी, बल्कि अमरीकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के साथ मिलकर विश्व के अहम सवालों पर चर्चा की। ये सवाल भारत के राष्ट्रीय हित में अहम भूमिका रखते हैं। भारत ने दो अलग-अलग और विपरीत खेमों के साथ अपना पक्ष रखने की कोशिश की। ब्रिक्स के देशों से भी बातचीत हुई। मोटे तौर पर यह बैठक भारत के लिए उपयोगी और सार्थक रही। फिर भी सवाल यह है कि बहुपक्षीय सम्मलेन में केवल भारत के कहने या सोचने से बात नहीं बनेगी। इसके लिए अन्य देशों की रजामंदी जरूरी है। आतंकवाद, 5जी, डाटा ट्रांसफर और क्लाइमेट चेंज ऐसे विषय है जिनपर सभी देशों में आम सहमति की जरूरत है।

अंतरराष्ट्रीय आर्थिक संस्थाएं विवाद के घेरे में हैं। किसी एक देश की हठधर्मिता से विश्व व्यापार तंग है। विशेषकर विकासशील देशों की मुश्किलें बढ़ती जा रही हैं। विश्व व्यापार केंद्र और अन्तरराष्ट्रीय मुद्रा कोष अमेरिकी दबाव के भार से दबे हुए हैं। भारत ने उन सारे मुद्दों पर नए सिरे से विचार करने की बात पर जोर दिया है। भारत ने डिजिटल इकोनॉमी पर ओसाका घोषणा पत्र पर हस्ताक्षर करने से इनकार कर दिया।

2022 में भारत में जी-20
केंद्रीय मंत्री सुरेश प्रभु ने बताया कि सऊदी अरब और इटली के बाद 2022 में भारत जी-20 की मेजबानी करेगा। प्रभु ने कहा कि जी-20 सम्मेलन को भारत कई दृष्टिकोण से देखता है। इसकी शुरुआत इस मकसद के साथ की गई थी कि सभी ग्लोबल अर्थव्यवस्था का ठीक से ख्याल रखा जा सके। इस सम्मेलन में हिस्सा लेने वाले सभी देश ग्लोबल अर्थव्यवस्था का 85 प्रतिशत हिस्सा रखते हंै। भारत भी इसका समर्थन करता है कि ग्लोबल अर्थव्यवस्था सुचारु रहे।

जापान से और घनिष्ठता की उम्मीद
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जापान में भारतीय समुदाय को संबोधित करते हुए कहा ‘‘नए भारत में दोनों देशों के संबंध और मजबूत होंगे।’’ कोबे में भारतीय समुदाय से मोदी ने कहा-‘‘जब भारत का दुनिया के साथ संबंध की बात आती है तो जापान का इसमें एक अहम स्थान है। यह संबंध शताब्दियों पुराना है। इसमें एक-दूसरे की संस्कृति और सभ्यता के प्रति सम्मान है। भारत अगले पांच वर्ष में पांच ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था बनाने का लक्ष्य रखता है। इस लिहाज से दोनों देशों के संबंध और मजबूत होंगे। दुनिया आज भारत को संभावनाओं के ‘गेटवे’ के तौर पर देखती है।’’ प्रधानमंत्री ने घोषणा की कि अक्टूबर में होने वाले सम्राट नारहितो के राज्याभिषेक कार्यक्रम में राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद शिरकत करेंगे।

भारत के साथ-साथ दक्षिण अफ्रीका, इंडोनेशिया समेत कई अन्य देशों ने भी इससे दूरी बनाई है। घोषणा पत्र के पक्ष में दलील दी जा रही है कि डिजिटल इकोनॉमी से वैश्विक अर्थव्यवस्था को मजबूती मिलती है और लोगों को भी फायदा होता है। हालांकि, भारत में इसे लेकर नीति नियंताओं की राय अलग है। भारतीय रिजर्व बैंक इसके खिलाफ है। भारतीय रिजर्व बैंक का कहना है कि भुगतान से संबंधित सभी डेटा केबल स्थित सिस्टम में स्टोर किया जाना चाहिए। डेटा को प्रोसेसिंग के बाद ही भारत में स्टोर किया जाए। यही नहीं, लेन-देन का पूरा ब्योरा डेटा का हिस्सा होना चाहिए। इसके पीछे नीति नियंताओं की दलील है कि ऐसा होने से विदेशी धरती से इसके दुरुपयोग की आशंका कम की जा सकेगी। भारतीय रिजर्व बैंक के साथ साथ वाणिज्य मंत्रालय के मसौदे से साफ है कि फेसबुक, गूगल और अमेजन जैसी बहुराष्ट्रीय कंपनियों को भारतीयों के संदेशों और खरीदारी से संबंधित डॉटा को भारत में ही संग्रहित करना होगा। डॉटा की सुरक्षा को लेकर चिंतित होने वालों में भारत ही नहीं चीन भी शामिल है।

निष्कर्ष
संभवत: शीत युद्ध के बाद पहली बार दुनिया दो अलग ढांचे में बटी हुई दिखाई दी। चीन की राज्य केंद्रित ढांचा और अमरीका मुक्त व्यापार सोच, संघर्ष आर्थिक लाभ से लेकर सामरिक बिसात तक की है। आॅस्ट्रेलिया, जापान और कई देश अमरीका के साथ खड़े हैं तो कई देश चीन के ओ.बी.आर का अभिन्न हिस्सा हैं। भारत ने अपनी चाल सोच समझकर कर चली। एक तरफ अमरीकी राष्ट्रपति के साथ भारत ने शिकायत और परेशानी को साझा किया, वहीं इस बात की पुष्टि भी की कि भारत ने अमरीकी पहल को मानते हुए ईरान से अपने तेल आयात को कम कर दिया है। मालूम है कि भारत का 11 प्रतिशत तेल ईरान से आता है। साथ ही भारत ने अमेरिका के साथ मिलकर अपने इंडो-पैसिफिक समीकरण को मजबूत बनाने की बात भी अमरीका से की। भारत ने ब्रिक्स देशों को भी विश्वास में लिया, चीन के साथ आर्थिक व्यापार को और आगे बढ़ाने की सहमति जताई।


 
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