युगवार्ता

Blog single photo

सुनवाई खत्म, फैसला सुरक्षित

30/10/2019

सुनवाई खत्म, फैसला सुरक्षित

संजय कुमार झा

राम जन्मभूमि पर सुनवाई कर चुकी पांच सदस्यीय संविधान पीठ ने पूरे 40 दिनों तक सभी पक्षों को सुना और निर्णय सुरक्षित रख लिया है।

वकालत में ‘माइंड गेम’ का बड़ा महत्व है और अयोध्या मामले के अंतिम तीन दिनों की सुनवाई में यह खुलकर देखने को मिला। 14 अक्टूबर को मुसलमान पक्षकारों के वकील राजीव धवन ने कहा कि जमीन हमेशा मुसलमानों की थी और हिंदुओं ने 1989 तक उस पर मालिकाना हक का दावा नहीं किया। पीठ ने उस पर सवाल करते हुए कहा कि बाहरी परिसर पर हिन्दू काबिज रहे हैं और उसके सबूत हैं। बाहरी परिसर को अलग करने वाली लोहे की ग्रिल, वहां मौजूद राम चबूतरा, सीता रसोई और भंडार गृह पर सवाल किया।
उस पर धवन ने कहा कि हिंदुओं को केवल प्रार्थना का अधिकार था। जस्टिस चंद्रचूड़ ने उन्हें याद दिलाया कि मुसलमानों ने बाहरी परिसर में बैरागियों के रहने की शिकायत की थी। उस पर धवन ने कह डाला कि ‘सारे सवाल हमसे ही किए जाते हैं, दूसरे पक्ष से नहीं’। वह इतने पर ही नहीं रुके। उन्होंने कहा कि न्यायालय को इतिहास के पुनर्लेखन से बचना चाहिए। ‘अगर आप बाबर को लाएंगे तो अशोक पर भी विचार करना होगा।’ अयोध्या मामले में बाबर तो उचित ही है पर अशोक? यही ह्यमाइंड गेमह्ण है।
तथ्य कमजोर हों तो उसकी भरपाई इसी तरह की जाती है। अच्छी बात यह है कि संविधान पीठ धवन की इस कमजोरी से वाकिफ है। अगले दिन जब हिंदू पक्षकारों के वकील ने बोलना आरंभ किया तो उनसे भी लिमिटेशन एक्ट, एडवर्स पोजेशन संबंधी कानून पर कई सवाल किए गए। खासकर धवन के उस दावे के बारे में कि मस्जिद हमेशा मस्जिद ही रहेगा। भले ही उसे गिरा दिया गया हो। जवाब में परासरण ने कहा कि एक मंदिर हमेशा मंदिर ही रहेगा। उन्होंने कहा कि बाबर ने जो ऐतिहासिक गलती की उसे दुरुस्त करने की आवश्यकता है। अयोध्या में 55-60 मस्जिद हैं और मुसलमान कहीं भी नमाज पढ़ सकते हैं। लेकिन राम का जन्मस्थान एक ही है, हम उसे बदल नहीं सकते।
उस दौरान अदालत में ठहाके भी लगे जब मुख्य न्यायाधीश ने धवन से पूछा ह्यह्यक्या हम भरपूर सवाल कर रहे हैं?’ यह था धवन के माइंड गेम का जवाब। पर अदालत को आगे और भी कुछ देखना था। अंतिम दिन पीठ ने सभी पक्षों को बहुत ही संक्षिप्त में अपनी बात खत्म करने को कहा। हिंदुओं की ओर से विकास सिंह ने किशोर कुणाल लिखित एक पुस्तक प्रस्तुत किया, जिसका धवन ने विरोध किया। लेकिन पीठ ने धवन से कहा कि उन्हें अपनी बात कहने दें। फिर विकास सिंह ने पुस्तक का वह नक्शा दिखाया जिसमें राम का असल जन्मस्थान दर्शाया गया है। धवन ने एक बार फिर विरोध करते हुए कहा कि वह इसका क्या करेंगे।
उनके व्यवहार से आहत पीठ ने कहा कि उसके टुकड़े कर डालिए। धवन ने बिना समय गंवाए उस नक्शे को फाड़ दिया। यह माइंड गेम का क्लाइमेक्स था। खबर आग की तरह फैल गयी। घबराए धवन ने भोजनावकास के बाद पीठ से कहा कि उन्होंने जो कुछ भी किया उसके लिए इजाजत ली थी। मुख्य न्यायाधीश ने कहा था कि ‘अगर यह अप्रासंगिक है तो आप इसे फाड़ सकते हैं’। उस पर न्यायमूर्ति रंजन गोगोई ने तपाक से कहा कि ‘ठीक है, डॉ. धवन ने वही किया जो मुख्य न्यायाधीश ने कहा। अब इस स्पष्टीकरण की भी व्यापक रिपोर्टिंग हुई’।
शाम के चार बजे के आसपास जब धवन कुछ कह रहे थे, मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि सुनवाई पूरी हो चुकी है और निर्णय सुरक्षित रख लिया गया है। इससे पूर्व सुनवाई के अंतिम दिन सुन्नी वक्फ बोर्ड ने एक हलफनामा दायर कर कहा कि वह अपना दावा छोड़ने को तैयार है, लेकिन कुछ शर्तें हैं। पीठ ने उस पर तुरन्त कोई निर्णय नहीं लिया और सुनवाई जारी रही। सवाल यह है कि इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने वक्फ बोर्ड को सिर्फ एक तिहाई हिस्सा दिया तो वह पूरी जमीन छोड़ने की बात कैसे कह सकता है?


 
Top