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अब प्रियंका गांधी पर आस

24/01/2020

अब प्रियंका गांधी पर आस

संजय वर्मा

विवार 5 जनवरी की रात सोशल मीडिया जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में हुई हिंसा पर दी जाने वाली प्रतिक्रियाओं से पटा हुआ था। उनमें से एक ट्वीट कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी का भी था। उनके ट्वीट में नया कुछ नहीं बल्कि वही सब था जो वो अक्सर बोला करते हैं। मगर उनके ट्वीट पर दी जाने प्रतिक्रियाएं निश्चित तौर पर रोचक थीं। कांग्रेस समर्थकों के साथ-साथ बड़ी संख्या में पत्रकार भी राहुल गांधी से यह पूछ रहे थे कि आप कहां हो और उनसे जेएनयू जाने का आग्रह कर रहे थे। लेकिन राहुल गांधी तो ट्वीट करने के बाद हमेशा की तरह ही गायब हो चुके थे। हताश कांग्रेसियों को राहत तब मिली जब यह खबर आई कि प्रियंका गांधी हिंसा में घायल हुए लोगों से मिलने एम्स पहुंची हैं। ऐसा पहली बार नहीं हुआ जब राहुल गांधी के अचानक गायब हो जाने की भरपाई करने के लिए प्रियंका गांधी को सामने आना पड़ा। सीएए के विरोध की जब शुरुआत हुई थी, तब भी राहुल गांधी इसी तरह गायब थे और प्रियंका को इंडिया गेट पर एक दिन धरना देना पड़ा और फिर अगले दिन धरने पर बैठे छात्रों से मुलाकात करने का दायित्व संभालना पड़ा। हालांकि कांग्रेस से जुड़ा हर नेता निजी बातचीत में यही कह रहा है कि इस वर्ष के अंत तक पार्टी अध्यक्ष के तौर पर राहुल गांधी की वापसी हो जाएगी।

राजनीति में आने के बाद से प्रियंका गांधी लगातार उत्तर प्रदेश में सक्रिय हैं। अपनी रणनीति और सड़क पर उतरकर राजनीति करने के कारण लोगों के साथ-साथ कांग्रेसियों में भी एक उम्मीद की किरण नजर आने लगी है।

लेकिन पार्टी के कामों में उनकी जिस तरह से दिलचस्पी कम होती जा रही है, उसके मद्देनजर कांग्रेस का एक बड़ा तबका यह भी मानने लगा है कि राहुल गांधी की बजाय प्रियंका गांधी को अध्यक्ष पद संभाल लेना चाहिए। कहा जा रहा है कि कांग्रेस के ओल्ड गार्ड्स जो राहुल को पसंद नहीं करते उन सबने प्रियंका को अध्यक्ष बनाने की मुहिम शुरू भी कर दी है। प्रियंका ने उत्तर प्रदेश में वेंटिलेटर पर चली गई पार्टी को खड़ा करने के लिए लोकसभा चुनाव के बाद फिर से जोर लगाने का निर्णय ले लिया है। प्रदेश कांग्रेस में नई जान फूंकने के लिए प्रियंका अपने काफिले के साथ एक जिले से दूसरे जिले में दौड़ लगा रही हैं। पश्चिमी उत्तर प्रदेश में 20 दिसंबर, 2019 को नागरिकता संशोधन कानून के विरोध में प्रदर्शनों के दौरान हुए बवाल के बाद पुलिस एक्शन में हताहत हुए लोगों का कुशल-क्षेम लेने राजनीति के बाजीगरों में सबसे पहले प्रियंका गांधी ही मैंदान में उतरीं। उनका यह प्रयास निशाने पर लगा।

इसका सबसे बड़ा सबूत है बीएसपी प्रमुख मायावती का उन पर प्रहार। मायावती का ट्वीट कर प्रियंका पर हमला बोलना यह दर्शाता है कि कहीं न कहीं वे प्रियंका की गतिविधियों को लेकर असहज हैं। प्रियंका भीम आर्मी के चंद्रशेखर आजाद की रिहाई की मांग करने वाले प्रमुख नेताओं में शामिल थीं जो कि मायावती को भड़काने के लिए पर्याप्त था। और फिर रही-सही कसर प्रियंका ने बसपा के गढ़ माने जाने वाले बिजनौर के नहटौर इलाके में जाकर गोलीबारी में मारे गए एक शख्स के परिवार से मिलने की घटना ने पूरी कर दी। बसपा का पश्चिमी उत्तर प्रदेश में वोटों का गणित दलित-मुस्लिम गठजोड़ से बनता है, जबकि कभी यह गठजोड़ कांग्रेस की सियासी जमीन का आधार हुआ करता था। प्रियंका की कार्यशैली और मायावती की प्रतिक्रिया से एक बात तो साफ समझ में आती ही है कि कांग्रेस की उत्तर प्रदेश में दलितों और मुस्लिमों पर निगाह है। देखा जाए तो कांग्रेस को इस बात का अच्छी तरह से एहसास है कि प्रदेश में उसकी जो हालात है उसके लिए भाजपा से अधिक बसपा और सपा जिम्मेवार हैं।

इन दोनों ने ही कांग्रेस के परंपरागत मुस्लिम-दलित मतदाताओं को पार्टी से दूर किया था। इसलिए सबसे जरूरी उनसे अपने मतदाताओं को वापस छीनना है और प्रियंका इसी रणनीति के सहारे चल भी रही हैं। 28 दिसंबर को कांग्रेस के स्थापना दिवस के अवसर पर लखनऊ पहुंची प्रियंका ने बसपा और सपा पर निशाना साधते हुए भविष्य के संकेत भी दे दिए थे। प्रियंका के उत्तर प्रदेश दौरों पर उनके साथ जो चेहरे मौजूद रहा करते हैं उन्हें देख कर भी इस बात का अंदाजा लगाया जा सकता है कि कांग्रेस किसी जमाने के अपने परंपरागत मतदाताओं, मुसलमानों, दलितों और ब्राह्मणों को फिर से अपने पाले में लाने के लिए प्रयासरत हैं। शाहजहांपुर के विवादास्पद नेता इमरान मसूद प्रियंका की यात्राओं में लगातार ही उनके साथ नजर आते हैं। ये वही इमरान मसूद हैं जिन्हें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के खिलाफ ‘हेट स्पीच’ देने के लिए गिरμतार किया गया था और उसके बाद राहुल गांधी ने उनके समर्थन में आयोजित रैली को रद्द कर दिया था। लेकिन अपने जनेऊधारी भाई की तरह प्रियंका को उनसे कोई आपत्ति नहीं है और पिछले लोकसभा चुनावों में प्रियंका ने उनके समर्थन में रोड शो भी किया था। जाहिर तौर पर प्रियंका ने उस रणनीति पर चलने का निर्णय ले लिया है जिस पर चलकर 2009 में दिग्विजय सिंह ने कांग्रेस को प्रदेश की 22 सीटों पर सफलता दिलाने में प्रदेश प्रभारी के तौर पर अपनी भूमिका निभाई थी। प्रियंका के दौरों पर उनके साथ देखे जाने वालों में एक प्रमुख चेहरा आचार्य प्रमोद कृष्ण का भी है जिन्होंने लखनऊ से राजनाथ सिंह के खिलाफ चुनाव लड़ा था। पूर्व केंद्रीय मंत्री जितिन प्रसाद और पूर्व प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष प्रमोद तिवारी भी प्रियंका के साथ होते हैं। जाहिर तौर पर इन नेताओं की मौजूदगी भाजपा से कथित तौर पर नाराज ब्राह्मण मतदाताओं को फिर अपनी तरफ आकर्षित करने के प्रयास का हिस्सा है।

प्रदेश के 45 प्रतिशत अन्य पिछड़ा वर्ग मतदाताओं को आकर्षित करने की योजना के तहत ही अजय कुमार लल्लू को प्रदेश अध्यक्ष बनाया गया है। इन नेताओं के अलावा प्रियंका के मिशन यूपी के रणनीतिकार हैं 2005 में जेनएनयू में तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को काला झंडा दिखाने वाले आईसा के पूर्व सदस्य संदीप सिंह। लेकिन यह एक सच्चाई है कि राष्ट्रीय स्तर पर कांग्रेस की वापसी से भी कठिन है पार्टी का उत्तर प्रदेश में फिर से उठ खड़ा होना। 2007 के विधान सभा चुनावों में मिली 22 सीटें, 2012 में हासिल हुई 28 और 2017 के विधान सभा चुनावों में सपा के साथ के बावजूद कांग्रेस विधायकों की संख्या के 7 पर अटक गई है। दलितों के घर जाकर खाना खाने की राजनीति तो राहुल गांधी ने भी की थी, लेकिन दलितों को बसपा से दूर करना आसान नहीं है। उसी तरह इमरान मसूद जैसे लोग मुसलमानों के बीच मुलायम सिंह और आजम खान जैसी हैसियत में कभी भी नहीं पहुंच सकते।

हालांकि मुसलमानों को अखिलेश यादव की ‘आर्मचेयर पॉलिटिक्स’ ने लगातार ही निराश किया है। विशेषतौर पर सीएए के विरोध में हुई हिंसा के बाद। देखने वाली बात होगी कि प्रियंका गांधी विकल्पहीनता की स्थिति तक पहुंच चुके मुसलमानों को किस हद तक सपा और बसपा से दूर कर अपनी तरफ आकर्षित कर पाने में सफल होती हैं। और सच यही है कि इसी एक सवाल पर उत्तर प्रदेश में कांग्रेस की संपूर्ण रणनीति टिकी हुई है। 2022 के विधान सभा चुनाव के बाद सत्ता में वापस लौटने की बात तो फिलहाल दूर की कौड़ी है। लेकिन कुछ महीने तक खुद को अमेठी और रायबरेली तक सीमित रखने वाली प्रियंका गांधी वाड्रा ने कांग्रेस को प्रदेश की विपक्षी राजनीति के केंद्र में तो ला ही दिया है। वे न केवल सोशल मीडिया पर सक्रिय हैं, बल्कि सड़क पर भी नजर आ रही हैं। इसी कारण से कांग्रेसी नेताओं का एक बड़ा तबका जो राहुल गांधी से निराश है, प्रियंका गांधी में पार्टी का भविष्य देखने लगा है।


 
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