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दुष्कर्म पीड़िताओं को समय पर मिले न्याय

12/06/2019

प्रमोद भार्गव
देश में एकाएक दुष्कर्म व हत्या के मामले बढ़ गए हैं। इस बीच, जम्मू-कश्मीर के कठुआ में पिछले साल हुए सामूहिक दुष्कर्म और जघन्य हत्या के मामले में हुई कठोर सजा ने थोड़ी आस जगाई है। पठानकोट स्थित विशेष अदालत द्वारा दिए फैसले में तीन दोषियों को उम्रकैद और तीन को 5-5 साल की सजा सुनाई गई है। हालांकि आठ साल की बच्ची को बंधक बनाकर दुष्कर्म और फिर हत्या करने के दोषी फांसी की सजा के हकदार थे, किंतु उम्रकैद मिली। बेहद चर्चित रहे इस मामले की जांच की कुछ कमियां दूर हो गई होतीं तो फैसला 17 माह की बजाय और कम समय में आ सकता था। यह मामला जम्मू-कश्मीर में ही नहीं पूरे देश में हल्ला का कारण बना था, क्योंकि आरोपियों को बचाने के लिए पुलिस के कुछ आला अधिकारियों ने रिश्वत लेकर साक्ष्य नष्ट करने की गैरकानूनी हरकत की थी। यही वह समय है, जब अलीगढ़, उज्जैन, खरगोन और भोपाल में बच्चियों के साथ दुष्कर्म व हत्या के गंभीर मामले सामने आए हैं। अलीगढ़ में तो बच्ची की आंखों में एसिड डालने के साथ उसके हाथ भी काट दिए गए थे। हैवानों ने यह दुष्टता महज इसलिए की थी, क्योंकि उसके पिता उन पर कर्ज की वसूली के लिए दबाव बना रहे थे। भोपाल का मामला भी चर्चा में है। घटना के बाद पुलिस ने आरोपी विष्णु भमौरे को 48 घंटे के भीतर पकड़ लिया। अब मुख्यमंत्री कमलनाथ ने बयान दिया है कि दो दिन के भीतर मामले का चालान त्वरित न्यायालय में पेश कर आरोपित को कठोर सजा दिलाई जाएगी। इस दृष्टि से पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के कार्यकाल में इस प्रकृति के कई मामलों में दो माह के भीतर फांसी तक की सजा दिलाई गई है।    
दुष्कर्म मामलों में त्वरित न्याय का सिलसिला चल निकलने के बाद भी बलिकाओं से हैवानियत की घटनाएं लगातार सामने आ रही हैं। बीते साल अप्रैल में केंद्र सरकार ने एक अध्यादेश लाकर 12 साल से कम उम्र की बच्ची के साथ दुष्कर्म के दोषी को मौत की सजा और 16 साल से कम उम्र की किशोरी के साथ बलात्कार एवं हत्या के आरोपी को उम्रकैद की सजा का प्रावधान किया था। इसके अलावा बच्चों को यौन शोषण से बचाने के लिए दूसरे कई प्रावधान कर वर्तमान कानूनों को कड़ा किया गया था। ये सुधार पॉस्को एक्ट (प्रोटेक्शन आफ चिल्ड्रेन फ्राम सेक्सुअल अफेंसेस एक्ट 2012) के अंतर्गत किए गए थे। दरअसल नेशनल सेंटर फॉर मिसिंग एंड एक्सप्लायटेड की रिपोर्ट के अनुसार 2017 में नाबालिग बच्चों के साथ 24 लाख दुर्व्यवहार के मामले सामने आए थे। इनमें से 80 फीसदी 14 साल से कम उम्र की बलिकाएं शामिल थीं। पॉस्को कानून की धारा 9 के तहत किए गए प्रावधानों में शामिल था कि बच्चों को सेक्स के लिए परिपक्व बनाने के उद्देश्य से उन्हें यदि हार्मोन या कोई रसायनिक पदार्थ दिया जाता है तो इस पदार्थ को देने वाले और उसका भंडारण करने वाले भी अपराघ के दायरे में आएंगे। इसी तरह पोर्न सामग्री उपलब्ध कराने वाले को भी दोषी माना गया है। ऐसी सामग्री को न्यायालय में सबूत के रूप में भी पेश किया जा सकता है। दरअसल, इस तरह की चीजें बच्चों से बाल्यावस्था छीनने का कारण बनते हैं। इनसे प्रेरित होकर किसी स्त्री के साथ अनर्थ होता है तो उसका शरीर ही नहीं अत्मा भी छलनी होती है। बावजूद सवाल उठता है कि नारी को सुरक्षा और सम्मान दिलाने का वादा और दावा करने वाली सरकारें कानून का डर पैदा करने में क्यों असफल साबित हो रही हैं। विडंबना यह भी है कि इस तरह का कोई मामला मीडिया में उछलता है, तभी कारगर कार्रवाई संभव हो पाती है, अन्यथा मामले को रफा-दफा करने में पुलिस लग जाती है। कठुआ का मामला इसका प्रमाण है। पहले कानून से कहीं ज्यादा आदमी को धर्म और समाज का भय था। लेकिन इस भय को तार-तार करने का काम कुछ ऐसे कानूनों ने भी किया है, जिनके चलते रिश्तों की गरिमा लगभग खत्म हो गई है। इंसान के चरित्र का नैतिक पतन भी दुष्कर्म के मामलों को बढ़ाने का काम कर रहे हैं। ऐसे में पीड़िता एवं उसके अभिभावकों को समय पर न्याय नहीं मिलना भी अन्याय का दंश झेलने का कारण बना रहता है।      
देश में दुष्कर्म के सर्वाधिक मामलों के परिप्रेक्ष्य में अव्वल रहने वाला मध्यप्रदेश अब दुष्कर्म पीड़िताओं को त्वरित न्याय दिलाने के संदर्भ में आगे दिखाई दे रहा है। प्रदेश में पिछले साल दुष्कर्म के 14 मामलों में जिला न्यायालयों ने दुष्कर्मियों को फांसी की सजा सुनाई थी। मंदसौर में सजा के 57 दिन के भीतर 8 वर्षीया बच्ची के साथ हुए दुष्कर्म और हत्या के जघन्य मामले में 2 आरोपितों को फांसी की सजा दे दी गई थी। इस मामले में पुलिस ने घटना के 42वें दिन चालान पेश कर दिया और अदालत ने 15 दिन के भीतर सजा सुना दी। इस तरह के मामलों में देश के अन्य राज्यों में इतनी तेज कानूनी प्रक्रिया दिखाई नहीं दे रही है। गौरतलब है कि जब मध्यप्रदेश में घटना के तीन माह के भीतर 14 मामलों में दुष्कर्मियों को सजा सुनाई जा सकती है, तो अन्य राज्यों में ऐसा संभव क्यों नहीं हो पा रहा है। कटनी में तो इसी प्रकृति के मामले में 13 दिन के अंदर सभी कानूनी प्रक्रियाएं पूरी करके आठ दिन के भीतर चालान पेश कर दिया गया और अदालत ने लगातार पांच दिन सुनवाई करके पीड़िता को त्वरित न्याय दिलाकर इतिहास रचने का काम किया था। अब मुख्यमंत्री कमलनाथ ने भोपाल दुष्कर्म मामले में दो दिन के भीतर चालान पेश करके जल्द सजा दिलाने का वादा जनता से किया है। एनसीआरबी के जारी आंकड़ों के अनुसार 2017 में देश में 28,947 महिलाओं के साथ बलात्कार की घटनाएं हुईं, इनमें से 4882 को मध्यप्रदेश में अंजाम दिया गया। यही नहीं, नाबालिग बालिकाओं के साथ बलात्कार के मामले में भी मध्यप्रदेश अव्वल है। मध्यप्रदेश ही ऐसा पहला राज्य है, जहां नाबालिग के साथ दुष्कर्म में फांसी का कानून वजूद में लाया गया है। बावजूद देश की सर्वोच्च न्यायालय को कहना पड़ा है कि 'देश में राइट, लेफ्ट और चहुंओर दुष्कर्म की घटनाएं बढ़ रही हैं।' इतनी कठोर टिप्पणी अदालत को इसलिए करनी पड़ी है, क्योंकि पांच साल की बच्ची से लेकर 75 साल की वृद्धा तक दुष्कर्म के मामले रोजाना खबर बन रहे हैं। बावजूद यह अच्छी बात है कि शासन-प्रशासन और न्यायापालिका इस दृष्टि से सचेत हुए हैं कि बच्चियों के साथ हैवानियत किसी भी सूरत में बर्दाश्त नहीं की जाएगी। इससे डर का वातावरण बनेगा और भविष्य में खासकर बच्चियों के साथ दुष्कर्म के मामलों में कमी आएगी। यदि निचली अदालत से सुनाई गई फांसी की सजा पर अमल भी जल्दी होता है तो इन मामलों में अंकुश और तेजी से लगेगा। 2018 में रिकॉर्ड 58 दोषियों को दुष्कर्म व हत्या के मामलों में फांसी की सजा सुनाई गई है, लेकिन एक भी सजा पर अमल नहीं हो पाया है। यह मामले उच्च, उच्चतम न्यायालय और राष्ट्रपति के पास दया याचिका के बहाने लंबित हैं। साफ है, जिन पर न्याय दिलाने का दायित्व है, यदि वही महिला सम्मान से जुड़े जघन्य मामलों को टालने लग जाएं तो त्वरित न्याय की बात कैसे बने? इस बाबत न्यायिक व पुलिस कानून में सुधार की बात अरसे से उठ रही है, लेकिन हमारी सरकारों की प्राथमिकता में कानूनी सुधार की चिंता है ही नहीं। यदि फांसी की सजा में विलंब होता है तो कठोर कानून का कोई औचित्य रह ही नहीं जाता है। न ही निचली अदालत से त्वरित आए फैसले के कोई मायने रह जाते हैं?
(लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)


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