नवोत्थान

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जादुई नगरी काशी

02/07/2019

जादुई नगरी काशी



शालू शुक्ला



बनारस के एक के बाद एक घाटों को निहारना अच्छा लग रहा था। उसी दौरान राहुल
सांकृत्यायन की एक पंक्ति मेरे मन-मस्तिष्क में उतर आई। वह यह कि
अच्छा तर्क है कि पहले स्त्री के हाथ-पैर बांधकर रख दो, फिर
कहो कि इतिहास में तो साहसी यात्रिणियों का कहीं नाम ही नहीं आता।
खैर, अब बात दूसरी है। समय बहुत आगे निकल चुका है। बनारस की
यह मेरी पहली यात्रा थी। लोगों से यह सुना था कि बनारस कोई घूमने की जगह नहीं है,
बल्कि यह जीने की जगह है, बशर्ते उसकी कला मालूम हो। मैंने बनारसी ठाठ के कई
किस्से भी सुने थे, जिससे रू-ब-रू होने का अवसर इस यात्रा में मिला।



पूरी रात और दिन की यात्रा के बाद हमारी गाड़ी एक प्राचीन नगर में प्रवेश कर
रही थी और हमारा उत्साह चरम पर था। अस्सी घाट तक पहुंचते-पहुंचते सूरज अस्त हो
चुका था। यह भी जानकारी मिली कि गंगा आरती भी हो चुकी थी। लेकिन, लोगों का
आना-जाना लगा हुआ है। गंगा के तट पर मल्लाह अपने नावों को बांध रहे हैं। शायद अब
वे सुबह की तैयारी कर रहे हैं। अब भी कई दीप गंगा पर प्रज्वलित हो रहे थे। कई दीप
गंगा में तैर रहे थे, जिसकी रोशनी में गंगा की धारा का दिव्य रूप दिखाई दे रहा था।
अस्सी घाट पर हल्की-हल्की हवा चल रही थी और खोमचे वाले की आवाज रह-रहकर हवा में
गूंज रही थी। हर उम्र के लोग अपने साथी-संगियों के साथ वहां टहल रहे थे। मुझे इस
बात का अनुमान लगाने में देर नहीं लगी कि अस्सी घाट का यह वातावरण नगर की
दिन-चर्या का जरूरी हिस्सा है।   



स्थानीय लोगों से बातचीत के बाद यह जानकारी मिली कि अस्सी घाट पर देर-रात
चहल-पहल रहती है। यह नगर का एक ऐसा स्थान है, जो बड़े से बड़े दार्शनिकों और
विद्वानों को भी अपनी तरफ आकर्षित करता है और प्रेमी जोड़े को भी। यहां न कोई समय
की परवाह करता है। न समय किसी का इंतजार करता है। सभी अपनी गति से बेफिक्र होकर
चलते दिखाई देते हैं। लोग अपनी टोली में आते हैं। फिर लौट जाते हैं। एकबारगी देखने
में यह लगता है कि सभी अलग-अलग हैं, लेकिन भाव की एक ऐसी धारा यहां निरंतर
प्रवाहित होती रहती है, जो सभी को एक दूसरे से जोड़े रखती है। शायद इसलिए यह शहर
करीब-करीब मिक्स फ्रूट जूस जैसा है, जिसमें प्रत्येक फल के रस की अपनी भूमिका है।
वे सभी अलग भी हैं, और नहीं भी। यहां हर कोई एक जिम्मेदारी के साथ उठ-बैठ और
चल-बोल रहा है। इतनी संख्या में आवाजाही के बावजूद घाट की सफाई काबिलेगौर है। इन
घाटों को देखकर कोई भी यह स्वीकार करेगा कि स्वच्छ भारत अभियान बनारस में
जन-अभियान का स्वरूप ले चुका है। अच्छी बात यह है कि चाट-चाय-पानी-पान आदि बेचने
वालों में भी स्वच्छता को लेकर जागरूकता है। राजधानी दिल्ली के अखबारों में
स्वच्छता अभियान को लेकर तरह-तरह की व्यंग्यात्मक बातें होती हैं, लेकिन अस्सी घाट
पर अलग दृश्य दिखाई दे रहा है।



बहरहाल, रात हो चुकी थी। आसमान में तारे दिखाई दे रहे थे। राजधानी दिल्ली में
आसमान का अक्सर ऐसा दृश्य दिखाई नहीं देता है। लेकिन, बनारस की बात अलग है। घाट पर
ही कुछ लोग सोने की तैयारी कर रहे हैं। इनके लिए गंगा घाट कोई दूर का स्थान नहीं
है, बल्कि यह लोगों के घर-आंगन की तरह है। इन दृश्यों को मैं देख ही रही थी कि नजर
एक विदेशी बनारसी पर टिक गई। उस महिला को देखते ही यह शब्द मेरी जुबान पर आ गया। कारण
स्वाभाविक था। वह ठेठ बनारसी लिबास में थी। खादी की सुंदर साड़ी पहनी हुई थी,
जिसका रंग हल्का नीला था। घाट पर पूजा की सामग्री बेचने वाली महिला और उसकी नन्हीं
बच्ची विदेशी महिला से बड़ी आत्मीयता से मिली। उनके बीच पुराना गहरा परिचय है, उस
दृश्य को देखकर कोई भी यह समझ सकता था। जहां लोग एक-दूसरे की भाषा मुश्किल से
समझते हैं, वहां ऐसे रिश्ते बनारस में ही बन सकते हैं। उस शाम अस्सी घाट पर मैं कई
अनूठे पल की साक्षी रही, जो एक पल नजर आते थे और दूसरे ही पल ओझल हो जाते थे। बतौर
छाया-चित्रकार इस बात का अफसोस रहेगा कि उन पलों को कैमरे में कैद नहीं कर पाई।



यूं तो बनारस पहली नजर में आम शहर की तरह दिखाई देता है। लेकिन, हम इसकी
गलियों में जितना भीतर जाते हैं, वह अपनी विशेषताओं के साथ सामने आता जाता है। घाट
तक आते-आते यह बात मन में बैठ जाती है कि यह महज शहर नहीं है, बल्कि एक भाव है। एक
रस है।



अस्सी घाट से शिवाला की दूरी इतनी है कि पैदल आना-जाना किया जा सकता था। इस
रास्ते पर कई ऐसी चीजें हैं जो हमारा ध्यान अपनी तरफ खींच रही हैं। बनारस की
पुरानी हवेलियां, अत्याधुनिक कैफे, होटल, गेस्ट हाउस, जर्जर होते मकान। इन दृश्यों
को देखकर किसी निष्कर्ष तक पहुंचना कठिन है। हां, यह बात समझी जा सकती है कि बनारस
अपने पुरानेपन को छोड़कर आधुनिक होना चाहता है, लेकिन पुराने के प्रति अपने मोह को
वह छोड़ नहीं पा रहा है। सड़कों की साफ-सफाई अच्छी है। लैम्प पोस्ट की दूधिया
रोशनी में पुराने और नए मकान अपनी तरफ हमारा ध्यान खींच रहे हैं। पुरानी हवेलियों
का नवीनीकरण कर उसे हॉटल और गेस्ट हाउस का स्वरूप दे दिया गया है। अस्सी घाट से
लेकर शिवाला तक ऐसी कई हवेलियों ने हमारा ध्यान खींचा। स्थानीय बुनकर अच्छी स्थिति
में नहीं हैं। बनारसी साड़ी का कारोबार कम हो गया है। वहीं फैबइंडिया का शोरूम एक
बड़ी हवेली में चल रहा है। ऐसे कई विरोधाभासी दृश्य भी यहां दिखाई देते हैं। 



वहीं मेरी नजर श्री तुलसी पुस्तकालय पर गई। वहां लिखे के अनुसार पुस्तकालय की स्थापना सन् 1928
में की गई थी। आश्चर्य की बात यह है कि वहां खड़े लोगों ने बताया,
यह पुस्तकालय नहीं है। कभी रहा होगा तो अलग बात है।महज एक किलोमीटर के दायरे में ऐसे कई चीजें
दिखीं, जिसमें रहस्य दबा है। यह तो ध्यान ही होगा कि स्वामी तुलसीदास ने बनारस के
घाट पर रहकर ही रामचरितमानस की रचना संपन्न की थी। उनका बनारस से गहरा संबंध रहा
था। यहां उनके नाम का घाट है। भगवान हनुमान का एक मंदिर है, जहां लिखा है- इस
मंदिर की स्थापना स्वामी तुलसीदास ने की है। दुर्भाग्य ही है कि वे स्थल हमारे लिए
धरोहर नहीं बन पाए हैं। वे उपेक्षित दिखाई देते हैं।



यहां लोग तसल्ली बख्श बातचीत करते हैं। उन्हें किसी बात की जल्दी नहीं है।
अच्छा भोजन कहां मिलेगा
? इस सवाल पर लोग
आपस में बहस करने लगे। जब वे लोग किसी निष्कर्ष तक नहीं पहुंचे तो मुझे आगे बढ़ना
पड़ा। मैंने पप्पू चाय की दूकान का काफी नाम सुन रखा था। पप्पू की चाय का स्वाद
थोड़ा अलग है। यह दूकान बहस की खुली छूट देता है। दुकानदार को भी कोई जल्दी नहीं
है। कुल मिलाकर शहर की अपनी गति है, जहां किसी को कोई जल्दबाजी नहीं है। हालांकि,
लाली बाबा जरूर थोड़े जल्दी में दिखाई दिए। रामनवमी का व्रत था और वे पूजा-पाठ की
तैयारी में जुटे थे। अपनी व्यस्तताओं के बीच उन्होंने बनारस की व्याख्या की। वे
बोले कि
बनारस का अर्थ है- बना हुआ रस।अपनी प्राचीनता के बीच बनारस जिस तरह आधुनिक
होता दिखाई दे रहा है, उसकी झलक लाली बाबा के साथ-साथ उनके आश्रम पर भी है। वे
तकनीकी रूप से दक्ष हैं। कई विदेशी भाषाओं के जानकार हैं। आश्रम के ठीक सामने श्री
विद्यामठ है, जहां वेद और ज्योतिष शास्त्र की शिक्षा प्राप्त करने के लिए देश भर
से विद्यार्थी आते हैं। विद्यामठ का संचालन शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद के
नेतृत्व में उनके शिष्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद करते हैं। बनारस में ऐसे कई
गुरुकुल हैं, जहां देश-विदेश से विद्यार्थी वेदों की शिक्षा प्राप्त करने आते हैं।



बनारस में सभी घाटों का अपना महत्व है। उससे जुड़ी एक कथा है, जो उसके
माहात्मय को स्थापित करती है। उनमें दशाश्वमेध घाट भी एक है। कहते हैं कि
चौथी-पांचवीं शताब्दी में गुप्त-सम्राटों के समय यहां एक बार फिर शैव-धर्म का
प्रभाव बढ़ गया था। उसी दौरान कंधे पर शिवलिंग धारण करने वाले भारशिवों का उदय
हुआ। उन्हीं भारशिव भक्तों ने दस अश्वमेध यज्ञ करके जहां स्नान किया, उसी घाट का
नाम दशाश्वमेध पड़ा। आरती के समय दशाश्वमेध घाट पर श्रद्धालुओं की भारी भीड़ा
एकत्र हो जाती है। शिवाला से दशाश्वमेध घाट की यात्रा हमलोगों ने रिक्शे से पूरी
की। भीड़-भाड़ के बावजूद रिक्शा अपनी गति से चल रहा था। मानो उससे बचने की
जिम्मेदारी दूसरों पर हो। इस यात्रा के दौरान हम समझ पाए कि किसी शहर को समझना हो
तो पैदल चलना सर्वाधिक उपयुक्त तरीका है। खैर, दशाश्वमेध घाट पर पहुंचते ही मेरी
नजर काशी संग्रहालय पर गई। घाट से लगे मान महल में एक वर्चुअल म्यूजियम है, जो
काशी की संस्कृति, उसके धार्मिक महत्व से पर्यटक का परिचय कराता है। भारतीय
पुरातत्व विभाग इसकी निगरानी करता है। कहते हैं कि आमेर के राजा मान सिंह ने 1600
ईस्वी में यहां आकर इस महल की नींव रखी थी। लाल पत्थर से बने इस महल के ठीक ऊपर
सफेद संगमरमर से बना एक हिस्सा राजस्थानी वस्तुकला के श्रेष्ठ उदाहरण है। यहां से
दशाश्वमेध घाट के साथ-साथ बनारस का विहंगम दृश्य दिखाई देता है।



म्यूजियम आकर काशी के बारे में एक मोटी जानकारी मिली। उससे यह निष्कर्ष निकाला
कि शहर एक अलग रंग-ढंग का है। उसी में शहर का प्रताप भी है। आखिर हम बदल क्यों रहे
हैं
? इन्हीं सवालों का जवाब ढूंढ़ते हुए हमलोग नाव
की यात्रा पर निकल चुके थे। केवट ने अपने अंदाज में काशी के घाटों से हमारा परिचय
कराया। उसने यह खुशी जाहिर की कि
मोदी सरकार ने
घाटों के सौंदर्यकरण का ध्यान रखा है। इससे पर्यटकों की संख्या बढ़ी है और हमारा
रोजगार पहले से बेहतर हुआ है।
यहां केवट समाज
की बड़ी आबादी है। एक समय वे रोजगार के लिए मोहताज हो गए थे। अब स्थिति बदल गई है
और उन्हें रोजगार मिलने लगा है। घाट पर गंगा आरती का दिव्य रूप शाम के सात
बजते-बजते प्रकट हो जाती है। उसे देखने वालों की भीड़ श्रद्धा भाव में डूबी रहती
है। आरती संपन्न होने के बाद लोग एक स्वर में बाबा विश्वनाथ का जय-घोष करते हैं। पूरी
बात यह है कि मुझे बनारस एक जादुई नगरी लगी, जिसका प्रभाव सब पर है। धर्म से परे
बाबा विश्वनाथ सब के हैं, जिनमें लोगों की गहरी श्रद्धा है।  



वहीं सुबहे-बनारस का सांस्कृतिक महत्व है। बनारस के सबल सांस्कृतिक पक्ष के एक
रंग को देखना हो तो अस्सी घाट पर सुबहे-बनारस को देखना चाहिए। अस्सी घाट वही है,
जहां पिछली शाम आए थे। सुबह-सबेरे घाट ने नया रंग ले लिया है और यहां का वतावरण नई
स्फूर्ति पैदा कर रहा है। सूरज अस्सी घाट पर धीरे-धीरे चढ़ने लगा है और लोग अपनी
दिनचर्या की तैयारी में जुट गए हैं। चाय की चुस्कियों के साथ बहस का दौर चल पड़ा है
और एक नए दिन की शुरुआत हो गई है।


 
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