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कोरोनाः आतंकवाद से ज्यादा गंभीर

14/02/2020

योगेश कुमार गोयल

चीन सहित पूरी दुनिया में खौफ का पर्याय बने नोवेल कोरोना वायरस को लेकर कुछ दिनों पूर्व विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) द्वारा वैश्विक स्वास्थ्य आपातकाल घोषित कर दिया गया था। अब उसने इसे आतंकवाद से भी गंभीर बताते हुए बीते 11 फरवरी को कोरोना वायरस का नया आधिकारिक नामकरण भी कर दिया है। दरअसल, चीन के वुहान शहर से शुरू हुआ कोरोना का आतंक अब दुनिया के 31 देशों तक पहुंच चुका है। 30 दिसम्बर को चीन में कोरोना वायरस के अस्तित्व की जानकारी मिलने के बाद विश्व स्वास्थ्य संगठन ने इस वायरस को ‘2019-एनसीओवी एक्यूट रेस्पाइटरी डिजीज’ नामक तात्कलिक नाम दिया था और अब डब्ल्यूएचओ द्वारा ‘नोवेल कोरोना’ को ‘कोविड-19’ (सीओवीआईडी-19) नाम दिया गया है।

कोरोना के वैश्विक खौफ को इसी से समझा जा सकता है कि 1 फरवरी को हांगकांग से रवाना हुआ नीदरलैंड का एक पोत ‘एमएस वेस्टरडम’ 2257 लोगों को लेकर दो सप्ताह से समुद्र में भटकने को विवश है क्योंकि जापान, अमेरिका, फिलीपींस, थाईलैंड इत्यादि देशों द्वारा पोत में सवार लोगों में कोरोना संक्रमण को लेकर उपजे भय के चलते इस पोत को अपने तटों से लौटाया जा चुका है। हालांकि पोत की ओर से ऐलान किया गया था कि उसमें सवार कोई भी व्यक्ति कोरोना से संक्रमित नहीं है लेकिन कोई भी देश इस दावे को मानने को तैयार नहीं है। हाल ही में 3711 लोगों के साथ जापान के समुद्र तट पर कोरोना वायरस का कहर झेल रहे पोत ‘डायमंड प्रिंसेस’ में सवार 138 भारतीयों ने भी प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी से उन्हें सुरक्षित पोत से निकालने को लेकर मार्मिक अपील की है। दरअसल इस पोत में 439 लोगों के किए गए परीक्षण में 174 लोगों के कोरोना संक्रमित पाए जाने के बाद पोत को जापान के समुद्र तट पर ही रोक दिया गया है।

चीन सरकार के आंकड़ों के मुताबिक अबतक डेढ़ हजार से भी अधिक लोगों की कोरोना के कारण जान जा चुकी है जबकि 50 हजार से अधिक लोगों में इसके संक्रमण की पुष्टि हुई है। हालांकि दुनिया भर में बहुत से लोगों का मानना है कि चीन में कोरोना से हुई मौतों और संक्रमण का वास्तविक आंकड़ा चीन सरकार के आंकड़ों से कई गुना ज्यादा है। चीन के सरकारी आंकड़ों की ही बात करें तो उसके अनुसार भी कोरोना से हुई मौतों का आंकड़ा 2003 में कहर बनकर बरपे सार्स को भी काफी पीछे छोड़ चुका है। कोरोना वायरस के प्रकोप के चलते दुनिया भर में निवेशकों की चिंता बढ़ी है। इसके खौफ के चलते चीन के साथ वैश्विक अर्थव्यवस्था को भी बहुत बड़ा नुकसान हो रहा है, जिसका असर लंबे समय तक रहेगा।

भारत में अबतक कोरोना संक्रमण के केरल में कुल तीन मामले सामने आए हैं। 13 फरवरी को बैंकाक से कोलकाता लौटे तीन लोगों के भी कोरोना संक्रमित होने की आशंका जताई गई है। इसके अलावा देशभर में करीब 16 हजार व्यक्ति कोरोना के खतरे के मद्देनजर निगरानी में हैं। केरल में बीते दिनों तीन व्यक्तियों के संक्रमित पाए जाने के पश्चात दिए गए उपचार के बाद उनमें से दो के नेगेटिव साबित होने पर एक व्यक्ति को डिस्चार्ज किया जा चुका है। केन्द्रीय स्वास्थ्य मंत्री डा. हर्षवर्धन के अनुसार अन्य दोनों लोगों को भी अगले कुछ दिनों में डिस्चार्ज किया जा सकता है। स्पष्ट है कि भारत में जहां कोरोना के खतरे को फिलहाल सफलतापूर्वक नियंत्रित कर लिया गया है, वहीं चीन से शुरू हुआ कोरोना कैसे महामारी बनकर उभर रहा है, इसके पीछे चीन सरकार की फितरत को जानना जरूरी है।

दरअसल, चीन पर बरसों से आरोप लगते रहे हैं कि सूचनाओं को दुनिया की नजरों से दबाना उसकी फितरत है और उसकी इसी फितरत के कारण ही कोरोना का यह खौफनाक रूप दुनिया के सामने आया है। चीन में अध्ययन करने वाले कौंसिल ऑन फॉरेन रिलेशन में फैलो यानझोंग हुआंग के मुताबिक वुहान के स्थानीय स्वास्थ्य विभाग द्वारा शुरूआती कुछ हफ्तों में इस खतरे के प्रति लोगों को सावधान करने के लिए किसी तरह की कार्यवाही नहीं की गई। अधिकारियों ने लोगों को इस बीमारी के खतरों से अनजान रखा, जिसके कारण लोग संक्रमण से अपना बचाव नहीं कर सके। विशेषज्ञों का कहना है कि चीन सरकार द्वारा कोरोना संक्रमण के प्रति लोगों को आक्रामक तरीके से सावधान नहीं करने के चलते इसे महामारी में बदलने से रोकने का एक बड़ा अवसर गंवा दिया गया, जिसका खामियाजा अब हजारों लोग भुगत रहे हैं। दरअसल एक ओर जहां कोरोना वायरस तेजी से फैलता जा रहा था, वहीं अधिकारी बार-बार एक ही राग अलाप रहे थे कि इस वायरस के फैलने की आशंका कम है।

गत वर्ष दिसम्बर में वुहान मेडिकल कॉलेज में जब डॉक्टरों को सात मरीज रहस्यमय बीमारी से पीड़ित मिले, तब उनका इलाज कर रहे 34 वर्षीय डा. ली वेनलियांग ने अपने सहयोगी चिकित्सकों को सतर्क करते हुए उन मरीजों को तुरंत आपातकालीन विभाग के आइसोलेशन वार्ड में रखने की हिदायत दी थी। लोगों के सामने कोरोना का मामला सार्वजनिक रूप से तब सामने आया था, जब 30 दिसम्बर को एक व्यक्ति ने ऑनलाइन चैट में वायरस संक्रमण को अत्यधिक भयावह बताते हुए डॉ. वेनलियांग से जानना चाहा था कि क्या वुहान में सार्स नामक खतरनाक बीमारी की वापसी हो रही है? उल्लेखनीय है कि उस दौरान सार्स के कहर से 774 लोगों की मौत हुई थी। जैसे ही वुहान के स्वास्थ्य विभाग के अधिकारियों को डॉ. वेनलियांग के इस चैट की भनक लगी, जिसमें उन्होंने इस संक्रमण को सार्स जैसा ही खतरनाक माना था, उन्हें तुरंत हिरासत में लेते हुए उनसे पूछा गया कि उन्होंने इस सूचना को सार्वजनिक रूप से शेयर क्यों किया? तीन जनवरी को वहां की पुलिस ने डॉ. वेनलियांग से जबरन यह लिखवा लिया कि उनकी चेतावनी गैरकानूनी व्यवहार के दायरे में आती है। अगर डॉ. वेनलियांग पर शिकंजा कसने और कोरोना संक्रमण के मामलों को दुनिया की नजरों से छिपाने के बजाय चीन सरकार उसी समय कोरोना से निपटने के लिए व्यापक प्रबंध करती तो संभवतः कोरोना का इतना व्यापक और घातक असर देखने को नहीं मिलता।

चीन में कोरोना वायरस की सबसे पहले चेतावनी देने वाले डॉ. ली वेनलियांग की भी पिछले दिनों वुहान में कोरोना वायरस की चपेट में आने के बाद मौत हो चुकी है, जिसके बाद से वहां के नागरिक सोशल मीडिया पर वेनलियांग को नायक करार देते हुए अपनी सरकार के प्रति खुलकर नाराजगी जाहिर कर रहे हैं। हालांकि कम्युनिस्ट शासन वाले चीन में सरकार के प्रति ऐसा विरोध प्रायः बहुत कम देखने को मिलता है और यही कारण है कि वहां की सरकार को अब डॉ. वेनलियांग की मौत के मामले की जांच का आदेश देने पर विवश होना पड़ा। स्पष्ट है कि कोरोना वायरस के पहले मामले के सामने आने और वुहान शहर को सील करने के बीच वुहान प्रशासन द्वारा करीब सात हफ्ते का समय बर्बाद कर दिया गया। यही सबसे बड़ा कारण रहा कि कोरोना का आतंक चीन में इस कदर फैल गया, जिसके बारे में दावे के साथ कोई यह बताने की स्थिति में नहीं है कि इससे चीन को कबतक मुक्ति मिलेगी?

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं।)


 
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