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शिक्षा : मातृभाषा को मिले प्राथमिकता

10/07/2019

शिक्षा : मातृभाषा को मिले प्राथमिकता


केंद्र सरकार ने सबके विचारार्थ नई शिक्षा नीति का प्रारूप जारी किया है। उस पर लोगों से 30 जून तक सुझाव मंगाये हैं। हमने पहले एक मांग की थी कि विद्यालयी शिक्षा को 10+2 की बजाय 8+4 करके मातृभाषा में पढ़ने वाले छात्रों को मानसिक उत्पीड़न से बचाया जाना चाहिए। मैं कस्तूरीरंगन समिति और भारत सरकार को हृदय से धन्यवाद देता हूं, क्योंकि इस घोषित प्रारूप में जो विद्यालयी शिक्षा (स्कूल एजुकेशन) का 5+3+3+4 का खाका दिया है, उसमें हमारी सदिच्छा पूरी हो रही है। इस 5+3+3+4 में 5 मतलब पहली से पूर्व के 3 वर्ष और पहली व दूसरी कक्षा, 3 मतलब तीसरी से पांचवीं कक्षा, दूसरा 3 मतलब छठी से आठवीं और आखिरी 4 मतलब 9वीं से 12वीं कक्षा हैे। अगर इसे इसी रूप में लागू किया जाता है तो वे लाखों-करोड़ों विद्यार्थी मानसिक उत्पीड़न से बचेंगे, जिन्हें 10 वीं कक्षा तक मातृभाषा में पढ़ने के बाद अचानक अंग्रेजी माध्यम में जाना पड़ता है और दो ही वर्ष में उनके भविष्य के लिए निर्णायक बोर्ड परीक्षा में बैठना पड़ जाता है। अब समिति द्वारा सुझाये गए उपरोक्त ढांचे को स्वीकारने का सरकार से अनुरोध है।

विज्ञान और तकनीकी में भारत से बहुत आगे पहुंचे चीन, जापान, कोरिया जैसे देशों की भाषा हमारी भाषाओं से बहुत कठिन हैं, पर वहां सारी शिक्षा उनकी भाषाओं में ही होती है।

साथ ही ‘शिक्षा का भारतीयकरण’ हो, इस दृष्टि से कई सुझाव भी हो सकते हैं। इन सुझावों में पहला यह है कि भारत और भारतीय संस्कृति का जिस भाषा से संबंध है और जिसमें उसकी अभिव्यक्ति हुई है और सैकड़ों नहीं हजारों वर्षों से जिस भाषा ने भारत को एक राष्ट्र के रूप में संपोषित किया है, वह है संस्कृत भाषा! इसीलिए महात्मा गांधी चाहते थे कि हर सनातन धर्मी को संस्कृत अवश्य आनी चाहिए। साथ ही वे कहते थे कि अन्य धर्मावलंबियों जैसे मुस्लिमों को भी संस्कृत अवश्य पढ़नी चाहिए, क्योंकि उसे पढ़े बिना वे अपने पूर्वजों के बारे में ज्ञान प्राप्त नहीं कर सकते हैं। संविधान बनाते समय डॉ. आंबेडकर चाहते थे कि संस्कृत को भारत की राष्ट्रभाषा बनाया जाए, जो उसकी स्वाभाविक हकदार है। पर उस समय चूक गये। इसलिए नई शिक्षा नीति में संस्कृत को समुचित स्थान देने का अनुरोध है। हमारा सुझाव है कि किसी भी भाषा माध्यम के 5+3+3+4 वाले स्कूली ढांचे में 3+3 कक्षाओं में संस्कृत भाषा को अनिवार्य विषय बनाया जाए। भारत की अस्मिता, भारत की संस्कृति और भारतीय राष्ट्रभाव को संपोषित करने के लिए संस्कृत को अनिवार्य भाषा बनाने से उत्तम कोई उपाय नहीं हो सकता है।

दूसरा महत्वपूर्ण मुद्दा यह है कि शिक्षा का माध्यम मातृभाषा हो, इस विषय में सभी शिक्षाशास्त्री सहमत हैं। राज्य पर कब्जा जमाए अभिजात्य वर्ग ने उसे भारत में लागू नहीं होने दिया। इसलिए महात्मा गांधी की सदिच्छा के बावजूद भारत पर अंग्रेजी का वर्चस्व बना रह गया। वैसे तो हमारा आग्रह है कि संपूर्ण शिक्षा का माध्यम मातृभाषाएं बनाई जानी चाहिए। अगर इसमें व्यावहारिक कठिनाई हो तो नई शिक्षा नीति में प्रस्तावित प्रथम 5 वर्ष का शिक्षा माध्यम मातृभाषाओं को बनाने की मांग केंद्र सरकार से है। मतलब ‘सर्वनाशे समुत्पन्ने अर्धम रक्षति पण्डित:!’ प्रस्तावित ढांचे में पहले 5 वर्ष अर्थात आज की दूसरी कक्षा तक की शिक्षा को मातृभाषा में करने का न्यूनतम प्रतिरोध होने की संभावना है, जिसे सरकार चतुराई से पार पा सकती है। पहले 5 वर्ष मातृभाषा में पढ़ाई करने से बालकों के मष्तिष्क स्वाभाविक गति से विकसित हो पायंगे और बाद में अन्य भाषाओं और अन्य विषयों को आत्मसात करने में वे सक्षम हो जाएंगे। तीसरी गौरतलब बात है कि अंग्रेजों ने भारत में क्लर्क पैदा करने के लिए ऐसी शिक्षा व्यवस्था को थोपा जिससे औसत दर्जे की प्रतिभा ही विकसित हो।

हमारी मांग है कि 33 या 35 % वाली व्यवस्था को बदलकर 50% से अधिक गुण (मार्क्स) आने पर पास होने की व्यवस्था बनाई जाए। इसके लिए परीक्षा पद्धति बदली जा सकती है। इस बदलाव से भी विद्यार्थियों की मानसिकता में बहुत ही सकारात्मक परिणाम आएंगे। ये तीन सुझाव बहुत सरल दिखते हैं, पर वे भारत के हितों को दूर तक प्रभावित करने में सक्षम हैें। इसलिए इन पर गंभीरता से विचार आवश्यक है।


 
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