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यह अराजकता है, लोकतंत्र नहीं

20/03/2020

यह अराजकता है, लोकतंत्र नहीं

बनवारी

नागरिकता संशोधन कानून को बने ढाई महीने से अधिक हो गए। लेकिन उसकी आड़ में देश में नकारात्मक राजनीति, धरना-प्रदर्शन और हिंसक घटनाओं का जो दौर शुरू हुआ था, वह थमने का नाम नहीं ले रहा। इस कानून के बारे में पैदा हुई कुछ गलतफहमियों के कारण उसका विरोध असम और उत्तर-पूर्व के अन्य राज्यों में शुरू हुआ था। वह तो जल्दी ही शांत हो गया, लेकिन इस कानून को संवैधानिक मुद्दा बनाकर उसका जो विरोध कांग्रेस और मार्क्सवादियों ने शुरू किया था, वह बढ़कर अब एक हिंसक आंदोलन का रूप ले चुका है। कांग्रेस और मार्क्सवादी नेता मुस्लिम समुदाय में असुरक्षा की भावना पैदा करके पृष्ठभूमि में चले गए हैं। पृष्ठभूमि में रहकर वे आग में घी डालने का काम करते रहते हैं। इस कानून के विरोध के बहाने वे अपनी नकारात्मक राजनीति कर रहे हैं। इसे एक राजनैतिक मुद्दा बनाए रखने के लिए मार्क्सवादियों और कांग्रेस ने अपने द्वारा शासित सभी राज्यों की विधानसभाओं में इस कानून का विरोध करते हुए प्रस्ताव पारित करवाए। कांग्रेस के भीतर से ही कुछ वकीलों की यह दलील अनसुनी कर दी गई कि यह एक केंद्रीय कानून है।

देशभर में कांग्रेस और मार्क्सवादियों का समर्थक वर्ग सीएए के खिलाफ माहौल बनाने और मुस्लिम समुदाय में हताशा पैदा करने में लगा रहा है।

राज्य सरकारें उसे मानने से इनकार नहीं कर सकतीं। इस कानून को लागू करना उनके दायरे में भी नहीं है। इसलिए राज्य विधानसभाओं में संसद के दोनों सदनों द्वारा पारित किसी कानून का विरोध करने से गलत परंपरा पड़ती है। इस कानून का विरोध बहुत सुनियोजित तरीके से शुरू हुआ था। कांग्रेस और मार्क्सवादी नेताओं के बयानों के बाद जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय और जाधवपुर विश्वविद्यालय जैसे वामपंथियों के गढ़ तथा जामिया मिलिया और अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी जैसे मुस्लिम सांप्रदायिकता के गढ़ से यह आंदोलन शुरू हुआ। इन सभी जगहों पर आंदोलन ने हिंसक रूप लिया। जब उपद्रवियों के खिलाफ पुलिस कार्रवाई हुई तो उसे लेकर तूफान खड़ा करने की कोशिश की गई। देश के कई हिस्सों में मुस्लिम सांप्रदायिकता को भड़काने की कोशिश की गई। विशेष रूप से उत्तर प्रदेश में बड़े नियोजित तरीके से हिंसा और आगजनी की घटनाएं हुईं। उत्तर प्रदेश की पुलिस ने विरोध-प्रदर्शन के समय अवश्य संयम बरता। लेकिन हिंसा और आगजनी में शामिल तत्वों की पहचान की गई। उन्हें गिरμतार किया गया और अदालतों के पुराने निर्देश पर अमल करते हुए उन्हें सार्वजनिक संपत्ति को हुए नुकसान की भरपाई के नोटिस जारी हुए।

कई जगह मुस्लिम समुदाय के गणमान्य लोगों ने आगे आकर वह राशि जमा करवाई ताकि यह अनावश्यक और अनुचित आंदोलन तूल न पकड़े। आंदोलन भड़काने में लगे लोगों ने हिंसा से बात बनती न देख दिल्ली के शाहीन बाग में बच्चों और महिलाओं को बीच सड़क धरने पर बैठाकर इस आंदोलन को एक नया स्वरूप दे दिया। कानून बनने के तीन दिन बाद ही शाहीन बाग का यह धरना शुरू हो गया था। लोगों को जिस तरह भड़काया गया था, उसकी झलक छोटे-छोटे बच्चों के नारों में देखी जा सकती थी। वे जहर उगलते हुए प्रधानमंत्री को जान से मारने की बातें कह रहे थे। इस धरने को शुरू हुए ढाई महीने हो चुके हैं। सड़क बंद होने के कारण लोगों को हो रही भारी परेशानी को देखते हुए यह मामला सर्वोच्च न्यायालय में ले जाया गया है। पर इस बीच दिल्ली में भड़की हिंसा के कारण सर्वोच्च न्यायालय ने सुनवाई टाल दी है। यह आंदोलन न सामान्य है न स्वत: स्फूर्त। वह कितना सुनियोजित है, इसका सबसे बड़ा प्रमाण अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प की भारत यात्रा के समय दिल्ली में फैलाई गई हिंसा है। अमेरिकी राष्ट्रपति का ध्यान खींचकर भारत को पूरी दुनिया में बदनाम करने के लिए शाहीन बाग की ही तर्ज पर दिल्ली में और कई जगह महिलाओं और बच्चों को धरने पर बैठाया गया। परिवहन व्यवस्था को ठप करने की कोशिश की गई।

शाहीन बाग में रास्ता रुकने के कारण लंबे समय से लोग पीड़ित-आहत थे। इसलिए इन नए धरनों की तीव्र प्रतिक्रिया हुई। भाजपा नेता कपिल मिश्रा ने कानून के समर्थन में रैली आयोजित करते हुए पुलिस को तीन दिन के भीतर रास्ता खुलवाने का अल्टीमेटम दिया। अब तक जो वर्ग शाहीन बाग को शांतिपूर्ण और लोकतांत्रिक विरोध का नमूना बताकर इस कानून को और उसे लाने वाली मोदी सरकार को कठघरे में खड़ा कर रहे थे, उन्हें कपिल मिश्र को खलनायक बताने का मौका मिल गया। आसपास की बस्तियों के अल्पसंख्यक और बहुसंख्यक दोनों समुदायों को भड़काना शुरू हुआ। हिंसा फैलाने में बाहर से आए लोगों की भी भूमिका थी। पुलिस पर पथराव से लेकर गोली चलाने तक सब तरीके इस्तेमाल हुए। दिल्ली के कई इलाकों में फैली इस व्यापक हिंसा में हेड कांस्टेबल रतन लाल सहित 41 से अधिक लोगों की जान जा चुकी है। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प की दिल्ली में उपस्थिति के कारण पुलिस और प्रशासन किंकर्तव्यविमूढ़ बना हुआ था। अन्तत: गृहमंत्री को दंगाइयों से निपटने के आदेश देने पड़े। दंगाग्रस्त क्षेत्रों में अर्द्धसैनिक बल तैनात किए गए। दिल्ली के मुख्यमंत्री केजरीवाल ने सेना तैनात करने तक की मांग कर डाली। कांग्रेस शांति बहाली में सहयोग देने की बजाय राष्ट्रपति भवन तक मार्च करने और गृहमंत्री का इस्तीफा मांगने में व्यस्त हो गई।

इस विरोध प्रदर्शन ने हमारे लोकतंत्र का एक अत्यंत नकारात्मक पक्ष उजागर कर दिया है। यह सारा विरोध-प्रदर्शन उस कानून को लेकर हो रहा है, जिसके बारे में उसे बनाए जाने से पहले लगभग सर्वानुमति थी। पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान से धार्मिक उत्पीड़न का शिकार होकर आए हिन्दू, जैन, बौद्ध, सिख, पारसी और ईसाई समुदाय के लोगों को भारतीय नागरिकता देने के लिए हम वचनबद्ध रहे हैं। देश के विभाजन के समय ही इस बात की आशंका से महात्मा गांधी से लेकर जवाहर लाल नेहरू तक सबने इन समुदाय के लोगों को यह वचन दिया था। उस समय भी आश्वासन में मुस्लिम समुदाय का उल्लेख नहीं किया गया। क्योंकि देश का विभाजन मुस्लिम लीग द्वारा मुसलमानों के लिए अलग राज्य बनाने की मांग के आधार पर हुआ था। इसके अलावा इन सभी देशों ने अपने आपको इस्लामी राष्ट्र घोषित कर दिया। अब तक लगातार उत्पीड़ित होकर भारत आए इन समुदायों के पक्ष में आवाज उठाई जाती रही थी। केवल भाजपा के लोग ही उनके पक्ष में आवाज नहीं उठा रहे थे, मार्क्सवादी और कांग्रेस के नेता भी उठा रहे थे, स्वयं मनमोहन सिंह ने राज्यसभा में इसकी मांग की थी। मोदी सरकार ने यह कानून बना दिया तो उसमें इन सब दलों और नेताओं को सांप्रदायिकता नजर आने लगी। मोदी सरकार के पास उत्पीड़ित समुदायों की श्रेणी में इन तीनों देशों के मुस्लिम समुदाय को शामिल न करने का एक और महत्वपूर्ण कारण है। पाकिस्तान कश्मीर के बहाने भारत के खिलाफ जेहाद छेड़े हुए है।

सेक्यूलरिज्म के नाम पर बना हुआ यह पूर्वाग्रह एक वायरस की तरह है, जो हमारे बुद्धिजीवियोंसाहित् यकारों, अध्यापकों, मनोरंजन उद्योग के कलाकारों के अच्छे खासे वर्ग के सोच में संक्रमण कर गया है।

जेहाद के नाम पर इन सभी देशों से आतंकवादी भारत में घुसपैठ की कोशिश करते रहे हैं। इस कानून में पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान के मुस्लिम समुदाय को शामिल करके हम अपनी सुरक्षा खतरे में नहीं डाल सकते थे। इस अवांछित और हिंसक आंदोलन को भड़काने में पर्दे के पीछे से काम करने वाले जेहादी संगठनों और पाकिस्तान की आईएसआई की भी भूमिका है। यह दुर्भाग्य की बात है कि हमारे अनेक दल अपने राजनैतिक स्वार्थों के कारण इन देशविरो धी और शत्रु संचालित शक्तियों के हाथ में खेल रहे हैं। पर इसका दोष इस आंदोलन को भड़काने में लगी इन सभी शक्तियों तक सीमित नहीं है। इस आंदोलन को प्रचार-प्रसार देने में हमारे समाचार माध्यमों की भी बड़ी भूमिका है- विशेषकर अंग्रेजी अखबारों और वामपंथी पत्रकारों से भरे कई इलेक्ट्रॉनिक चैनलों की। हमारे समाचार माध्यमों में सेक्यूलरिज्म के नाम पर एक पूर्वाग्रह पनप गया है। वे अल्पसंख्यकों के पहाड़ से अपराध को भी नजरअंदाज किए रहते हैं और बहुसंख्यकों के तिल के बराबर दोष को भी ताड़ बनाकर दिखाते हैं। सेक्यूलरिज्म के नाम पर बना हुआ यह पूर्वाग्रह एक वायरस की तरह है, जो हमारे बुद्धिजीवियों-साहित्यकारों, अध्यापकों, मनोरंजन उद्योग के कलाकारों के अच्छे-खासे वर्ग के सोच में संक्रमण कर गया है।

हमारी न्यायपालिका में भी ऐसे अनेक जज हैं, जो आए दिन घोषित करते रहते हैं कि लोकतंत्र में विरोध करने का मूलभूत अधिकार होता है भले ही वह कितनी भी अनुचित मांग को लेकर किया गया हो। पश्चिमी देशों में राज्य सदा सर्वसत्तावादी रहा है। वहां इस तरह का तर्क समझा भी जा सकता है, भारत में नहीं। यह भी विचित्र बात है कि पुलिस पर कानून और व्यवस्था को बनाए रखने की सबसे अधिक जिम्मेदारी है। पर अदालतें पुलिस वालों से अधिक कानून तोड़ने वालों की तरफदारी करती नजर आती हैं। यह लोकतंत्र के नाम पर अराजकता को प्रश्रय देना है। इससे देश लगातार कमजोर होता चला जा रहा है। मुसलमानों के नाम पर छेड़े गए इस आंदोलन ने सबसे अधिक मुसलमानों का अहित किया है। स्वयं मुस्लिम समुदाय के बहुत से लोग इसे समझ रहे हैं। मुसलमानों के सभी वर्गों के अनेक नेताओं ने इस कानून का समर्थन करते हुए कहा है कि इस कानून का मुसलमानों से कोई लेना- देना नहीं है।

उनके समुदाय के लोगों को निहित स्वार्थी तत्वों द्वारा झूठ फैलाकर भड़काया जा रहा है। उन्हें यह स्पष्ट दिखाई देता है कि अगर अनुचित मांग उठाकर हिन्दू और मुसलमानों के बीच खाई चौड़ी की जाएगी तो अंतत: मुसलमानों का ही नुकसान होगा। यह बात अपने आपको सेक्यूलर मानने वाले वाममार्गी तत्वों पर भी लागू होती है। वे हमेशा देश की मुख्य धारा के विचारों और विश्वासों के विपरीत खड़े दिखाई देते हैं। इस तरह वे अपने आपको समाज से काटते चले जा रहे हैं। अब तक कांग्रेस और वामपंथी सत्ता प्रतिष्ठान के भरोसे फल-फूल रहे थे, अब कांग्रेस और वामपंथी राजनीतिक सत्ता के सीमांत पर पहुंच गए हैं। उनके भरोसे रहकर यह तत्व फल-फूल नहीं सकते। पूरे भारतीय समाज को अपने बीच की इन नकारात्मक प्रवृत्तियों से अपने लोकतंत्र को उबारने के बारे मे सोचना चाहिए।



 
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